पाकिस्तान की सबसे बड़ी हार की कहानी, 13 दिन की वॉर में रोया ‘नियाजी’

1971 में हुई भारत-पाकिस्तान जंग आज ही के दिन खत्म हुई थी। पाकिस्तान की सेना ने भारतीय फौज के सामने हथियार डालने का फैसला किया था। 15 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के जनरल नियाज़ी ने जनरल मानेकशॉ के सरेंडर के ऑफर को कबूल कर लिया था। इसके बाद 16 दिसंबर को जो हुआ वो दुनिया में इतिहास बन गया, पाकिस्तान दो हिस्सों में टूट गया। बांग्लादेश नया राष्ट्र बन गया। 16 दिसंबर को बांग्लादेश हर साल विजय दिवस मनाता है, लेकिन इस बार बांग्लादेश अपनी आजादी का स्वर्ण जंयती समारोह मना रहा है।

भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 60 से 75 एयरक्राफ्ट कर दिए थे खत्म

इस जंग में पाकिस्तान को वेस्टर्न और ईस्टर्न दोनों सेक्टर में काफी नुकसान हुआ। पाकिस्तान के 60 से 75 एयरक्राफ्ट खत्म हो गए और जहां तक पाकिस्तानी एयरफोर्स के पायलट का सवाल है तो इनमें से कई युद्धबंदी बना लिए गए, लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने तब के बर्मा यानी आज के म्यामांर में जाकर अपनी जान बचाई थी। जब धीरे धीरे पाकिस्तान को ये एहसास होने लगा कि उसकी फौज ढाका में उसकी आर्मी भारतीय सेना के सामने टिक नही पाएगी तो पाक ने अमेरिका से मदद मांगी जिसके चलते पाकिस्तान की मदद के लिए बंगाल की खाड़ी में अपने एक वॉरशिप USS एंटरप्राइज को उतार दिया था, लेकिन इसका जवाब भारत के पास था. चूंकि जंग से ठीक पहले भारत और तब के सोवियत संघ के बीच समझौता हो चुका था। इसलिए जैसे ही अमेरिका का वॉरशिप आया, तभी सोवियत संघ ने भी व्लाडीवोस्टक से क्रूजर और डिस्ट्रॉयर वॉरशिप्स को भेज दिया। इसके साथ साथ एक न्यूक्लियर सबमरीन को भी हिंद महासागर में उतार दिया। अब बैलेंस और मूमेंटम पूरी तरह हिंदुस्तान के फेवर में था और ये बात अमेरिका को भी समझ आ चुकी थी इसलिए अमेरिका ने भारत को एशिया की मई महाशक्ति के तौर पर स्वीकार कर लिया।

16 दिसंबर को जनरल नियाजी ने डाले हथियार

भारत की तरफ से पाकिस्तान सरेंडर की कॉल जा चुकी थी। अब फैसला पाकिस्तान को करना था। पाकिस्तान के जनरल को करना था, लेकिन जनरल मॉनिकशॉ चाहते थे कि अब ज्यादा खून खराबे के बगैर पाकिस्तान हथियार डाल दे। इसलिए उन्होंने 11 दिसंबर, 13 दिसंबर को सरेंडर के लिए कहा. कहते हैं कि 13 दिसंबर को जो बात हुई वो चेतावनी के लहजे में थी। जनरल मॉनिकशॉ ने कहा था कि हथियार डाल दो, वर्ना आपको खत्म कर देंगे, लेकिन 14 दिसंबर को ढाका में बड़ा डेवलपमेंट हुआ तब ढाका के गवर्नर एएम मलिक सीक्रेट मीटिंग करने वाले थे, लेकिन उसी दौरान भारतीय वायुसेना ने ताबूत में आखिरी कील ठोंकी, गवर्नर हाउस पर तीस मिनट में लगातार तीन हमले कर दिए। सैकड़ों रॉकेट दागे गवर्नर हाउस का सबकुछ खत्म हो गया। इसके बाद 15 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के पूर्वी कमान के जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी ने आत्मसमर्पण का फैसला किया और 16 दिसंबर को पाकिस्तान की फौज ने हथियार भारत के आगे डाल दिये।इस मौके पर नियाजी की आंखे नम थी जिसे समूचे विश्व ने देखा था।

जो विश्व में एक इतिहास बन गया क्योकि पहली बार किसी फौज के 90 हजार सिपाहियों ने एक साथ हथियार डाले थे। इस दिन को भारत विजय दिवस के तौर पर मनाता है और हर उस जंग के सिपाही को सम्मान देकर गर्व महसूस करता है।