गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करता सहारनपुर का ये मदरसा

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प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र है जहाँ सभी धर्म के लोग एक समान अधिकार के साथ रहते हैं| हाल के दिनों में देश में काल्पनिक असहिष्णुता की बात करने वाले गैंग की तादाद बढ़ गयी थी| जगह-जगह लोगों को धर्म, संप्रदाय, और जाति के नाम पर भड़काने की कोशिश होती रहती है| ऐसे में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का एक मदरसा “जामिया मजाहिर उलूम” गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक सहिष्णुता की एक मिसाल पेश कर रहा है|

जामिया मजाहिर उलूम – इस्लामिक शिक्षा का केंद्र

1866 में अपनी स्थापना के बाद से ही ये मदरसा भारत में इस्लामिक शिक्षा के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में शुमार है| दारुल उलूम के बाद इसे दुसरे नंबर पर गिना जाता है| देश भर से छात्र यहाँ इस्लाम की शिक्षा ग्रहण करने आते हैं|

एक तरफ कुरान तो दूसरी तरफ हिन्दू ग्रन्थ

जामिया मजाहिर उलूम में जहाँ एक तरफ डेढ़ लाख से अधिक इस्लामिक शिक्षा की किताबें हैं, वहीँ इस मदरसे में हिन्दू धर्म के करीब-करीब सभी ग्रन्थ मौजूद हैं| मदरसे के पुस्तकालय में चारों वेदों के अलावा भगवदगीता, रामचरित मानस, और ऐतिहासिक स्कन्द पुराण भी है जो 194 साल पुराना है| इन ग्रंथों के माध्यम से इस्लामिक शिक्षा के लिए इस मदरसे में आये छात्र हिन्दू धर्म के बारे में भी जानकारी हासिल करते हैं|

हिन्दू-मुस्लिम दोनों के सहयोग से चल रहा मदरसा

मदरसे के एक मौलाना फरीद के मुताबिक इस मदरसे को चलाने के लिए मुस्लिम और हिन्दू दोनों सहयोग करते हैं और उनकी ही दान राशि से ये मदरसा चलता है| सूत्रों के मुताबिक 1866 में इस मदरसे की स्थापना के बाद से ही बिना किसी सरकारी आर्थिक सहायता के ये मदरसा हिन्दू-मुस्लिम आपसी सहयोग से चल रहा है|