आ देखें जरा, किसमें कितना है दम: कौन बनेगा दिल्ली का सीएम

दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीख का ऐलान हो गया है। 8 फरवरी को मतदान होगा तो 11 फरवरी को सबके सामने नतीजे होगे, कि दिल्ली का अगला सीएम कौन होगा। लेकिन जितना बोलने में ये आसान दिख रहा है, उतना इसबार का चुनाव आसान नही है। क्योकि तीनों पार्टियों में कुछ मुद्दे उन्हे फायदे पहुंचा सकते है, तो कुछ उन्हे नुकसान, जिसके चलते वो सत्ता के करीब पहुंच कर भी सीएम कुर्सी से दूर रह सकते है। मसलन इस चुनाव में नागरिकता संशोधन ऐक्ट, जामिया मिलिया हिंसा और जेएनयू कांड की छाया पड़नी तय मानी जा रही है। पांच साल पहले केजरीवाल ने जो वायदे किये थे वो भी मुद्दा हो सकता है, वही कांग्रेस का पुराना राग कितनो को भाता है ये भी देखने वाली बात होगी।    

मोदी सरकार के काम पर चुनाव जीतने की कवायद

लोकसभा चुनाव में दिल्लीवालो ने दिल खोलकर बीजेपी का साथ दिया जिसके चलते लगातार दूसरी बार बीजेपी के सातों सासंद चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे इसी तरह दिल्ली की तीनों एमसीडी में भी बीजेपी की सरकार है। जो समय समय में केजरीवाल सरकार को घेरती रही है और केजरीवाल सरकार के कामों का खुलासा भी करती रही है। लेकिन इस चुनाव में बीजेपी के पास सबसे बड़ा हथियार अगर कोई है, तो वो है देश के पीएम नरेन्द्र मोदी जिनका समर्थन दिल्लीवाले खुलकर करते है। तो 70 साल से कच्ची कॉलोनियों को पक्का करने की मांग को केंद्र सरकार ने पूरा करके एक बड़ा वोट बैंक अपनी तरफ खीचा है। जिसका असर जरूर इस चुनाव में दिख सकता है।

कमजोरी – सीएम पद के दावेदार का न होना बीजेपी के लिये मुश्किले खड़ी कर सकता है। ऐसे में मोदी एंड कंपनी  इससे कैसे निकलती है, इसके लिये जरूर पार्टी में रणनीति बनाई जा रही होगी। 

फ्री के सहारे आप

दिल्ली चुनाव में केजरीवाल एंड कंपनी का सबसे बड़ा हथियार फ्री बिजली, पानी और इलाज है, जिसका वो दावा करते है, हालाकि कई जगह उनके इस दावो की पोल भी खुल चुकी है। लेकिन केजरीवाल ये कहते हुए नजर आते है कि उन्होने दिल्ली में गरीब लोगो के लिये मुफ्त में सुविधाये दी है और वो इसे अपना सबसे बड़ा काम बताते है। इसी के सहारे चुनावी सागर को पार करने की सोच रहे है।

कमजोरी –पिछले पांच सालों में केजरीवाल और केंद्र के बीच सिर्फ मतभेद या फिर अनबन की ही खबर आती रही है। जिसके चलते दिल्लीवालो को परेशानी में डाला है और माना जा रहा है, कि केजरीवाल केंद्र की ये लड़ाई उनके लिये परेशानी खड़ी कर सकती है। इसी तरह मंत्रियों में लगे भ्रष्टाचार के मामले तो पार्टी में बीच बीच में आई गुटबाजी भी उन्हे नुकसान पहुंचा सकती है।

विरोधी लहर से फायदे की आस

वैसे जिस दिल्ली में कांग्रेस 15 साल तक शासन कर चुकी है। आज उसके लिए कुछ खास परिणाम इस चुनाव में आते तो नही दिख रहे है। हालाकि कांग्रेस को आस है, कि दिल्लीवाले राज्य की केजरीवाल सरकार से पूरी तरह से ऊब चुकी है। जिसके चलते नतीजे उनके हक में आने की उम्मीद वो लगाकर चल रहे है। इसके साथ शीला सरकार के वक्त हुए कामों और कुछ नये वायदो के सात चुनावी अकाड़े में दांवपेच लगाने में लगे हुए है, वैसे कांग्रेस का मनोबल पिछले लोकसभा चुनाव से भी ऊंचा हुआ है। क्योकि उस चुनाव में 22 फीसदी वोट पाकर उसने केजरीवाल को तीसरे नबंर पर पहुंचा दिया था, ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है, कि दिल्लीवाले उसके साथ खड़े होगे।

कमजोरी- शीला जी जैसा नेत्तृव कांग्रेस के पास आज दिल्ली में नही है, तो पार्टी के अंदर चल रही आपसी खीचतान भी पार्टी को मनमुताबिक नतीजे में रोडा अटका सकती है। तो CAA पर आये पार्टी के बड़े नेताओं के बयान पार्टी को फिर से सत्ता से दूर ले जा सकते है।

मतलब साफ है कि दिल्ली चुनाव का चौसर सज चुका है, मोहरे भी बिछने लगे है। लेकिन चाले किसकी सटीक बैठती है और कौन सत्ता तक पहुंच पायेगा। ये तो 11 फरवरी की तारीख को जादू की मशीन यानी वोटिंग मशीन के खुलने पर ही पता चल पायेगा।