आंदोलन के पीछे कही देश की स्पीड धीमी करने की साजिश तो नही

कहते है न माया मिली न राम। कुछ यही हाल आने वाले दिनो में किसान आंदोलन का होने वाला और ये सब कुछ तथाकथित किसानों द्वारा अपनी सियासत को नया जन्म देने के कारण हो रहा है। जो कृषि बिल की आड़ में सरकार को सिर्फ परेशान करने की जिद में जुटे हुए है। तभी तो न वो सरकार की बात सुन रहे है बल्कि कोर्ट की बात को भी ठुकराने में जुटे है जबकि भारत के इतिहास में शायद पहली बार होगा जब किसानों की परेशानी को देख कोई सरकार बिल को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने तक को राजी हो गई है। लेकिन किसान की खाल में घुसे कुछ सियासी लोग इसपर भी राजी नही हो रहे है।

आंदोलनकारियों को सरकार का प्रस्ताव मंजूर नहीं

महाभारत काल में जब पांडव की ओर से समझौता प्रस्ताव लेकर श्री कृष्ण कौरवो के पास गये थे तो उन्होने शांति के लिए दुर्योधन से पांच गांव तक की मांग की थी लेकिन अंहकार के चलते उसने इस शांति प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। ठीक उसे तरह से किसानों की बिना परवाह किये हुए कुछ तथाकथित नेता अहंकार में सरकार के प्रस्ताव को ठुकराते जा रहे है। जिसके असर ये हो रहा है कि दिल्ली सीमा पर बैठे भोले-भाले कई किसानों की जान जा चुकी है। तो कई किसान घरो से दूर बीमार होकर बैठे है लेकिन इसके बाद भी इन अहंकारी किसान नेताओं के कान में भी जू नही रेंग रहा है। क्योकि इनकी तो रणनीति है कि किसी तरह से भी हालात ऐसा पैदा हो जाये कि सरकार को बल का प्रयोग करना पड़े जिससे मोदी सरकार पर दोष लगाने का एक मौका इन्हे मिल जाये लेकिन मोदी सरकार अपने किसान भाइयों पर बल का प्रयोग नही करेंगे।

यह पूरे देश के किसानों का आंदोलन नहीं है

इस पूरे मामले में एक बात समझ लेनी चाहिए कि यह पूरे देश के किसानों का आंदोलन नहीं है। यह मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा के एक हिस्से और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का आंदोलन है, जो किसानों के हित से ज्यादा बिचौलियों की व्यवस्था बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं। दो वर्ग के लोग इस आंदोलन के समर्थन में हैं। एक वे, जिन्होंने कभी आंदोलन देखा नहीं। वे मुग्ध भाव और फिर सहानुभूति भाव से आप्लावित हैं। दूसरा वर्ग वह है, जिसे लग रहा है कि इस आंदोलन के सहारे वे अपनी डूबती राजनीतिक नैया को पार लगा सकते हैं। पहला वर्ग निर्दोष भाव से जुड़ा है। दूसरा वर्ग पहले पर्दे के पीछे छिपा था लेकिन धीरे धीरे वो भी सामने आ रहे है।

क्योकि वो सोच रहे है कि मोदी जी इस आंदोलन से दब रहे है लेकिन उन्हे नही मालूम की वो कई बार बोल चुके है कि वो कृष्ण के भक्त है जो सुदर्शन भी चलाना जानते है और मुरली भी लेकिन इन सब के बीच पिस रहा आम किसान को अब समझना चाहिये कि वो उन लोगो का पर्दाफाश करके आंदोलन से तौबा करे जो सिर्फ सरकार को बदनाम करने के लिये आंदोलन करने में जुटे है।  ऐसे में लगता तो यही है कि देश में तेजी हो रहे विकास पर ब्रेक लगाने के लिए कही ये साजिश तो नही.