कोरोना के कारण महिलाओं को मिल रहा समाज मे आगे आने का मौका

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कहते हैं प्रथम विश्व युद्ध के समय जब दुनिया भर मे पुरुष लड़ाई मे शरीक हो रहे थे तब पहली बार महिलाओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गयी थी | वो एक तरफ घर के काम तो संभाल ही रही थीं, बाहर के काम भी उन्हें ही करने होते थे | इसके अलावा कई बार नर्स बनकर उन्हें सैनिकों की देखभाल भी करनी होती थी | दुनिया को तब पहली बार औरतों की शक्ति तथा क्षमता का आभास हुआ था |

आज कोरोना काल मे औरतों की भूमिका भी कुछ वैसी ही है | और फिर से वे इस मुश्किल वक्त मे आगे आती दिखाई दे रही हैं | ऐसे समय पर जब मास्क आसानी से उपलब्ध नहीं हैं तो वे घर मे ही बना ले रहीं हैं |  

थैला बनाने वाली संस्था बना रही मास्क

मुश्किल की इस घड़ी में ‘जीवनम’ नाम की एक संस्था ने मास्क बनाने का बीड़ा उठाया है। इस संस्था को दीपा नायर वेणुगोपाल चलाती हैं। संस्था की सभी सदस्य महिलाएं मास्क की कमी दूर करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही हैं। खास बात यह है कि यह संस्था पहले कपड़ों से थैला बनाती थी। लेकिन अब इन महिलाओं ने ऑनलाइन वीडियो ट्यूटोरियल देखकर कोरोना से लड़ाई के लिए मास्क बनाने का काम शुरू कर दिया है। यहां करीब तीस महिलाएं रोजाना लगभग 200-300 मास्क बनाती हैं। 

 साठ हजार मास्क बना चुकी आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाएं

स्वरोजगार और खुद को सक्षम बनाने के लिए सिलाई-कढ़ाई करती भोपाल की आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाएं भी इस दौरान आगे आई हैं। इस संगठन से जुड़ी करीब 169 महिलाओं ने कोरोना वॉरियर्स के तौर पर खुद कमान संभाल ली है। मास्क की कमी से जूझ रहे शहर की मदद के लिए इन महिलाओं ने पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को संक्रमण से बचाने के लिए मास्क सिलने का काम शुरू किया है। ये महिलाएं भोपाल के आसपास के 22 गांवों से ताल्लुक रखती हैं और रोजाना घर के कामकाज से निपटकर मास्क बनाने पहुंच जाती हैं। यह दस दिन में अब तक साठ हजार मास्क बना चुकी हैं।

65 महिलाएं समूह में तैयार कर रही मास्क 

इनको विकास भवन की ओर से 12 अप्रैल से मास्क बनाने का काम दिया गया है। इन्हें कुल 40 हजार मास्क बनाने का लक्ष्य सौंपा गया है। छह से सात के ग्रुप में ये महिलाएं घर का काम करने के बाद रोज आठ घंटे मास्क बनाती हैं। 

वहीं, इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल भी रखती हैं। एक महिला रोजाना 150 मास्क बना लेती है, जिसके लिए हर एक मास्क पर एक महिला को चार रुपये मिलते हैं। मास्क के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कपड़ा पर्यावरण के अनुकूल है। तीन से चार घंटे उपयोग के बाद एंटीसेप्टिक युक्त पानी से धोने के बाद सुखाकर इसे फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है। 

 


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