जब मणिनगर के एमएलए के तौर पर मोदी ने ‘मिनी इंडिया’ का विकास किया!

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देश के प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी पिछले छह वर्ष से भारत के सम्यक विकास की कोशिश में जुटे हैं. लेकिन कम ही लोगों को पता है कि भारत के चौतरफा विकास के मिनी मॉडल पर वो सफलतापूर्वक पहले ही काम कर चुके हैं, एक विधायक के तौर पर. अहमदाबाद शहर के जिस मणिनगर इलाके का बतौर विधायक उन्होंने करीब साढ़े ग्यारह साल तक प्रतिनिधित्व किया, उस इलाके में भारत के सभी हिस्से के लोग रहते हैं, जहां पर जन्म से लेकर मरण तक, जीवन के हर अवसर के लिए आवश्यक सुविधाओं का उन्होंने भरपूर विकास किया और मणिनगर के लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आए.

गुजरात के प्राचीन शहर वडनगर में रहने वाले एक युवक ने जब घर-परिवार का मोह छोड़कर 1969-70 के कालखंड में अहमदाबाद का रुख स्थायी तौर पर किया था और आरएसएस के जरिये समाज सेवा का प्रण लिया था, तो उस युवक को भला कहां पता था कि वो उसी इलाके में कभी मुख्यमंत्री की भूमिका में चुनाव लड़ने आएगा, जहां से बतौर प्रचारक उसके औपचारिक संघ जीवन की शुरुआत हो रही है. शायद ही उस समय नरेंद्र मोदी या फिर उनके मार्गदर्शक लक्ष्मण राव इनामदार उर्फ वकील साहब ने इस बारे में सोचा था, जिनके मार्गदर्शन में नरेंद्र मोदी ने 1971 से संघ के प्रचारक के तौर पर गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में समाज सेवा का कार्य किया.

1986 में बीजेपी में शामिल हुए
वकील साहब के देहांत के साल भर बाद नरेंद्र मोदी ने 1986 में संघ की योजना के मुताबिक बीजेपी में प्रवेश किया, उस राजनीतिक संगठन को मजबूत करने के लिए, जिसने जनसंघ के नये अवतार के तौर पर 1980 में जन्म लिया था और 1984 में हुए लोकसभा चुनावों में जिसे महज दो सीटें मिली थी, जिसमें से एक सीट गुजरात के महेसाणा की थी, जिसमें मोदी का अपना पैतृक शहर वडनगर भी था.

बीजेपी में आते ही जीत दिलाई

1986 में संघ से बीजेपी में आने के कुछ महीनों के अंदर ही मोदी ने पहली बार अहमदाबाद नगर निगम में बीजेपी को सत्ता दिलाई. यहां से मोदी ने राजनीतिक जीवन में जो रफ्तार पकड़ी, कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. गुजरात बीजेपी के महामंत्री के तौर पर 1995 में उन्होंने राज्य में बीजेपी की अपने बूते की पहली सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उसके थोड़े समय बाद ही शंकरसिंह वाघेला की अगुआई में पार्टी में विद्रोह हुआ, जिससे दुखी होकर मोदी ने दिल्ली की राह पकड़ी. करीब छह साल बाद गुजरात में औपचारिक तौर पर वो तभी वापस आए, जब गुजरात में बीजेपी के कमजोर पड़ते सियासी किले को मजबूत करने की उन्हें जिम्मेदारी दी गई मुख्यमंत्री के तौर पर.

अक्टूबर 2001 में सीएम बने मोदी
सात अक्टूबर 2001 को मोदी ने गुजरात के नये मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. उस समय भूकंप से प्रभावित कच्छ के इलाके में पुनर्वास के कार्यों को असरदार ढंग से चलाना उनकी प्राथमिकता में था, जिसमें ढिलाई के कारण ही उनके पहले मुख्यमंत्री रहे केशुभाई पटेल को गंभीर आलोचना का शिकार होना पड़ा था और कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. मोदी ने इस पर ध्यान दिया, सुस्त पड़ी सरकारी मशीनरी में जान फूंकी और अपनी प्राथमिकता को साफ किया, लक्ष्य निर्धारित किये. इसी दौरान मोदी के सामने छह महीनों के अंदर विधानसभा का सदस्य बनने की संवैधानिक मर्यादा भी आ खड़ी हुई.

चुनाव परिणामों के तीसरे ही दिन 27 फरवरी 2002 को गोधरा कांड हुआ, उसके अगले दिन गुजरात के कई हिस्सों में दंगे भड़क उठे. मोदी की प्राथमिकता हालात को काबू करने की रही, आलोचना भी हुई, मोदी ने विधानसभा भंग कर फिर से जनता जनार्दन का भरोसा जीतने का फैसला किया. गुजरात गौरव यात्रा निकाली, 2002 दिसंबर में चुनाव हुए और भारी बहुमत के साथ मोदी ने अपनी अगुआई में बीजेपी को गुजरात में सत्ता पर काबिज रखा.

दिसंबर 2002 में मणिनगर से चुनाव लड़े
2002 के दिसंबर में हुए चुनावों में मोदी खुद राजकोट-2 विधानसभा क्षेत्र की जगह अहमदाबाद की मणिनगर सीट से लड़े. कारण बड़ा साफ था, अगर अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को सुलझाना है, उनके सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहना है, तो उनके नजदीक होना आवश्यक है. बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए राजकोट बार-बार जाना संभव नहीं था और न ही राजकोट के लोगों का अपने विधायक के पास 200 किलोमीटर की दूरी तय कर आना आसान था.

चुनावों के ठीक पहले जब मोदी इस दिशा में सोच रहे थे और खेड़ा जिले के प्रसिद्ध धर्मस्थल फागवेल से गुजरात गौरव यात्रा की शुरुआत की थी, उसी शाम वो इस मामले में अंतिम नतीजे पर भी पहुंचे. मोदी से ठीक पहले गुजरात बीजेपी में संगठन मंत्री रहे दत्ताजी चिरनदास ने मणिनगर विधानसभा सीट से तीन बार चुनाव जीत चुके विधायक कमलेश पटेल से उनकी इच्छा के बारे में फिर से पूछा, जब उन्होंने कहा था कि अगर मोदी उनकी सीट से चुनाव लड़ें, तो उन्हें खुशी होगी. कमलेश पटेल ने अपनी इच्छा पर कायम रहने की बात की और इस तरह मोदी का मणिनगर से चुनाव लड़ने का विचार पक्का हुआ.

कभी मणिनगर का संघ कार्यालय था पता
ये भी संयोग ही था कि जिस कमलेश पटेल ने 1986 में मणिनगर विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी की सदस्यता अभियान समिति के प्रभारी के तौर पर संघ से बीजेपी में प्रवेश करते समय नरेंद्र मोदी को पार्टी का सदस्य बनाते हुए पर्ची काटी थी और दो रुपये का शुल्क एक-एक रुपये के दो नोटों की शक्ल में मोदी से हासिल किया था, उन्हीं कमलेश पटेल ने सोलह साल बाद 2002 में मोदी के लिए अपनी सीट खुशी-खुशी सौंपी. संयोग ये भी था कि मोदी और पटेल दोनों का ही संबंध वडनगर से था, मोदी का जन्म वडनगर में हुआ था, तो पटेल के माता-पिता वडनगर से अहमदाबाद शिफ्ट हुए थे. खास बात ये भी थी कि जिस मणिनगर को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विधानसभा क्षेत्र के तौर पर रातोंरात देश-दुनिया में पहचान मिली थी, उसी मणिनगर में जब संघ के प्रचारक के तौर पर नरेंद्र मोदी 1971 में रहने आए थे, तो उनका पता मणिनगर का संघ कार्यालय था, जो अगले तीन दशक तक बना रहा. मुख्यमंत्री बन चुके मोदी ने 2002 में यही की बेस्ट हाईस्कूल में दिसंबर के महीने में अपना मतदान किया था. संघ के प्रचारक से राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद मोदी ने अपना पता बाद में बदल लिया और अहमदाबाद के राणीप इलाके में मतदान करना शुरु कर दिया, जहां उनके भाई का घर था और जहां पर उनके पत्र-दस्तावेज सुरक्षित रखे गये थे.

बेहतरीन प्लानर और रणनीतिकार की छवि
मणिनगर का विधायक बनते ही मोदी ने अपनी योजना पर काम करना शुरु कर दिया. मोदी की छवि शुरु से ही बेहतरीन प्लानर और रणनीतिकार की रही है. ऐसे में अपनी विधानसभा के लोगों की कैसे असरदार ढंग से सेवा की जाए और क्षेत्र में विकास किया जाए, इसकी बहुत सावधानी से योजना बनी. मोदी को पता था कि उनके सामने पूरे गुजरात के विकास की जिम्मेदारी है, लेकिन इस जिम्मेदारी का निर्वाह करते समय उनके अपने विधानसभा क्षेत्र के लोग उपेक्षित न रह जाएं, ये भी उन्हें सुनिश्चित करना था.

राजनीति शास्त्र के मास्टर मोदी को भली-भांति पता था कि भारतीय राजनीति में कई ऐसे बड़े सितारे हुए, जिन्हें लोगों ने अपना विधायक और सांसद तो बनाकर भेजा, लेकिन वो क्षेत्र की जनता के प्यार का समुचित जवाब नहीं दे पाए विकास कार्यों के जरिये. जवाहरलाल नेहरू, उनकी बिटिया इंदिरा गांधी और नाती राजीव गांधी पर भी ये आरोप लगा, जिन्होंने फूलपुर, रायबरेली और अमेठी से चुनावी जीत तो हासिल की, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने के बावजूद अपने लोकसभा क्षेत्रों के विकास पर खास ध्यान नहीं दिया, ये इलाके पिछड़े बने रहे. इसलिए मोदी के सर पर दोहरी जिम्मेदारी थी, लोगों के भरोसे पर खरा उतरना और इलाके में ऐसा विकास करना, जिसका फायदा अमीर-गरीब, अगड़े-पिछड़े सबको हो.

सीएम बनते ही सामने आईं कई चुनौतियां
मोदी ने जिस समय गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान संभाली, उस समय राज्य के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद में भी विकास की गंगा एक जैसी नहीं बही थी, साबरमती नदी तो पहले से ही सूखी पड़ी थी. साबरमती नदी का पश्चिमी हिस्सा तो तमाम आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित था, लेकिन पूर्वी हिस्सा उतना ही पिछड़ा, जिसका अतीत काफी समृद्ध रहा था, कर्णावती के दिनों से लेकर टेक्सटाइल्स मिलों के बंद होने से पहले तक. पश्चिमी हिस्सा विकास का पर्याय तो पूर्वी हिस्सा पिछड़ेपन का. मोदी का अपना विधानसभा क्षेत्र मणिनगर भी इसी पिछड़े हुए पूर्वी हिस्से में था, जिसके पांच वार्डों में से ज्यादातर में बुनियादी सुविधाएं ठीक नहीं थीं, अपराध की घटनाएं आए दिन होती थीं, बरसात के दिनों में सड़कों और गलियों में बाढ़ जैसे हालात पैदा होते थे, मिलों के बंद होने के बाद रोजगार के साधन नहीं रह गये थे.

मोदी को इन समस्याओं का अंदाजा था, आखिर खुद प्रचारक के तौर पर संघ भवन में रहे थे, जो मणिनगर का ही हिस्सा था. जब अहमदाबाद नगर निगम में उन्होंने बीजेपी को जीत दिलाई थी, तो विकास कार्यों के लिए पार्षदों को सचेत भी किया था. लेकिन 1995 में गुजरात छोड़ने और 2001 में वापस लौटने के समय तक तस्वीर बदल चुकी थी. जिस अहमदाबाद नगर निगम पर पहली बार उन्होंने 1987 में बीजेपी को भारी बहुमत से जीत दिलाई थी, उस नगर निगम पर कांग्रेस का शासन फिर से हो चुका था.

ऐसी परिस्थितियों के बीच मोदी को मणिनगर के विकास का रोडमैप तैयार करना था. इस दिशा में पहले कदम के तौर पर उन्होंने जनवरी 2003 में ही मणिनगर इलाके में अपना विधायक कार्यालय खोला. कार्यालय हमेशा खुला रहे और विधानसभा क्षेत्र के लोग बिना हिचक अपनी समस्याएं लेकर यहां आ सकें, इसके लिए एक पूर्णकालीन कार्यालय मंत्री की मोदी ने नियुक्ति की, काफी सोच समझकर. इस कार्य के लिए उन्होंने जयंतीभाई खत्री का चुनाव किया, जो उत्तर गुजरात से थे, जुबान से सख्त, लेकिन काम में पक्के, पूरी लगन के साथ लोगों की बात सुनने और समस्याएं सुलझाने के आदी.

विधानसभा क्षेत्र में अपना विधायक कार्यालय खोलने और वहां कार्यालय मंत्री नियुक्त करने के साथ ही मोदी का ध्यान इस पर भी गया कि आखिर गांधीनगर में उन्हें कौन इस बारे में लगातार बताते रहेगा, क्षेत्र में होने वाले विकास कार्यों पर निगरानी रखेगा, लोगों की समस्याएं सुलझी या नहीं, इसे देख पाएगा. इसके लिए उन्होंने दिलीप ठाकर नामक अधिकारी को जिम्मेदारी दी, जो 1998 से ही मुख्यमंत्री कार्यालय में काम कर रहे थे. सचिवालय सेवा के इस अधिकारी को मोदी ने खास ताकीद की. जो भी समस्या लेकर कोई मणिनगर के एमएलए कार्यालय पर आए या फिर क्षेत्र में विकास योजनाओं को लागू करना हो, उसके लिए सहभागिता के साथ निर्णय लेना, ताकि सबका इसमें योगदान हो और फैसलों को लेकर कोई विवाद न हो.
मणिनगर विधानसभा क्षेत्र में उस समय नगर निगम के पांच वार्ड थे, हर वार्ड से तीन निगम पार्षद. जो भी समस्या आए, उसका वार्डवार वर्गीकरण, पार्षदों और विधानसभा क्षेत्र के बीजेपी प्रभारी के साथ उस पर चर्चा और फिर प्राथमिकता के आधार पर उसका समाधान. अगर 50 लाख रुपये की एमएलए की सालाना ग्रांट का इस्तेमाल करना हो, तो कोशिश ये कि अमूमन सभी वार्डों में बराबर रकम खर्च हो.

सीएम रहते हुए भी हर पखवाड़े मणिनगर जाते थे 
मोदी खुद अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास कार्यों में रुचि लेते थे. गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेता के तौर पर गुजरात और देश में अपनी व्यस्तता के बावजूद हर पखवाड़े में आधे दिन का समय मणिनगर के लिए वो निकालते थे. उस दिन सभी संबंधित अधिकारियों के साथ लोगों की समस्याओं को सुलझाना और नई-पुरानी योजनाओं की समीक्षा. अधिकारियों को खास निर्देश कि जिस योजना का शिलान्यास करवा रहे हैं, उसका उदघाटन कब करवाएंगे, ये भी लक्ष्य निर्धारित करें. मई 2006 से जुलाई 2011 तक अहमदाबाद नगर निगम के आयुक्त रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी आईपी गौतम को भली-भांति याद है कि क्षेत्र की हर योजना के बारे में मोदी के पास उपयोगी सुझाव रहते थे कि कैसे उसे बेहतर किया जा सकता है.

विधायक बने तो मणिनगर में समस्याओं का अंबार था
जिस समय मोदी मणिनगर के विधायक बने, उस वक्त इलाके में समस्याओं की कोई कमी नहीं थी. स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत अच्छी नहीं थी, ढंग के स्कूल-कॉलेज नहीं थे, कपड़ा मिलों के बंद होने के बाद रोजगार के साधन नहीं थे, यातायात की सुविधाएं भी बदहाल थीं, ऐतिहासिक कांकरिया झील के किनारे गंदगी का साम्राज्य था. बारिश के दिनों में इलाके में जल जमाव हो जाता था, क्योंकि शहर के नरोड़ा इलाके की तुलना में मणिनगर में जमीन की सतह पांच मीटर नीचे थी. 2009 में नये सिरे से सीमांकन होने के पहले अमराईवाड़ी का इलाका भी मणिनगर विधानसभा क्षेत्र का ही हिस्सा था, अपराध की वारदातें आम थीं, पुलिस की व्यवस्था लचर थी. ट्रैफिक जाम की गंभीर समस्या थी, घंटों तक लोग एक-एक चौराहे पर फंसे रहते थे, गाड़ियां रेंगती रहती थीं. जमीन या मकानों के भाव शहर के पश्चिमी हिस्से के मुकाबले एक चौथाई भी नहीं थे.

लघु भारत जैसा है मणिनगर
ऐसी परिस्थिति में मोदी ने मणिनगर के लिए अपनी प्राथमिकताएं तय कीं. मणिनगर का इलाका ऐसा इलाका था, जहां लघु भारत के दर्शन आसानी से हो जाते थे. भारत का शायद ही कोई जिला ऐसा हो, जिसके निवासी तब के मणिनगर क्षेत्र में रहते नहीं थे. हर धर्म के लोगों की रिहाइश, इलाके में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च बड़ी तादाद में थे. सचिवालय में काम करने वाले दक्षिण भारतीय अधिकारी भी मणिनगर में इडली-डोसा की मशहूर दुकानों पर खाना खाने आते थे, मंदिरों में पूजा करते थे. पुराने रईस लोगों के साथ ही गरीबों की तादाद बड़ी थी, खासकर बेरोजगारों की. कपड़ा मिलों के बंद हो जाने के बाद इनमें काम करने वाले लोगों के परिवारों की हालत बुरी थी. ध्यान रहे, मिल मजदूरों के ही ये परिवार जनसंघ के जमाने में सबसे तेजी से पार्टी के साथ जुड़े थे

बंद पड़ी मिलों की जमीन पर बना स्पेशल इकोनॉमिक जोन
मोदी ने जब मणिनगर में विकास कार्यों की शुरुआत की, तो बंद पड़ी कपड़ा मिलों की जमीनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया, जिन मिलों के कैंपस में आवारा पशु घुमते रहते थे और असामाजिक लोग अपना अड्डा बनाए हुए थे. बंद पड़ी मिलों की जमीन पर ही मणिनगर इलाके में वो स्पेशल इकोनॉमिक जोन बना है, जहां निर्यात के लिए कपड़े और वस्त्र बनाने वाली इकाइयों में हजारों लोगों को रोजगार मिला है.

मोदी की विकास योजना के ब्लू प्रिंट के चार अहम पहलू थे. विकास के केंद्र में गरीब आदमी सबसे पहले हो, विकास योजनाओं का अल्पकालिक नहीं, दीर्घकालीन फायदा हो, विकास योजनाएं बिना रुकावट के लंबे समय तक चल सकें और इन्हें लागू करने में पारदर्शिता और ईमानदारी बरती जाए. सबसे बड़ी बात ये थी कि योजनाएं ऐसी लागू की जाएं, जिनकी जरूरत जीवन के हर स्टेज पर हो.

छोटे अस्पताल से रेडियोलॉजी तक की सुविधा
मोदी का ध्यान विधायक बनते ही सबसे पहले उस रुक्मिणी बेन प्रसूति गृह की तरफ गया, जो उनके विधायक कार्यालय के बगल में ही था. नगर निगम से संचालित होने वाला ये छोटा सा अस्पताल जर्जर हालत में था. मोदी ने इसकी शक्ल बदलने की सोची. छोटे से प्रसूति गृह को एक ऐसे अस्पताल में तब्दील कर डाला, जिसमें आज रेडियोलॉजी से लेकर अत्याधुनिक पैथ लैब की सुविधा उपलब्ध है, एलोपैथी से लेकर होम्योपैथ और आयुर्वेदिक उपचार मुहैया है, जहां आंख के ऑपरेशन की ऐसी अद्यतन सुविधा मौजूद है, जहां पर किसी भी किस्म के संक्रमण का खतरा नहीं के बराबर है.

इलाके में पहले से मौजूद एलजी हॉस्पिटल का भी न सिर्फ कायाकल्प किया गया, बल्कि वहां पर मेडिकल कॉलेज भी खोला गया. बाद में इलाके में एक डेंटल कॉलेज भी बना. पहले इलाके के लोग सीधे मुख्य सिविल अस्पताल का रुख करते थे, वो सिलसिला थम गया. अस्पतालों के साथ जुड़े मेडिकल कॉलेजों के संचालन के लिए अहमदाबाद नगर निगम ने सेल्फ फाइनेंस योजना की शुरुआत की, एक सोसायटी का निर्माण कर, जो पूरे देश में आज स्वीकृत मॉडल है.

विदेशी भाषाओं से लेकर टेंपल मैनेजमेंट तक की पढ़ाई का इंतजाम
सेहत के साथ ही शिक्षा की हालत बेहतर हो, उस पर भी मोदी ने पर्याप्त ध्यान दिया. नगर निगम के प्राथमिक स्कूलों को आधुनिक बनाया गया, किसी भी प्राइवेट स्कूल को मात करने वाले, जहां गुजराती के साथ अंग्रेजी भी पढ़ाई गई, छोटे बच्चों के खेल और मनोरंजन की व्यवस्था की गई. उच्च शिक्षा के लिए एक बंद पड़ी मिल की जमीन पर ही केका शास्त्री शिक्षा संकुल को विकसित किया गया, जिसके अंदर आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस की पढ़ाई के साथ ही बीबीए, एलएलबी, एमसीए जैसे प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों की सुविधा भी मुहैया कराई गई. यहां छात्र विदेशी भाषाएं सीखने के साथ ही मंदिरों का प्रबंध कैसे किया जाए, इसके लिए टेंपल मैनेजमेंट की भी विधिवत पढ़ाई कर सकते हैं. जिन केका शास्त्री के नाम पर इस संकुल का नाम रखा गया, वो गुजरात के मशहूर विद्वान थे, जिन्होंने अपने शतकीय जीवन में भारतीय संस्कृति को लेकर गहन अध्ययन कर किताबें लिखी, विश्व हिंदू परिषद के भी संस्थापक सदस्य रहे.

मणिनगर में बनाया आईआईटी ‘राम’
मोदी को इतने से ही संतोष नहीं हुआ. उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का संस्थान भी मणिनगर में बनवाया, जिसके शैक्षणिक तौर पर पालन-पोषण की जिम्मेदारी आईआईटी गांधीनगर को दी गई. इस संस्थान को नाम दिया गया इंस्टीट्यूट ऑफ इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी, रिसर्च एंड मैनेजमेंट, जो आईआईटी राम के तौर पर अब देश-दुनिया में मशहूर है अपने अत्याधुनिक लैब, अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं और बेहतरीन शिक्षण के लिए. मोदी ने उदघाटन के लिए अक्टूबर 2013 में लालकृष्ण आडवाणी को न्यौता दिया और इस कार्यक्रम में खुद आडवाणी ने मोदी को देश के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया, उनकी जमकर तारीफ की, जिन मोदी को महीने भर पहले ही बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर पीएम उम्मीदवार के तौर पर पेश किया था.

शैक्षणिक संस्थानों के अलावा इलाके में बड़े-बड़े बगीचे, स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स, मल्टिलेवल ऑटोमेटेड पार्किंग, डबल डेकर फ्लाईओवर का निर्माण किया गया. ट्रांस स्टेडिया नामक जिस इनडोर स्टेडियम का निर्माण आबाद डेरी की जगह पर निजी क्षेत्र के सहयोग से बिल्ड, ऑपरेट, ट्रांसफर मॉडल पर किया गया, आज वहां कबड्डी से लेकर फुटबॉल तक के अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच हो रहे हैं.

ऐतिहासिक झील का री-डेवलपमेंट
ऐतिहासिक कांकरिया झील का री-डेवलपमेंट मोदी के मणिनगर प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा रहा. सल्तनत काल में निर्मित हुई ये झील इक्कीसदीं सदी तक आते-आते गंदगी का पर्याय बन गई थी. झील के अंदर का पानी गंदा, किनारे गंदगी का अंबार. मोदी ने नगर निगम के साथ मिलकर झील और आसपास के इलाकों को फिर से विकसित करने की योजना बनाई. मशहूर आर्किटेक्ट विमल पटेल को इस परियोजना से जोड़ा गया. झील के पानी में ऑक्सिजन का स्तर बढ़ाने के लिए उपकरण लगाये गये, किनारों पर सुंदर पत्थर लगाये गये. एक हिस्से में बटरफ्लाई पार्क बना, तो दूसरे हिस्से में अत्याधुनिक स्केटिंग रिंग सहित तमाम खेलों की सुविधा, हेलियम गुब्बारा के जरिये आसमान की सैर लोग करने लगे.
कांकरिया में जो अत्याधुनिक किड्स सिटी बनी, उसके अंदर आइसक्रीम बनाने से लेकर फायर ब्रिगेड कैसे काम करता है, इसकी तक सजीव जानकारी दी जाने लगी, जिसमें बच्चे खुद शामिल होते थे. यही नहीं, चाहें तो बच्चे नरेंद्र मोदी का खुद इंटरव्यू करने का अहसास कर लें. अपनी तरह की भारत की ये पहली किड्स सिटी थी. कांकरिया के किनारे अटल एक्सप्रेस नामक मिनी ट्रेन भी दो जोड़ियों में चलने लगी, जिसके डब्बे लंदन से मंगाये गये थे. खान-पान की व्यवस्था से लेकर बटरफ्लाई पार्क तक. उस कांकरिया झील की तस्वीर बदल गई, जिसके नजदीक कोई पहले बदबू और गंदगी के मारे जाना नहीं चाहता था और आज ये अहमदाबाद आने वाले हर सैलानी की लिस्ट में शामिल होता है, शहर के स्थानीय लोगों का तो कहना ही क्या.

कांकरिया कार्निवल, भारत जोड़ो अभियान जैसा
करीब तीस करोड़ रुपये की लागत से कांकरिया झील के नये सिरे से विकास की परियोजना पूरी होने के बाद मोदी ने नगर निगम के सहयोग से इस झील के किनारे 2008 से कांकरिया कार्निवल का सालाना आयोजन भी शुरु कर दिया. 25 दिसंबर से लेकर 31 दिसंबर तक चलने वाले इस आयोजन को लोक उत्सव बना दिया गया. बाहर से आकर मणिनगर में बसे लोग भी यहां अपनी संस्कृति की झलक दिखला सकें, इसके लिए मोदी ने तत्कालीन मेयर असित वोरा को जिम्मेदारी सौंपी, जो खुद संगीत की अच्छी समझ रखते हैं. पंजाब के गरबा और गिद्दा से लेकर दक्षिण के राज्यों के लोकनृत्य भी यहां पेश होने लगे. सभी लोगों को ये उत्सव अपना लगने लगा, मोदी के लिए तो ये भारत जोड़ो अभियान की शुरुआत जैसा था. कार्यक्रम के आखिरी दिन मानव श्रृंखला बनाई जाती थी, जिसमें देश के हर हिस्से से मणिनगर में आकर बसे लोग शामिल होते थे.

कांकरिया कार्निवल के इस हफ्ते भर लंबे कार्यक्रम के जरिये न सिर्फ यहां रहने वाले तमाम लोग आपस में जुड़े, तमाम संस्कृतियों का मिलन हुआ, बल्कि यही लोग जब अपने मूल राज्यों में छुट्टियों पर गये, तो अपने मणिनगर में विधायक के तौर पर मोदी के किये हुए विकास कार्यों की गाथा ही नहीं, पूरे राज्य में हुए विकास की चर्चा भी की. इस तरह से मोदी का गुजरात विकास मॉडल उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जरिये देश के हर हिस्से में पहुंचा, और उनके विरोधियों को खबर तक नहीं लगी.

सभी संवेदनशील इलाकों में पुलिस थाने खुलवाए
अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों से जुड़ने के मोदी ने और भी रास्ते अपनाये. इलाके में रहने वाले हर संप्रदाय के लोग अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें, एक-दूसरे के प्रति मन में अविश्वास न रखें, इसलिए सभी संवेदनशील इलाकों में पुलिस की चौकियां और नये थाने बनाए. मोदी जब मणिनगर इलाके के विधायक बने थे, उस वक्त दो ही पुलिस थाने मणिनगर और अमराईवाड़ी हुआ करते थे. मोदी के समय में दो और नये थाने बने रामोल और इसनपुर. थानों की इमारत भी आधुनिक और सभी सुविधाओं से लैस, जहां थाना प्रभारी के पास भी आराम करने की जगह मौजूद थी, ताकि काम के लंबे घंटों में भी कोई परेशानी नहीं हो. संवेदनशील इलाकों के इन थानों के साथ ही स्टेट रिजर्व पुलिस की बैरकें भी बनवाईं.

जिन इलाकों में जल्दी जाने में पुलिस वाले भी घबराते थे, उन इलाकों में कानून-व्यवस्था का राज कायम हुआ, अपराधी या तो इलाका छोड़कर भाग गये या फिर जेल की सलाखों में गये. आपराधिक घटनाएं न के बराबर होनें लगी. अगर कोई घटना हो भी जाए, तो मोदी का सीधा फोन अधिकारियों पर, नतीजा ये हुआ कि पुलिस वाले भी हमेशा सतर्क रहे, आखिर मोदी मुख्यमंत्री और इलाके के विधायक ही नहीं, उनके अपने गृह विभाग के कैबिनेट मंत्री भी थे. मोदी के समय में ही अहमदाबाद पुलिस के सेक्टर-2 का ऑफिस भी मणिनगर इलाके में बना.

दीनदयाल योजना के तहत 20 हजार मकान बनवाए
कचरे और गंदगी से भरी नहरों को साफ करा, उनके किनारे मोदी ने सौंदर्यीकरण करवाया. जिन इलाकों में पहले जमीन या फिर मकान की कोई कीमत नहीं लगती थी, उनकी कीमत में दस गुने तक का फर्क आया. मोदी ने गरीबों की भी चिंता की, इलाके में दीनदयाल गरीब आवास योजना के तहत बीस हजार से भी अधिक मकान बने. ये मकान भी हुडको के 17 वर्ग मीटर के पुराने मानक के हिसाब से नहीं, गरीबों की समस्याओं का अंदाजा लगाते हुए 27 वर्ग मीटर की कार्पेट साइज वाले बने. इसी मॉडल को साल भर बाद 2008 में मनमोहन सिंह की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने स्वीकृत किया और 25 वर्गमीटर के कार्पेट साइज वाले मकान गरीबों के लिए हों, ये निर्धारित किया.

सड़क, रास्ता, बिजली, पानी, स्ट्रीटलाइट जैसी रुटीन समस्याएं तो ऐसे ही दुरुस्त हो गईं. इलाके में जो योजना निगम के बजट से बनती थी, वहां निगम का बजट इस्तेमाल किया गया, जो योजना विधायक फंड से हो सकती थी, उसके लिए विधायक फंड का इस्तेमाल किया गया, जिस योजना में राज्य सरकार की जरूरत थी, वहां राज्य सरकार का फंड इस्तेमाल किया गया और जिस योजना को निजी क्षेत्र के सहारे विकसित किया जा सकता था, वहां प्राइवेट सेक्टर की मदद ली गई. परिणाम ये हुआ कि करीब साढे ग्यारह साल के अंदर मणिनगर की तस्वीर बदल गई, जिसे मणिनगर के लोग आज भी याद करते हैं. खास बात ये कि सिर्फ मणिनगर में ही विकास कार्य नहीं हुए, बल्कि अहमदाबाद के पूर्वी हिस्से में बाकी विधानसभा क्षेत्रों में भी पुलों और सड़कों का जाल बिछाया गया.
लोगों से सीधा जुड़ाव, पतंग भी साथ उड़ाए
काम तो एक तरफ, लेकिन जन प्रतिनिधि के तौर पर लोगों से सीधा जुड़ाव, मोदी ने ये भी सुनिश्चित किया. मकरसंक्रांति में पतंग उड़ाने के लिए हर साल मोदी जाते रहे, ऐसे घरों में भी जहां सीढ़ियां चढ़ने में भी परेशानी होती थी. गणेश चतुर्थी के मौके पर पंडालों का दौरा. यही नहीं, नवरात्रि के समय सभी वार्डों के गरबा मैदानों पर जाना, बंगाली समाज के दशहरा उत्सव में भी शामिल हुए. संभव हुआ, तो हर्ष या विषाद के मौके पर सीधे पहुंचना, नहीं संभव हुआ, तो संदेश जरूर भेजना.

जब 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट हुए, तो स्थानीय पुलिस के मना करने के बावजूद मोदी अपने इलाके में रात के दौरान ही गये, अस्पतालों और उन जगहों का दौरा किया, जहां इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों ने टाइमर का इस्तेमाल करते हुए बम फोड़े थे. पुलिस वाले चिंता में थे कि टाइमर वाले बम कही फूट न जाएं, लेकिन मोदी ने इसकी चिंता नहीं की और अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों के बीच गये, मरने वालों के परिवार वालों को सांत्वना दी, दोषियों को नहीं बख्शने का आश्वासन दिया और सुनिश्चित किया कि सभी आतंकी शीघ्र पकड़े जाएं और उन्हें सजा दिलाई जा सके.

बैठक में अपना टिफिन लेकर आते थे
मोदी मणिनगर में ऐसे मौकों पर ही नहीं गये, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए बीस से भी अधिक मौकों पर मणिनगर में टिफिन बैटकें भी की. टिफिन बैठक यानी हर आदमी घर से टिफिन में खाना लेकर आए और एक जगह बैठकर सब आपस में चर्चा करें, सलाह-सूचना दें और लोगों की समस्याओं का हल निकाला जाए. मोदी खुद अपना टिफिन लेकर आते थे. मोदी के बाद मणिनगर के विधायक बने सुरेश पटेल, जो मोदी के एमएलए रहते हुए मणिनगर क्षेत्र के बीजेपी अध्यक्ष थे, उस समय को आज भी याद करते हैं, जब मोदी ने गांधीनगर के मंत्री आवास परिसर में प्रमुख कार्यकर्ताओं को बुलाया था और उनके साथ टिफिन बैठक की थी.

दूसरे विधायकों के लिए चुनौती हैं मोदी के विकासकार्य
मणिनगर के ही निवासी और अहमदाबाद के मेयर रह चुके असित वोरा को भी याद है कि क्षेत्र की एक-एक समस्या को दूर करने के लिए मोदी कितने गंभीर थे. यहां तक कि इलाके में श्मशानगृह को भी उन्होंने आधुनिक बनवाया, सीएनजी से अंतिम संस्कार हो, ताकि पर्यावरण का भी कम नुकसान हो और लोगों को सुविधा भी हो, ये सुनिश्चित किया. संदेश साफ था, जन्म से लेकर मरण तक, और बीच में शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, रोजगार से लेकर मनोरंजन, खेल से लेकर कला और सुरक्षा से लेकर सुशासन तक, जनता को हर चीज बेहतर मिले. मोदी ने बतौर विधायक वो लंबी लकीर खीच दी, जिसकी चर्चा मणिनगर सहित पूरे गुजरात और देश में होती है. चुनौती उन नेताओं के लिए है, जो एमएलए तो बन जाते हैं, लेकिन अपने इलाके का ढंग से विकास नहीं कर पाते. मोदी ने प्रसूति गृह से लेकर अस्पताल और मेडिकल-डेंटल कॉलेज, आधुनिक सरकारी स्कूलों से लेकर आईआईटी-राम जैसा हाईटेक शिक्षण संस्थान तक, कांकरिया झील के किड्स ज़ोन से लेकर अप्पारेल पार्क स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन तक और ट्रांस स्टेडिया जैसे अत्याधुनिक इंडोर स्टेडियम से लेकर डबल डेकर फ्लाई ओवर और गैस आधारित श्मशान गृह तक, मोदी ने मणिनगर को ये सब कुछ दिया विधायक के तौर पर.

मोदी का मणिनगर मॉडल पूरे देश के लिए उपयोगी हो सकता है. हर किस्म की खाई को पाटते हुए लोगों के जीवन को बेहतर करने का जरिया बना ये मॉडल, जिसकी गवाही देने के लिए मणिनगर विधानसभा क्षेत्र के मौजूदा निवासी तो हैं ही, वो भी हैं, जो 2012 में नये सीमांकन के बाद अमराईवाड़ी विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा बन गये.

मणिनगर विकास मॉडल, संपूर्ण विकास का मिनी मॉडल
चुनौती सुरेश पटेल जैसे लोगों के लिए भी है, जो अब मोदी के विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. और शायद संतोष सिर्फ मोदी को ही नहीं हो, बल्कि आईपी गौतम को भी हो, जो आईएएस से रिटायर होने के बाद लोकपाल के सदस्य हैं, दिलीप ठाकर जो फिलहाल गुजरात के मुख्य सूचना आयुक्त हैं, और विमल पटेल, जो कांकरिया के विकास के बाद अब दिल्ली में कैपिटल विस्टा प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. ये सभी मोदी की अगुआई में हुई मणिनगर की विकास यात्रा के गवाह रहे हैं. गवाही तो लंबे समय तक मेट्रो की पटरियां और बीआरटीएस के ट्रैक भी देते रहने वाले हैं, साथ में गुरुजी ब्रिज, दीनदयाल उपाध्याय बीजेपी कार्यालय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी नगर निगम ऑफिस, भैरों सिंह शेखावत ब्रिज और कुशाभाउ ठाकरे ऑडिटोरियम जैसी इमारतें और पुल भी देंगे, जो मोदी के मणिनगर विकास मॉडल के अमिट सबूत हैं, साथ ही उनके गुजरात मॉडल का आधार और भारत के संपूर्ण विकास का मिनी मॉडल भी, जिससे ली हुई सीख को मोदी अब पूरे देश में लागू कर रहे हैं देश के प्रधानमंत्री के तौर पर.

मणिनगर ने अहमदाबाद में पूर्व और पश्चिम के बीच विकास की खाई को पाट दिया था, अब पीएम के तौर पर मोदी की राष्ट्रीय स्तर पर यही प्राथमिकता है, पश्चिमी और पूर्वी भारत के बीच विकास के अंतर को खत्म करना, शहरों की तरह गांवों में भी सुविधाएं मुहैया कराना, अमीर-गरीब के बीच की खाई पाटना . इसके लिए सार्थक कदम पिछले छह साल में उन्होंने उठाए हैं, और अब भी प्रयास जारी हैं. मणिनगर से संघ प्रचारक के तौर पर पांच दशक पहले समाज सेवा की शुरुआत करने वाले मोदी आज भारतीय राजनीति में अपनी उपलब्धियों के कारण मील का पत्थर बन चुके हैं, लंबी लकीर खीच चुके हैं. जाहिर है, देश की जनता उनसे देश भर में मणिनगर के पुनरावर्तन की उम्मीद कर रही है, मोदी का लक्ष्य भी यही है.

Originally Published: News18

 


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