एक देश एक चुनाव पर चर्चा से क्यो मुंह मोड़ रहे कुछ लोग

जब से मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में आई है तब से ही वो देश को एकता के धागे में बांधने में लगी हुई है। एक देश, एक टैक्स सिस्टम हो या फिर धारा 370 हटाकर देश में हर जगह एक संविधान लागू करना हो या देश के गरीब लोगों के लिये एक देश एक राशन कार्ड के तहत राशन पहुंचाना हो सरकार ऐसी व्यवस्था ला रही है जिससे देश में सबकुछ एक जैसा ही दिखे ऐसे में एक देश एक चुनाव पर विचार का संकेत देकर पीएम ने देश को एकजुट करने का प्रयास किया है।

एक देश एक चुनाव पर क्यो न हो विचार

पीएम नरेंद्र मोदी ने संविधान दिवस के अवसर पर एक देश-एक चुनाव की आवश्यकता नए सिरे से रेखांकित की। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस आवश्यकता की पूर्ति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जाएगा। एक देश-एक चुनाव का विचार वह विचार है जिसकी चर्चा पिछले कई वर्षो से हो रही है, लेकिन किसी दिशा पर पहुंचती नहीं दिख रही है। इसका कारण यह है कि अधिकांश  दल राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने के स्थान पर अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर अपना बाते पेश करने में देखे जाते हैं। यहां बता दे कि स्वतंत्रता के बाद डेढ़-दो दशक तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे और किसी को कोई समस्या नहीं थी। फिर वही काम अब क्यों नहीं हो सकता है? यदि यह काम नहीं हो पा रहा है तो केवल संकीर्ण स्वार्थो के कारण। ऐसे स्वार्थ न तो राष्ट्र के हित में हैं और न राजनीति के।

एक देश एक चुनाव होने पर चुनावी फिजूल खर्ची पर लगेगी लगाम

पहले की तरह लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होने लगें तो एक तो बार-बार होने वाले चुनावों के कारण देश की राजनीति का ध्यान राष्ट्रीय हितों से भटकने की समस्या का समाधान होगा और दूसरे, राष्ट्रीय संसाधनों की भी बचत होगी। खुद पीएम मोदी ने इस बारे में खुलकर बोला है कि चुनाव एक साथ न होने के चलते कई विकास के काम अटक जाते है तो कुछ काम रोकने पड़ते जिसका असर ये होता है कि जो काम हो रहा होता है उसका बजट बढ़ता है और काम देरी से पूरा होता है। इतना ही नही अलग अलग चुनाव के कारण करोड़ो रूपये कि बर्बादी भी देश में देखी जाती है जो एक विकासशील देश के लिये ठीक नही। इसके अलावा एक अन्य समस्या बार-बार चुनावों के कारण उपजने वाली राजनीतिक-सामाजिक कटुता की भी है। यह किसी से छिपा नहीं कि अक्सर चुनावी माहौल समाज में तनाव बढ़ाने का काम करता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र की मजबूती के साथ हाल के वर्षो में कुछ अहम सुधार किए गए हैं, लेकिन अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि हर स्तर पर उस परिपक्वता का प्रदर्शन किया जा रहा है जो चुनावी माहौल को दुरुस्त रखने के लिए आवश्यक है।

निश्चित रूप से एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान में कुछ संशोधन करने होंगे, लेकिन यह कोई ऐसा काम नहीं जो बहुत कठिन हो। बस राजनीतिक सहमति बने तो यह काम अधिक आसानी से किया भी जा सकता है। लेकिन सवाल अब ये उठता है कि  आखिर कुछ लोग  इस विषय पर चर्चा से क्यो भाग रहे है।