कोट-पैंट और टोपी छोड़कर आखिर कब खादी पर आ गए बापू

Bapu in his coat and pants

महात्मा गांधी चाहते थे कि खादी राष्ट्रीय कपड़ा बने। उनका मानना था कि अगर खादी का उपयोग हर भारतीय करेगा तो यह अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटने का सबसे बेहतर तरीका होगा। लेकिन आज करीब 150 साल बाद 21वीं सदी में खादी अब फैशन स्टेटमेंट के रूप में पहचान बना रहा है। हालांकि ये ऐसा बदलाव है जो गांधीजी के दृष्टिकोण से काफी अलग है।

दरअसल, गांधी जी खादी में किसी फैशन को नहीं बल्कि उसके जरिये स्वरोजगार, स्वदेशी जैसे मुद्दों को देखते थे। लेकिन बावजूद इसके गांधी जी बाद भी खादी ने अपनी खास जगह फैशन के रूप में भी बनाई है। बहरहाल, आइए जानते हैं कभी कोट पैंट पहनने वाले बापू ने कभी चुना खादी को अपने पहनावे के रूप में।

शुरुआत में गांधीजी भी कोट-पैंट और टोपी पहनते थे। फिर उन्होंने धोती, एक लंबा कोट और पगड़ी पहनना शुरू कर दिया। हालांकि, 22 सितंबर 1921 ये वो समय था जब महात्मा गांधी ने अपनी पोशाक बदलने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। गुजराती पोशाक से, उन्होंने एक साधारण धोती और शॉल पहनने का फैसला किया।

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यह निर्णय गांधी जी ने मदुरै में लिया गया था जब उन्होंने फैसला किया कि उन्हें भारत के गरीब लोगों के साथ काम करना है और अगर वे उनसे अलग कपड़े पहनते हैं तो वे उनके साथ कैसे चल सकते हैं। खास बात तो ये कि धोती और शॉल अपनी विदेश यात्रा से लेकर अंतिम क्षण तक पहनना नहीं छोड़ा।

उन्होंने एक बार कहा था कि, ‘वो मदुरै था जिसने उन्हें अपने अपने पारंपरिक पोशाक पहनने पर निर्णय लेने की क्षमता दी। मेरी इच्छा है कि सभी भारतीय स्वदेशी का मतलब समझ सकें। ” देश भर में स्थापित खादी ग्रामोदय स्टोर्स ने खादी को पुनर्जीवित करने में मदद की है। कपड़े को अब आधुनिक डिजाइनरों के मार्गदर्शन का लाभ मिल रहा है। भारतीय समाज के सभी वर्गों में खादी का इस्तेमाल किया जाता है।

गुलाम भारत में खादी ने ब्रिटिश शासन से आजादी के लिए मुहीम छेड़ी थी। आजाद भारत में खादी एक फैशन स्टेटमेंट बनता जा रहा है। परिवर्तन से पता चलता है कि कपड़ों के पैटर्न का इतिहास कैसा होता है जो किसी समूह और व्यक्तिगत पहचान से जुड़ा होता है।

(Disclaimer: This article is not written By IndiaFirst, Above article copied from Amar Ujala)