लम्बे चुनावी प्रक्रिया की वजह से कारोबार ठप

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देश में अब तक की सबसे लंबी चुनाव प्रक्रिया ने कारोबार जगत के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। उन्हें सामानों के आयत-निर्यात से लेकर तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पर रहा है| एक तरफ जहाँ सरकारी स्तर पर नीतिगत फैसले लंबित हैं, वहीं दुसरे तरफ आधिकारिक मशीनरी के चुनाव में व्यस्त होने से छोटे-मोटे काम और मंजूरियां भी ठप परे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे चुनाव के दरमियाँ इस तरह के परेशानियों का सामना करने के बाद कारोबारी अब खुलकर इस पर विरोध जताने लगे हैं| उनकी मांग चुनाव को जल्द से जल्द संपन्न कराने को लेकर है| ताकि उनको कारोबार में अधिक परेशानियों का सामना न करना परे|

मालूम हो कि 10 मार्च को चुनाव के तारीखों के एलान के साथ ही पूरे देश में आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद से केंद्र, राज्य और नगर निगमों के स्तर पर सभी नीतिगत फैसले लंबित हो गए| जबकि 1 अप्रैल से नए वित्त वर्ष की शुरुआत के मद्देनजर अधिकांश कारोबारियों को कई औपचारिकताएं पूरी करनी थीं। जो नहीं हो सकी| खासकर जीएसटी से जुड़ी कई प्रक्रियाएं अधर में हैं और काउंसिल की आखिरी बैठक में हुए कई फैसले नोटिफाई नहीं हो पाए हैं। इस सन्दर्भ में दिल्ली जीएसटी के एक अधिकारी बताते है कि ‘ ऑनलाइन बैकएंड काम बंद नहीं हुआ है, लेकिन स्टाफ चुनावी ड्यूटी पर होने से असेसमेंट, अपील और फील्ड सर्वे प्रभावित होते हैं। विभाग पर चुनावी खर्चों की मॉनिटरिंग और असेसमेंट की जिम्मेदारियां भी हैं। अप्रैल महीने के टैक्स डिपॉजिट और रिटर्न फाइलिंग में सुस्ती है, लेकिन यह 20 तारीख तक ही जोर पकड़ती है।’

इतना ही नहीं मौजूदा वक़्त में इंडस्ट्री, एनवायरमेंट और नगर निगमों में लाइसेंस और मंजूरियों को जारी और रिन्यू करने का काम भी ठप परा है। जिससे सबसे ज्यादा मुश्किलें सीलिंग और फायर एनओसी के जद में आईं यूनिटों को पेश आ रही है। एन्फोर्समेंट एजेंसियां उनके खिलाफ कार्रवाई में नहीं हिचक रहीं, जबकि संबंधित विभागों में उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। नगर निगमों में औद्योगिक श्रेणियों के लिए प्रॉपर्टी टैक्स की दरें अचानक बढ़ गई हैं, जबकि निगम चाहकर भी इसे अभी नहीं रोक सकते। क्योंकि, वो अभी नियमो के दायरे से बंधे है|

रघुवंश अरोड़ा जो अपेक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के वाइस प्रेसिडेंट है उन्होंने प्रधानमंत्री और चुनाव आयोग को इस सम्बन्ध में लिखकर अपील की है कि इतनी लंबी मतदान प्रक्रिया अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। उन्होंने कहा, ‘हर विभाग में कामकाज ठप है। राज्यों में माल की आवाजाही बाधित हुई है। इसकी कीमत आम कारोबारी चुका रहे हैं। चुनाव हर हाल में 15 से 30 दिन में संपन्न होना चाहिए।’ वहीं दिल्ली फैक्टरी ओनर्स फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी समीर नायर कहते है कि लंबी चुनाव प्रक्रिया पूरे देश की उत्पादकता पर असर डालती है। इसे सीमित किए जाने की जरूरत है।

इस पुरे चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक उद्यमी बताते है कि अप्रैल हार्वेस्टिंग सीजन होने से पहले ही बहुत सारा वर्कफोर्स खेती के लिए अपने गांव लौट जाता है, लेकिन चुनावों में कैश बांटने के चलन ने अब उन्हें वहीं रोकना शुरू कर दिया है। वहीं दिल्ली रेस्टोरेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के मेंबर संजय वर्मा ने बताया कि फरवरी में सैकड़ों यूनिटों के फायर एनओसी और ट्रेड लाइसेंस कैंसल होने के बाद उनके रिन्युअल का काम ठप है।

कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो इतनी लम्बी चुनाव प्रक्रिया होने से न केवल कारोबार जगत बल्कि अलग-अलग क्षेत्रो से आने वाले लोग इससे प्रभावित है| सरकारी फैसले लंबित होने से लेकर कई अधिकारियो के चुनाव में व्यस्त होने से तमाम तरह के सरकारी कामकाज या तो पूरी तरह ठप है या उनकी रफ़्तार धीमी हो चली है|


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