यात्रा नेपाल की और संदेश चीन को, पीएम मोदी की इस कूटनीति को समझिए

दुनिया को शांति का संदेश देने वाले भगवान बुद्ध की जन्‍मस्‍थली लुंबिनी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल में भारत के खिलाफ नई-नई चालें चल रहे चीनी ड्रैगन को करारा जवाब देने जा रहे हैं। बुद्ध की जन्‍मस्‍थली को ‘लाल’ रंग में रंगने की साजिश रचने वाले चीन को भारत अपने सॉफ्ट पावर से करारी चोट देने जा रहा है। भारत लुंबिनी में 1 अरब रुपये की सहायता से बौद्ध सांस्‍कृतिक केंद्र बनाने जा रहा है। यह वही जगह है जहां पर चीन की कम्‍युनिस्‍ट सरकार अपने ‘डेब्‍ट ट्रैप’ के जरिए 3 अरब डॉलर की सहायता से एक विश्‍व शांति केंद्र बनाना चाहती है। यही नहीं चीन की मंशा भारतीय सीमा से मात्र कुछ ही किमी की दूरी पर स्थित लुंबिनी तक अपनी रेलवे लाइन पहुंचाने की भी है।

भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सांस्‍कृतिक रिश्‍ते बहुत मजबूत रहे हैं लेकिन नेपाल में केपी ओली की वामपंथी सरकार आने के बाद दोनों देशों के बीच रिश्‍ते रसातल में पहुंच गए थे। चीन की राजदूत के इशारे पर केपी ओली ने भारत के खिलाफ कई जहरीले बयान दिए। हालांकि अब नेपाल में भारत समर्थक सरकार आ गई है और नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा पिछले दिनों भारत के दौरे पर आए थे। नेपाल में बदले राजनीतिक माहौल के बाद पीएम मोदी एक बार फिर से दोनों देशों के बीच सांस्‍कृतिक रिश्‍ते को मजबूत कर रहे हैं। भारत नेपाल में बौद्ध विरासत को और ज्‍यादा मजबूत करने के लिए 1 अरब रुपये से बौद्ध सांस्‍कृतिक केंद्र बना रहा है।

पीएम मोदी ने नेपाल यात्रा में चीन को दिया साफ संदेश
यही नहीं पीएम मोदी ने चीन के लुंबिनी के पास भैरवा में बनाए गए एयरपोर्ट पर नहीं उतरकर भी साफ कर दिया है कि वह भारतीय सीमा पर चीन के बढ़ते कदम को पसंद नहीं करते हैं। पीएम मोदी ने माया देवी मंदिर में पूजा भी की। नेपाल एक हिंदू राष्‍ट्र रह चुका है और अभी भी पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन के लिए लाखों लोग हर साल नेपाल जाते हैं। यही नहीं पीएम मोदी वाराणसी से सांसद हैं जहां उन्‍होंने बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर को नया रूप दिलाया है। इस तरह से भारत नेपाल के साथ अपने सांस्‍कृतिक संबंधों और अरबों डॉलर के निवेश के जरिए चीन के बढ़ते प्रभाव को करारा जवाब देने में जुट गया है।

 

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की यह पांचवीं नेपाल यात्रा है लेकिन साल 2019 में दोबारा सत्तासीन होने के बाद वह पहली बार नेपाल पहुंचे हैं। प्रधानमंत्री नयी दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ की पहल पर बनाये जा रहे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय केंद्र का भूमि पूजन करके उसकी आधारशिला रखेंगे। यह केंद्र बौद्ध विरासत और संस्कृति के लिये समर्पित होगा। नेपाल यात्रा से ठीक पहले पीएम मोदी ने कहा, ‘मैं बुद्ध जयंती के शुभ अवसर पर मायादेवी मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिये उत्सुक हूं। मैं लाखों भारतीयों की तरह भगवान बुद्ध की पवित्र जन्मस्थली पर श्रद्धा अर्पित करने का अवसर पाकर सम्मानित महसूस कर रहा हूं।’

नेपाल के साथ दोस्‍ती पर जोर दे रही है मोदी सरकार
भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैं पिछले महीने प्रधानमंत्री देउबा की भारत यात्रा के दौरान हुई हमारी उपयोगी चर्चा के बाद उनसे फिर से मिलने के लिये उत्सुक हूं। हम जलविद्युत, विकास और कनेक्टिविटी सहित कई क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने के लिये अपनी साझा समझ का निर्माण करना जारी रखेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘नेपाल के साथ हमारे संबंध अद्वितीय हैं। भारत और नेपाल के बीच सभ्यता से जुड़े और लोगों के आपसी संपर्क हमारे घनिष्ठ संबंधों को स्थायित्व प्रदान करते हैं।” पीएम मोदी ने कहा, ‘मेरी यात्रा का उद्देश्य समय के साथ मजबूत हुये इन संबंधों का उत्सव मनाना तथा इन्हें और प्रगाढ़ करना है। इन संबंधों को सदियों से प्रोत्साहन मिला है और जिन्हें हमारे आपसी मेल-जोल के लंबे इतिहास में दर्ज किया गया है।’

भारत न केवल चीन के बढ़ते प्रभाव को करारा जवाब दे रहा है, बल्कि नेपाल के साथ चल रहे विभिन्‍न विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने पर जोर दे रहा है। दोनों ही देशों ने हाल ही में लिपुलेख समेत सीमा विवाद को सुलझाने की जरूरत पर जोर दिया था। भारत अब नेपाल को बौद्ध टूरिस्‍ट सर्किट से जोड़ने पर बल दे रहा है। यह नेपाल के लुंबिनी से शुरू होकर कुशीनगर में खत्‍म होगा। इसके लिए कुशीनगर में एक अंतरराष्‍ट्रीय अड्डा बनाया गया है। बताया जा रहा है कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री लुंबिनी को कुशीनगर, बोधगया, राजगीर, नालंदा और सारनाथ से जोड़ने पर बातचीत करेंगे। इसके अलावा रामायण सर्किट भी बनाया जा रहा है जिसके जरिए नेपाल और भारत के भगवान राम से जुड़े शहरों को आपस में जोड़ा जा सके। माना जा रहा है कि पश्चिमी सेती नदी पर भी चर्चा होगी।

नेपाल ने चीन के विदेश मंत्री को दिया करारा झटका
पीएम मोदी की यह नेपाल यात्रा ऐसे समय पर हुई जब पिछले दिनों ही चीन के विदेश मंत्री वांग यी नेपाल के दौरे पर आए थे। नेपाल ने चीन के कर्जजाल को नकारते हुए वांग यी से साफ कह दिया है कि वह बीजिंग से लोन नहीं लेगा, हां अगर ग्रांट दी जाती है तो उसे वह स्‍वीकार करेगा। चीन की कोशिश है कि वह अपने बेल्‍ट एंड रोड परियोजना को नेपाल में बढ़ाए और उसे कर्ज दे लेकिन अभी तक शी जिनपिंग का यह ड्रीम प्रॉजेक्‍ट नेपाल में परवान नहीं चढ़ सका है। नेपाल को डर सता रहा है कि चीन से कर्ज लेकर उसका भी हाल श्रीलंका की तरह से हो सकता है जो अभी भयंकर आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है।

 

Originally Published At-NavbharatTimes