गांव गांव होंगे रोजगार से रौशन

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अपना घर तो अपना ही होता है, वहां कुछ ऐसी यादें बसती हैं जिन्हें लोग कभी नही भूल सकते लेकिन  दो जून की रोटी के लिए लोगों को अपने सपने पोटली में बांधकर शहर की ओर रूख करना पड़ता है क्योंकि वहां उनके गांवों से ज्यादा बेहतर रोजगार मोहईया हो पाता है। लेकिन अब इस बात की चिंता खत्म हो जायेगी क्योंकि अब आपके गांव में ही रोजी रोटी के बेहतर साधन उपलब्ध होने वाले हैं। कोरोना संकट के बाद कुछ इसी तरह की तैयारी की जा रही है कि  गांव के पास ही बड़ी कंपनियां पहुंचे जिससे लोगों को रोजगार के लिए भटकना न पड़े।

गांव शहरों में रोजगार को लेकर बनाया जायेगा बैलेंस

कोरोना संकट के दौरान देश में लॉकडाउन होने से सिर्फ देश में कोरोना माहामारी को फैलने से ही नही रोका बल्कि इस मौके पर आर्थिक पहिया कैसे तेज गति में चले इसका भी समाधान निकाला गया। सबसे पहले देखा गया कि ऐसे हालात में प्रवासी श्रमिकों को लेकर काफी परेशानी हुई ऐसे में अब सरकार और बड़े-बड़े उघोगपति ये तय कर रहे हैं कि कंपनियां ज्यादातर देश के उन गांवों के करीब लगाया जाये जहां से श्रमिकों का प्रवास ज्यादा होता है। जिससे रूरल से अरबन की ओर पलायन नहीं बल्कि अरबन से रूरल इलाकों की ओर रिवर्स माइग्रेशन  हो, एक तरह से कहें तो यह रूरल अरबन रीबैलेंस होगा। अब उन्हें घर के आसपास ही रोजगार मिलेगा और वे अपने परिवार के साथ रहेंगे। उन्हें शहरों में स्लम एरिया में रहने से मुक्ति मिलेगी।

बड़ी कंपनियां लगाएंगी वहीं फैक्ट्री

खुद देश के पीएम मोदी ने CII की बैठक में देश के बड़े कारोबारी घरानों से अपील की है कि वो देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आगे आएं और उन इलाकों में रोजगार की संभावना ज्यादा खोजे जहां अभी तक रोजगार मिलना मुश्किल रहा है। वैसे भी अब देश के गांव वो गांव नही रह गये है जहां कंपनियां खोलना दिक्कत भरा होता था क्योंकि देश के अधिकतर गांव के करीब बिजली पानी और इंटरनेट के साथ-साथ सड़कों का विस्तार भी हो चुका है। जिससे कंपनियां इस ओर रूख करने से इतरा भी नही रही है।

गांवों में ही मिल जाएंगे कुशल मजदूर

देखा जाये तो कंपनियों को कुशल श्रमिकों की जरूरत है तो लॉकडाउन के चलते जो कुशल श्रमिक अपने घर की ओर पलायन कर गये हैं ऐसे में गांव तक कंपनिया पहुंचती है तो दोनो का ही काम आसानी से हो जायेगा। वैसे ही कई राज्य उन मजदूरों को स्पेशल स्किल देने का काम भी कर रही है जो कुशल नही हैं। ऐसे में विकास की नई गंगा गांव से ही निकलेगी।

मतलब साफ है कि 2020 अगर कोरोना के कहर के लिए जाना जायेगा तो दूसरा भारत के नवनिर्माण के लिए भी जाना जाएगा क्योंकि पहली बार ऐसा देखा जायेगा कि देश आत्मनिर्भर बनने के लिये योजना बना रहा है और देश में एक अलग तरह की ललक भी दिख रही है कि कुछ कर के दिखाना है। जैसा आजादी के वक्त दिखती थी यानी कि वो दिन अब दूर नही जब भारत का आर्थिक पहिया दौड़ेगा और इसका फायदा कुछ चुने हुए शहर नही बल्कि पूरा मुल्क महसूस करेगा।


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