सवालों की दुनिया: क्या आप भी इस दुनिया में रहते हैं?

पत्रकार कहते हैं: मैं तो पूछूँगा सवाल

जनता कहती है: हम तो करेंगे सवाल

 

कई बार कई सवालों के जवाब भी सवाल होते हैं। कह सकते हैं कि यह सवालों की दुनिया बड़ी अजीब है। कई बार बस आँखें सवाल पूछती है। सारे सवालों से भी कुछ सवाल हो सकते हैं:

  • आखिर सवालों की जवाबदेही क्या है?
  • क्या सवाल बस पूछने के लिए होते हैं?
  • क्या सवाल व्यक्ति और स्थिति के अनुसार परिवर्तित होते हैं?

सवाल पूछना किनका जन्मसिद्ध अधिकार है?

  • पत्रकारों का
  • विपक्षी नेताओं का
  • छात्र-छात्राओं का

सवाल को लोकतंत्र का गहना कहा जाता है। जहां सवाल होता है वहाँ जवाब भी होता है। इन सवाल-जवाब के फेरहिस्त में कई बार हम आप उलझ कर अपने मुख्य लक्ष्य से भटक जाते हैं। कई बार सवाल ही लक्ष्य तय कर देता है।

 

लेकिन इन सवालों की दुनिया के रंग बड़े अजीब हैं। कई बार जिन्हें सवाल पूछने चाहिए बस वो सवालों के मोहरे बन जाते हैं। ताजा उदाहरण अप्रवासी कामगार (Migrant Workers) हैं जो इस कोरोना महामारी के बीच में कहीं फंसे हैं। उनकी मजबूरीयों और परेशानियों में कई सवाल हैं लेकिन वो सवाल उठाने वालों के मोहरे बने हुए हैं। वो सवाल उनको मुश्किलों से निकालने के बजाय मुश्किलों में धकेलने का काम कर रही है। उनके सवाल उनके जुबान से नहीं आते, उनके सवाल उनकी आँखों में होते हैं। उनके सवाल उनकी परेशानियों में हैं। उन सवालों के बीच उनकी लड़ाई है विश्वास की। उस विश्वास की जिसकी कमी के कारण वो विस्थापित हुए और वही विश्वास की कमी जिसके कारण आज फिर वो किसी भी हाल में अपने घर वापस पहुंचना चाहते हैं।

लेकिन इन परिस्थितियों में सवाल वही है जो उनके विस्थापित होने के समय था। अपने गृह राज्य लौटने के बाद भी उनकी लड़ाई वही होगी जो आज लड़ रहे हैं।

 

लेकिन उन सवालों के जवाब सरकार द्वारा आज घोषित किए गए कदम हो सकते हैं। वो जवाब है उनमें विश्वास जगाना। रहने का घर, खाने के लिए भोजन और जीने के लिए रोजगार उनके विश्वास रूपी सवाल को खत्म कर सकता है।

 

वन नेशन वन राशन : अगर गरीबों को पता हो कि वो जहां रहेंगे उन्हें राशन की दिक्कत नहीं होगी तो यह विश्वास उन्हें भागने पर मजबूर नहीं करेगा। मोदी सरकार का यह फैसला न जाने विपक्ष के किन सवालों में आएगा यह आने वाला समय बताएगा।

 

रेन्टल हाउसिंग  कॉम्प्लेक्स: रोटी के बाद मकान। किसी के स्थायित्व का सबसे बड़ा सहारा। केंद्र सरकार का यह योजना भविष्य में अप्रवासी कामगारों के लिए सबसे बड़ा सहारा बन सकता है। अब सवाल तो इसमें भी होगा कि अभी का क्या? लेकिन इतनी जल्दी कोई कॉम्प्लेक्स तो बन नहीं सकता। सवाल उसके बाद भी हो सकता है। सवाल का स्वभाव भी यही है।

 

जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, जीवन बीमा ऐसी कई योजनाएँ हैं जिसने विश्वास कायम किया है। लेकिन जब हर आँखों में वर्षों से सवाल भरा हो तो जवाब मिलने में भी वक़्त तो लग ही सकता है। और फिर जहां जवाब होता है वहाँ फिर से सवाल तो उत्पन्न हो ही सकते हैं। यही सवालों का स्वभाव भी है। हम आप सभी उसी स्वभाव में जीते हैं। सवाल जरूर पूछिए, लेकिन उन सवालों पर अपनी जिम्मेदारी भी तय कीजिए। यह जान लीजिए कि सवाल पूछ कर छोड़ देना अपने आप में सवाल पैदा करता है। खुद से पूछिए कि आप सवालों के किस हिस्से में हैं : सिर्फ़ सवाल पूछने वाले या सवालों से जिम्मेदारी तय करने वाले।