विपक्ष के दो चेहरे: एक ने संघीय ढ़ाँचे का मान बढ़ाया एक ने मानमर्दन किया

शुक्रवार को भारत की जनता ने लोकतंत्र की दो तस्वीर देखी। पहली तस्वीर में पीएम मोदी और नवीन पटनायक के साथ यास तूफान को लेकर समीक्षा बैठक की थी जो भारत के लोकतंत्र की नींव कितनी मजबूत है इसका उदाहरण पेश कर रही थी तो दूसरी तस्वीर बंगाल से आई थी जिसमे पीएम मोदी सीएम ममता का इंतजार कर रहे थे। ये तस्वीर बता रही थी कि कुछ लोग कैसे भारत के महान लोकतंत्र पर घात कर रहे है जिससे भारत माता की आत्मा कही न कही घायल हो रही है।

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भारत की संघीय ढ़ाँचे की यही तो खासियत है

आजादी के 70 साल भी अगर आज हमारा देश एकता के धागे में पिरोया हुआ दिखता है तो उसके पीछे की खास वजह देश का संघीय ढ़ांचा है, जहां एक दूसरे के प्रति सम्मान है तो एक दूसरे के समर्पण भाव भी है जो कल पीएम मोदी और सीएम नवीन पटनायक की बैठक में देखा गया। जब केंद्र सरकार से पहले राज्य सरकार ने कोरोना के चलते यास तूफान को लेकर किसी राहत पैकेज की मांग नहीं रखी तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने इसके बाद भी 500 करोड़ रूपये की मदद प्रदान की जो ये बताता है कि देश आपदा से मिलकर ही लड़ सकता है। इतना ही राहत पैकेज के ऐलान के बाद खुद सीएम नवीन पटनायक ने पीएम को अपने ट्वीट के जरिये थैंक्यू बोला साथ ही डिजास्टर रीसाइलेंट पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए उठाए गए कदमों की भी सराहना की। हम मिलकर लंबे समय तक काम करेंगे। वहीं पीएम मोदी ने सीएम नवीन पटनायक के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए लिखा, भुवनेश्वर में एक बहुत ही उपयोगी समीक्षा बैठक हुई। हम आपदा प्रबंधन क्षमताओं को मजबूत करने के लिए मिलकर काम करना जारी रखेंगे, एक ऐसा क्षेत्र जहां ओडिशा ने सराहनीय प्रगति की है।

संघीय ढ़ाँचे की मर्यादा को कुछ लोग करते तार तार

अब बात करते सियासत में आई नकरात्मकता की जिसके चलते भारत के लोकतंत्र को शुक्रवार को एक काला दिन देखना पड़ा। राज्य और संघ के रिस्ते हमेशा देश के लोकतंत्र को मजबूत करते आये है लेकिन पहली बार बंगाल की सीएम ने इसे तार तार किया। पहले तो यास तूफान पर बुलाई गई बैठक में वो 30 मिनट देरी से पहुंची उसपर पीएम को महज चंद मिनट में रिपोर्ट थमाकर और 20 हजार करोड़ रूपये की मांग करके चलते बनी। मजे की बात ये वो ममता बनर्जी है जो पीएम पर ना बोलने देने का आरोप लगा चुकी है। लेकिन जब जनता के लिये कुछ करने के लिये बोलने का मौका आया तो बिना कुछ बोले ही चलती बनी।

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इस कांड के बाद तो यही लगता है कि आगे भी ऐसे दृश्य देखने को मिल सकते है क्योकि सियासत में कुछ लोग सिर्फ इसी तरह से नियम तोड़कर राजनीति करना चाहते है और सोचते है कि ऐसा करने से उनकी बहुत वाहवाही होती है लेकिन हकीकत तो ये है की उनकी किरकिरी ही होती है।