ऐसा क्या हुआ कि अपने ही दाव में फंसी नेपाल की सरकार 

चीन नेपाल को लेकर जो पैतरेबाजी रचने का काम कर रहा था, वो अब फेल होती जा रही है। साथ ही चीन के इसारों पर भारत से दुश्मनी लेने वाले नेपाल के पीएम ओली को मुंह की खानी पड़ी है। लिपुलेख और कालापानी को अपनी सीमाओं में दिखा कर बेतुका विवाद खड़ा करने की मंशा भी धरी की धरी रह गयी है।

भारत के खिलाफ ओली की ‘नक्शेबाजीफेल

चालबाज चीन और उसके कहने पर चलने वाले नेपाल के पीएम ओली की साजिश को खुद नेपाल की जनता और वहां की संसद ने मुहंतोड़ जवाब दिया है। जैसे ही केपी शर्मा ओली नक्शे का प्रस्ताव लाये वैसे ही नेपाली जनता ने उनका विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद जब वो प्रस्ताव को लेकर संसद पहुंचे तो पहली बार में प्रस्ताव संसद में पेश ही नहीं हो पाया। जैसे-तैसे संसद में पेश हुआ फिर पास भी हुआ  लेकिन विरोध के स्वर के बीच वही जनता ने भी इस प्रस्ताव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जिसके बाद अब अपनी नाक और मामले को सही करने के लिए नेपाली पीएम ने एक नई चाल चली है। ओली सरकार ने इस मामले को लेकर एक कमेटी बनाई है जो ये साक्ष्य इकट्ठा करेगी कि कालापानी की जमीन किसकी है। नेपाल सरकार ने कैबिनेट बैठक का फैसला सुनाते हुए पत्रकार सम्मेलन में कहा कि सरकार ने भारत के साथ सीमा विवाद पर ठोस प्रमाण और दस्तावेज जुटाने के लिए 9 सदस्यों वाली विशेषज्ञों की एक टीम का गठन किया गया है। खतिवडा के मुताबिक नेपाल सरकार की आधिकारिक थिंकटैंक संस्था नीति अनुसंधान प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉक्टर विष्णुराज उप्रेती को इसका संयोजक बनाया गया है। इस समिति में सीमा विशेषज्ञ, भूगोल विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय कानून के ज्ञाता, पुरातत्वविद् आदि को रखा गया है। हालांकि सरकार के इस फैसले पर कूटनीतिक मामलों के जानकार हैरानी में हैं। नेपाल के जाने माने कूटनीतिक विशेषज्ञ डॉक्टर अरुण सुवेदी ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि जो काम पहले करना चाहिए वो काम अब किया जा रहा है। पहले नक्शा प्रकाशित कर फिर संसद में उस पर सरकार संशोधन प्रस्ताव लेकर आई और अब प्रमाण ढूंढने का काम कर रही है। जबकि पहले प्रमाण जमा कर कूटनीतिक वार्ता करनी चाहिए थी।

क्या है नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद

भारत के उत्तराखंड और नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रदेश प्रांतों के बीच दोनों देशों की सीमा पर एक विवादित इलाका है, जिसे कालापानी इलाका कहते हैं. ये इलाका कालापानी नदी की घाटी में फैला हुआ है। भारतीय श्रद्धालु इसी घाटी से हो कर कैलाश-मानसरोवर की तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। इस इलाके में सबसे ऊंचाई पर एक दर्रा है जिसे लिपुलेख दर्रा कहते हैं, वहां से उत्तर-पश्चिम की तरफ कुछ दूर एक और दर्रा है जिसे लिंपियाधुरा दर्रा कहते हैं लिपुलेख और कालापानी घाटी से ले कर लिंपियाधुरा तक पूरा का पूरा विवादित इलाका है। भारत इसे अपने अधीन होने का दावा करता है और नेपाल अपने. लेकिन 1998 से दोनों देशों के बीच इस विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत चल रही है। लेकिन नेपाल ने इस विवाद को एकाएक बढ़ा दिया हालाकि भारत ने मौन रहकर ही इस मामले को कमजोर करने की नीति अपनाई जिसका असर ये देखा गया कि खुद नेपाल में भी ओली सरकार के विरोध में सुर बजने लगे हैं।

कुलमिलाकर चीन की साजिश को नेपाल की जनता अच्छी तरह से समझ गई है और वो अच्छी तरह से जानती है कि भारत के साथ उसका बेटी और रोटी का रिश्ता है, जबकि चालबाज चीन इस रिस्ते को कुछ अपने मोहरो के जरिये बिगाड़ना चाहती है तभी तो ऐसे विवाद को हवा दिया जा रहा है। बहरहाल ओली सरकार ने अब जो समिति गठित किया है उससे साफ हो गया है कि उसके पास कोई पुख्ता साक्ष्य नही है कि ये इलाका उसका अभिन्य अंग है जबकि भारत के पास ऐसे कई साक्ष्य है जो ये बताता है कि लिपुलेख और कालापानी भारत का ही अभिन्न अंग है।