जब सरदार पटेल बन गए एकलव्य: भारत के पहले प्रधानमंत्री चुनने की कहानी

चलिये आज हम आपको आजादी मिलने से पहले की एक कहानी सुनाते है एक ऐसी कहानी जिसे इतिहास के पन्नो कुछ लोगो ने ऐसे ही दबा दिया था जैसे महाभारत काल मे अर्जुन के समुक एकल्वय की कहानी को दबाया गया था। आप हमारा इशारा समझ गये होगे कि अब बात कर रहे है देश के उन महानायक लौहपुरूष सरदार बल्लवभाई पटेल की जिसने देश प्रेम के चलते कभी भी निजी स्वार्थ को आगे नही आने दिया। जबकि उस वक्त खुद उनकी पार्टी मे ही ऐसे नेता भी थे जो अपने निजी स्वार्थ के लिये किसी हद तक जाने को तैयार थे।

आजादी मिलने के चार साल पहले की बात है अग्रेजों ने कांग्रेस को अंतरिम सरकार बनाने का न्योता दिया था। और उस वक्त कांग्रेस पार्टी या यूँ कहे कि गांधी जी के सामने एक बड़ी विपदा आ खड़ी हुई थी गांधी जी असमंजस मे थे कि आखिर वो किसके साथ खड़े हो। हुआ कुछ इस तरह जब पार्टी मे अध्यक्ष पद का चुनाव हुआ तो ज्यादातर राज्यो से सरदार पटेल को ही चुना गया। और ऐसा माना जा रहा था कि जो पार्टी का अध्यक्ष होगा वही आगे चल कर देश की कमान सभांलेगा यानी कि देश का पहला प्रधानमंत्री बनेगा। लेकिन इस फैसले को लेकर जब कांग्रेस की वर्किंग कमेठी मे चर्चा हुई तो सब कुछ बदल ही गया वो कैसे ये भी जानिये।

जब मौलाना साहब ने गांधी जी को इस बारे मे जानकारी दी कि देश के अधिकतर राज्य के अध्यक्ष सरदार साहब को पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहते है तो गांधी जी कुछ वक्त के लिये बिलकुल शांत हो गये तो उनके बगल मे बैठे नेहरू जी इस बात को सुनते ही कुछ असहज से दिखे।

तभी गांधी जी ने एक प्रस्ताव रखा और कहा कि वर्किंग कमेठी के सदस्य इस बारे मे एक सादे कागज मे अपना मत रखे।कागज मे एक तरफ नेहरू और दूसरी तरफ पटेल नाम लिख दिये गये. फिर क्या सभी नेताओं ने एक के बाद अपना मत सादे कागज पर हस्ताक्षर कर के दिये। जब ये कागज सरदार पटेल के पास आया तो उन्होने इस कागज को गांधी जी के सामने रख दिया । और गांधी जी ने उस कागज मे नेहरू जी का नाम लिख दिया जिसके बाद पटेल ने उस कागज पर गांधी जी का संमान करते हुए नेहरू के नाम पर अपनी भी सहमती दे दी।

 

और इतिहास बदल गया नेहरू पार्टी के अध्यक्ष बन गये  और बाद मे देश के  पहली प्रधानमंत्री भी बने कई इतिहासकारो की माने तो नेहरू पहले ही गांधी जी से अपना रुख साफ कर चुके थे उनका कहना था कि वो सिर्फ आजाद भारत मे सिर्फ पीएम का पद ही लेगे और अगर उन्हे ये पद नही मिलता है तो वो सत्ता मे शामिल नही होगे। वही कुछ इतिहासकारो का मत है कि गांधी जी की पहली पंसद नेहरू जी ही थे गांधी जी ने एक इंटरव्यू मे कहा था कि उन्होने नेहरू को इस लिये चुना क्योंकि उनकी विदेश नीति पर अच्छी पकड़ थी। साथ ही साथा वो ये भी मानते थे कि पटेल कभी भी उनकी बात नही टाल सकते थे। शायद इसीलिये गांधी जी ने दोर्णाचार्य की तरह ही पटेल की कुर्बानी ले ली।

हालाकि पटेल का कद इतना बड़ा उस वक्त था कि देश और पार्टी के लोग उन्ही को देश का पहला प्रधानमंत्री देखना चाहते थे। लेकिन नेहरू की जिद्द ने देश की तस्वीर ही बदल दी। और सत्ता मे आने के बाद धीरे धीरे इतिहास के पन्नो मे पटेल साहब के कामो को दफन उनके साथियों ने ही कर दिया. लेकिन आज देश ये जरूर कहता हुआ दिखाई दे रहा है कि अगर पटेल साहब देश के पहले पीएम होते तो शायद देश की स्थिती कुछ और होती।