गांधी की कौन सी ऐसी शर्त थी जिसे सुनकर उद्योगपति बिड़ला चौक गये थे?

भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी को उनके 150वें जन्मदिन 2 अक्टूबर को याद किया जाएगा. उनके विचारधाराओं को आज भी जीवन में उतारने से आप भी सफलता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होंगे. अहिंसा और दूसरों की मदद करना उनके विचारों में सबसे ऊपर था वैसे तो गांधी जी को लेकर कई किस्से है लेकिन चलिये आज हम आपको वो किस्सा बताते है जो आप ने कम ही पढ़ा होगा। जी हां चरित्र से सौम्य गांधी जी ने जब उस दौर के जाने माने उद्योगपति घनश्याम बिड़ला के सामने एक शर्त रख दी थी।

ये बात 1939 सिंतबर महीने की है। जब राजधानी के मंदिर मार्ग स्थित प्रसिद्ध बिड़ला मंदिर यानी लक्ष्मीनारायण मंदिर का उद्घाटन करने के लिए उद्योगपति घनश्याम बिड़ला ने महात्मा गांधी से अनुरोध किया तो उन्होंने एक शर्त रख दी। गांधी ने स्पष्ट कहा कि वे मंदिर का उद्घाटन करने के लिए तैयार हैं, पर उनकी एक शर्त है। अगर उस शर्त को माना जाएगा तब ही वह मंदिर का उद्घाटन करेंगे।

मंदिर में हरिजनों को मिले प्रवेश

घनश्याम बिड़ला ने सोचा भी नहीं था कि उन्हें गांधी से इस तरह का उत्तर मिलेगा, क्योंकि बापू से उनके काफी मधुर संबंध थे। ऐसे मे बिड़ला ने बापू से शर्त पूछी। उन्होंने कहा कि मंदिर में हरिजनों के प्रवेश पर रोक नहीं होगी। दरअसल उस दौर में मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश पर अनेक तरह से अवरोध खड़े किए जाते थे। पूजा करने के लिए धर्म के ठेकेदार उन्हें मंदिर के अंदर नहीं जाने देते थे। जब गांधी को आश्वासन दिया गया कि बिड़ला मंदिर में हरिजनों के प्रवेश पर रोक नहीं होगी तो वह मंदिर के उद्घाटन के लिए राजी हो गए। उसके बाद बिड़ला मंदिर का 1939 में विधिवत उद्घाटन हुआ।

गांधी ने अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में अप्रैल, 1925 में लिखा भी था, ‘मंदिरों, कुओं और स्कूलों में जाने पर जाति के आधार पर किसी भी तरह की रोक गलत है।’उन्होंने 7 नवंबर, 1933 से 2 अगस्त, 1934 के बीच छूआछूत खत्म करने के लिए देशभर की यात्रा भी की थी। इसे गांधी की ‘हरिजन यात्रा या दौरा के नाम से याद किया जाता है। दोपहर साढ़े 12 बजे हजार मील की उस यात्रा में गांधी ने छूआछूत के खिलाफ जन-जागृति पैदा की थी।

बहरहाल, गांधी उद्घाटन करने के बाद दोबारा फिर कभी मंदिर नहीं आए। वह 12 जनवरी, 1915 को पहली बार दिल्ली आए थे। और अपनी अंतिम सांस भी इसी दिल्ली में 20 जनवरी, 1948 को लिया। इस दौरान वे दिल्ली में आते-जाते रहते रहे। वे धार्मिक स्थानों में लगभग नहीं जाते थे, लेकिन उनकी प्रार्थना सभाओं में सभी धर्मों की पुस्तकों का पाठ जरूर होता था। गांधी जी की इसी सोच को खत्म करने के लिये मोदी सरकार भी कई बड़े कदम उठा रही है। मिसाल के तौर पर सबका साथ सबका विकास की विचारधारा भी गांधी जी के विचारो से ही प्रेरित है। और इसीलिये सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओ से सभी का भला हो रहा है। और अब तो लोग भी कहने लगे है कि गुजरात के संत का सपना गुजरात के ही बेटे के द्वारा पूरा भी हो रहा है।