महागठबंधन बनाने के लिये क्यों आतुर है विपक्ष?

5 राज्यों के नतीजे आने से पहले ही विपक्ष सिर्फ न्यूज एजेसियों के सर्वे के आधार पर फूली नही समां रही है। मजे की बात तो ये है कि जिस सर्वे को लेकर कभी कांग्रेस या दूसरे दल ये तंज कसते थे कि ये कोरी बकवास है आज उसी पर 2019 के मोदी किले को गिराने के लिये एक ऐसा कुनबां बनाने की तैयारी मे जुट गये है, जिसके सभी नेताओं की अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग है. लेकिन इसके बावजूद भी वो एक मंच के नीचे आ कर ये दिखाना चाहते है कि वो मोदी के विजय रथ को थाम सकते है।

चन्द्रबाबू नायडू इस कुनबे को जोड़ने मे सबसे ज्यादा मेहनत करने मे लगे हुए है और उनका साथ इस काम मे ममता बनर्जी और शरद पवार देने मे लगे है। लेकिन क्या बेमेल खाते ये नेता आने वाले दिनो मे देश को एक मजबूत सरकार दे पायेगे ये दक्ष प्रश्न सभी राजनैनिक पंडितों मे कौंध रहा है। क्योंकि अगर देखा जाये तो ये सभी अपने अपने राज्यों एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते है।

ऐसे मे एक सवाल ये भी खड़ा हो रहा है कि आखिर इतनी विभिन्ता होने के बाद भी ये नेतागण एक साथ क्यों खड़े होने के लिये बेकरार है। और इसका सीधा सा जवाब यही लगता है कि सत्ता सुख के लिये ये नेता किसी भी हद तक जाने के लिये तैयार है। ये जानते है कि जिस तरह से मोदी की लोकप्रियता देश मे है उने अकेले लड़ना यानी की हार को गले लगाना है और इसलिये वो एक जुट होकर सिर्फ सरकार पर आने का विचार बना रहे है.

 

लोकतन्त्र होने के नाते ये गलत भी नही है। देश मे चुनाव लड़ने के नियम के मुताबिक आप एक जुट होकर चुनाव लड़ सकते है और देश मे पहले भी ऐसा हुआ है। लेकिन उस वक्त विपक्ष के पास मजबूत नेताओं का एक विचारधारा वाला टोला हुआ करता था लेकिन इस वक्त ऐसा नही है और अगर विपक्ष के नेताओं पर नजर डाले तो अधिकतर नेता अवसरवादी ही नजर आते है। फिर वो चन्दबाबू नायडू हो या फिर मायावती हो इसके साथ इसी क्रम मे ममता और अखिलेश के साथ साथ केजरीवाल को भी रखा जा सकता है। केजरीवाल जिन्होने कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ खूब हल्लाबोला था तो आज वो उन्ही नेताओं के साथ गलबइया करते हुए दिख रहे है।

ऐसे मे लगता यही है कि सत्ता की भूख इन नेताओ को आपस मे मिला रही है लेकिन इस बात की जमानत कौन लेगा कि सत्ता मे आने के बाद इन लोगो की भूख खत्म हो जायेगी। क्योकि अभी ये नेता ये ही जता रहे है कि तेरी भूख से मेरी भूख ज्यादा है। ऐसे मे अब देश की जनता को ये फैसला करना होगा कि देश हित मे क्या ठीक रहेगा।