नही रहें पत्रकारिता के भीष्म पितामह कुलदीप नैयर

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कुछ दिन पहले ही देश की सियासत के भीष्म पितामह यानी भारत रत्न अटल जी नही रहे।जिसके बाद सारे देश मे गम़ में डूब गया था। अभी इस दुख को देशवासी भूल ही रहे थे कि पत्रकारिता का जानामाना नाम या यू कहे पत्रिकारिता के भीष्म पितामह कुलदीप नैयर हमारा साथ छोड़ गये है। जिससे देश एक बार फिर से शोकाकुल है। कुलदीप नैयर उन लोगों और पत्रकारों में से एक थे जिन्‍होंने सरकार के सही फैसलों पर उनकी सराहना करने और गलत फैसलों पर उनकी आलोचना करने से कभी नहीं चूके। उन्‍होंने भारतीय राजनीति को बेहद करीब से जाना भी और समझा भी।

आलोचना करने से नहीं डरे

कुलदीप नैय्यर की बात की जाए तो उन्‍होंने सिर्फ इंदिरा गांधी का ही नहीं बल्कि जवाहरलाल नेहरू फिर लाल बहादुर शास्‍त्री का दौर और उनकी राजनीति बेहद करीब से देखी थी। जहां तक पंडित नेहरू की बात है तो उनकी भी आलोचना करने से वह कभी पीछे नहीं रहे। अपनी एक किताब में उन्‍होंने नेहरु के बारे में लिखा था कि उन्‍होंने ऐसे समझौते किए थे जो उन्‍हें नहीं करने चाहिए थे।वही स्वर्ण मंदिर मे इंदिरा गांधी द्वारा करवाया गया ऑपरेशन ब्लू स्टार का भी खुलकर विरोध किया था और इसे इंदिरा गांधी द्वारा जल्दबाजी मे लिया फैसला कहां था। 

ताशकंद में शास्त्री जी के साथ नैयर

जिस वक्‍त ताशकंद में लाल बहादुर शास्‍त्री का निधन हुआ था उस वक्‍त खुद नैय्यर भी उसी होटल में मौजूद थे। उन्‍होंने शास्‍त्री के निधन पर काफी कुछ लिखा और कहा भी। प्रधानमंत्री के तौर पर शास्‍त्री का निधन उनके लिए काफी बड़ा झटका भी था। वह भी तब जब भारत ने पाकिस्‍तान के साथ ताशकंद समझौते पर हस्‍ताक्षर किए थे। वो उस पल के गवाह थे।

झेला बंटवारे का दंश

जहां तक भारतीय राजनीति का सवाल है तो उन्‍होंने देश की आजादी का वह कठिन दौर भी देखा जिसमें बंटवारे के नाम पर रातों-रात एक मुल्‍क को लकीर खींच कर दो मुल्‍कों में बांट दिया गया। पाकिस्‍तान के सियालकोट से रातों-रात उन्‍हें भी अपना घरबार छोड़कर भारत में शरणार्थी बनने के लिए मजबूर होना पड़ा था। करीब आठ वर्ष हुए जब उनकी एक आत्‍मकथा सामने आई थी। अंग्रेजी में प्रकाशित इस आत्‍मकथा का नाम उन्‍होंने ‘बियोंड द लाइन्‍स’ रखा था। इसमें बंटवारे के वक्‍त के दर्द का अहसास साफतौर पर महसूस किया जा सकता है। इस आत्‍मकथा को लिखने में उन्‍हें दो दशक से ज्‍यादा का समय लगा था। बाद में इसका हिंदी अनुवाद किया गया और इसका नाम ‘एक जिन्‍दगी काफी नहीं’ रखा गया।

आपातकाल के वक्त भी इंदिरा सरकार के खिलाफ नही थमी कलम

 

1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के समय का उन्‍होंने जबरदस्‍त तरीके से विरोध किया था। इसके चलते उन्‍हें जेल तक जाना पड़ा था। एक बार उन्‍होंने लिखा था कि इंदिरा गांधी इस्‍तीफा देना चाहती थीं, लेकिन उनके सलाहकारों ने इंदिरा को ऐसा न करने और देश में आपातकाल लगाने की सलाह दे डाली। इमरजेंसी की ही बात करें तो उस वक्‍त जय प्रकाश नारायण का शोर हर जगह सुनाई देता था। उनके बारे में एक बार कुलदीप नैयर ने कहा था कि जेपी न तो संसद में थे और न दिल्‍ली में रहते थे। फिर भी, वे जब भी कुछ कहते थे तो लोगों का ध्‍यान सहज ही उनकी तरफ खिंच जाता था। नैयर खुद भी जेपी के काफी कायल थे। वहीं उनकी कलम का लोहा हर कोई मानता था।

कुलदीप नैयर का व्‍यक्तित्‍व और प्रभाव दोनों ही विराट थे। यही वजह है कि बहूमुखी प्रतिभा के धनी नैय्यर को 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य बनाया गया था। आज भारत मां का ये लाल हमेशा के लिये हमे छोड़ कर चिर निद्रा मे शो गया है। लेकिन इनकी बेबाकी जरूर हमे सबक देती रहेगी। कुलदीप नैयर को शत शत नमन ।


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