आखिर क्यों सरदार पटेल को अपने अंतिम समय में छोड़ना पड़ा दिल्ली

15 दिसंबर को देश के पहले गृह मंत्री और लोह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 70वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। सरदार पटेल को खासतौर पर याद किया जाता है, क्योंकि गृहमंत्री रहते उन्होंने सभी छोटी और बड़ी रियासतों का भारत में विलय करके एक भारत का सपना सच किया था। चलिए आज हम आपको बताते हैं उनके अंतिम समय के वक्त के बारे में।

 

सरदार पटेल को परेशान करने लगी थी दिल्ली की सर्दी

जानकारों कि माने तो 1948 खत्म होते-होते सरदार पटेल का स्वास्थ्य ज्यादा खराब हो गया था। तब वे दिल्ली में ही थे और उनकी सेवा में बेटी मणिबेन लगी थीं। सरदार पटेल के अंतिम दिनों के बारे में उनके सचिव रहे वी शंकर ने अपनी आत्मकथा रेमिनेंसेज में विस्तार से लिखा है कि उस समय तक सरदार पटेल चीजों को भूलने लगे थे। उन्हें लोगों को पहचानने में परेशानी होती थी। चंद कदम चलने पर थक जाते थे, इसलिए ज्यादर समय बिस्तर पर ही रहते थे। उनकी सुनने की क्षमता भी घट गई थी। नवंबर 1950 तक सेहत और गिर गई, तो उनकी सेवा में कुछ नर्सों को लगा दिया गया। उस दौरान दिल्ली की ठंड उन्हें परेशान करती थी। उन्हें रात समय ऑक्सिजन पर भी रखना पड़ता था। सरदार पटेल की बिगड़ती सेहत के बारे में पूरे देश को पता चल गया था। दूर दूर से बड़े लोग मिलने आने लगे थे। इसी क्रम में 6 दिसंबर को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद आए। राजेंद्र प्रसाद पूरे 10 दिन वहां बैठे, लेकिन सरदार पटेल की हालत इतनी खराब थी कि वे एक शब्द न बोल सके। ऐसे ही एक दिन बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय भी आए। रॉय खुद भी अच्छे डॉक्टर थे। इसके बाद अगले 2 दिनों तक सरदार कबीर की पंक्तियां ‘मन लागो मेरो यार फकीरी में’ गुनगुनाते रहे। रॉय की सलाह पर डॉक्टरों ने तय किया कि दिल्ली की सर्दी से बचाने के लिए सरदार पटेल को मुंबई शिफ्ट किया जाए, जहां का बेहतर मौसम शायद उनको रास आ जाए।

 

अंतिम समय में दिल्ली छोड़ चले गये थे मुंबई

योजना के मुताबिक, 12 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल को वेलिंग्टन हवाईपट्टी ले जाया गया जहां भारतीय वायुसेना का डकोटा विमान उन्हें बंबई लाया गया। बीबीसी के मुताबिक, विमान की सीढ़ियों के पास राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, पूर्व गवर्नर जनरल सी राजगोपाचारी और उद्योगपति घनश्यामदास बिरला खड़े थे। तब पटेल ने सबसे मुस्करा कर विदा ली थी।सरदार पटेल को मुंबई में बिरला हाउस में रखा गया। वहां उनकी हालत बिगड़ती चली गई। 15 दिसंबर 1950 सुबह 3 बजे सरदार पटेल को दिल का दौरा पड़ा। इसके कारण वे बेहोश हो गए। करीब चार घंटे बाद होश आया। उन्होंने पानी मांगा तो बेटी मणिबेन ने गंगाजल के साथ शहद दिया। इसके बाद सुबह 9 बजकर 37 मिनट पर सरदार पटेल ने अंतिम सांस ली और देश का वो लाल हम सब को छोड़कर चला गया जिसका पूरा जीवन ही सिर्फ राष्ट्रसेवा में बीता लेकिन ये देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे लौह पुरूष के किस्से कहानी बहुत सालो तक लुप्त ही रहे और हम उनकी राष्ट्रभक्ति के किस्सो से वंचित रहे। लेकिन कहते हैं न कि सत्य के इतिहास को छुपाया नही जा सकता वो एक न एक दिन जरूर सबके सामने आता है। और आज ऐसा ही हो रहा है और सवाल कर रहा है कि आखिर असल राष्ट्रभक्तों  के किस्सों को क्यो छुपाया गया…