जब अटल जी ने खोला पोखरण परमाणु परीक्षण से जुड़ा राज

भारत की राजनीति वैसे तो कई सितारे हुए है लेकिन एक सूरज भी हुआ है जिसे देश अटल बिहारी के नाम से जानता है। एक ऐसा सूरज जिसमे जितना तेज था उतन ही बल भी। अटल जी वो नाम है जो सत्ता पक्ष में हो या फिर विपक्ष में हमेशा देश की भलाई के बारे में ही सोचा उसका जीता जागता उदाहरण था पोखरण परमाणु परीक्षण। चलिये इससे जुड़ा एक राज हम आपको बताते है।

जब अटल जी ने पीवी नरसिंह राव को दिया श्रेय

राजनीतिक दलों- राजनेताओं द्वारा उपलब्धियों और योजनाओं को अपना बताकर श्रेय लेने की होड़ कौन नहीं जानता। शुचिता और स्पष्टवादिता राजनीतिक दलों में अब सुनाई और दिखाई नहीं देती लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी इस मामले में हमेशा अपवाद रहे। ग्वालियर के एक आयोजन में उन्होंने मंच से पोखरण में परमाणु बम परीक्षण का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को दिया था। अटलजी की इसी साफगोई के विपक्षी दल भी कायल थे। बात 2004 की है। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद अटलजी अपना जन्मदिन मनाने तीन दिवसीय प्रवास पर ग्वालियर आए थे। 25 दिसंबर को उनका जन्मदिन था और अगले दिन यानी 26 दिसंबर को उन्होंने मध्यभारत हिंदी साहित्य सभा के शताब्दी वर्ष समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने की सहमति दी थी। साहित्य सभा के तत्कालीन महामंत्री कृष्णकांत शर्मा बताते हैं कि भगवत सहाय सभागार में आयोजित इस समारोह में उन्होंने एक ऐसा राज खोला, जिससे सभी चकित रह गए। अटलजी ने कहा था-1996 में जब मैं पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहा था, तभी पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव मेरे पास आए और हाथ में एक कागज थमा दिया। उस पर लिखा था ‘बम पूरी तरह तैयार हो चुका है, इसको सिर्फ फोड़ना है, पीछे नहीं हटना है।’ हालांकि प्रधानमंत्री के रूप में अटलजी को परमाणु बम का परीक्षण करवाने का मौका अपने तीसरे कार्यकाल में 1999 में मिला। पोखरण में हुए इस परीक्षण ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। शर्मा कहते हैं कि अटलजी ने परमाणु परीक्षण का श्रेय नरसिंह राव को देकर अपने विशाल हृदय होने का उदाहरण दिया था।

जिनका विरोधी भी करते थे सम्मान  

अगर अटल जी के लिए कहा जाये कि वो भारत के मात्र एक ऐसे नेता थे जिन्हे हर पार्टी सम्मान करती थी तो गलत न होगा। अटल जी के लिए उनके विरोधी कहते थे कि आप तो बहुत अच्छे है लेकिन आपकी पार्टी नही अच्छी है। तो कुछ लोग अटल जी के भीतर एक संन्यासी को देखते थे वो बोलते थे कि अटल जी भारतीय लोकतंत्र के वो संत है जो विरोध से परे है। ऐसा इसलिये बोला जाता था क्योकि वो विपक्ष में रहकर भी हमेशा सत्ता पक्ष का विरोध तो जरूर करते थे लेकिन एक मर्यादा में और जब जब सत्तापक्ष को उनकी जरूरत हुई वो आगे आकर उनकी मदद करते हुए दिखाई दिये फिर वो संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत की ताकत को दिखाना हो या फिर दूसरे मंच के जरिए विश्व को ये बताना हो कि भारत का लोकतंत्र कितना मजबूत है। इसीलिये अटल जी आज भी हमारे साथ है।

अटल जी को लेकर ऐसे कई किस्से है जो ये बताते है कि अटल जी का दिल कितना साफ था और इसीलिये वो भारतीयों के दिल में आज भी रहते है।