एक सन्यासी जिसने शिकागो शहर की बेहद ठण्डी रात रेलवे यार्ड में गुजारी, अगले दिन स्वागत में खड़ी थी दुनिया

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12 जनवरी 1863 को कोलकाता में नरेन्द्रनाथ दत्त  का जन्म हुआ। नरेन्द्रनाथ दत्त के पिता विश्वनाथ दत्त और उनकी माता भुवनेश्वरी देवी उन्हें “नरेन” कहकर बुलातीं थीं। जो आगे चलकर दुनिया के सबसे ज्यादा प्रिय, पसंद किया जाने वाले विश्व विजयी विवेकानंद के रूप में पहचाना गये।

 

 नरेन्द्र बचपन से ही भगवान और आध्यात्म को लेकर उत्सुक रहते थे। भगवान के अस्तित्व को लेकर हमेशा ही उनके मन में सवाल होते।नरेन्द्र कई विशेष व्यक्तियों से ए  सवाल पूछा परन्तु किसीसे सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला। एक दिन नरेन्द्र ठाकुर रामकृष्ण परमहंस से मिले और  जिज्ञासावश उनसे पूछा कि “क्या आपने भगवान को देखा है?” इस पर ठाकुर रामकृष्ण परमहंस नें उनसे कहा कि “हाँ मैनें  देखा है ठीक वैसे ही देखा है जैसे मैं तुम्हे यहाँ देख रहा हूँ ।” रामकृष्ण परमहंस के इस जबाव के बाद नरेन्द्र आस्वश्ती का अनुभूति हुआ कि उनके मंन में लंबे समय से उठने वाली शंकाओं का समाधान करने वाला ऐसे व्यक्ति से भेट हुआ। धीरे  धीरे  गुरू ठाकुर रामकृष्ण परमहंस एवं  शिष्य नरेन्द्र के मध्य सम्पर्क बढ़ता है और  ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक मार्गदर्शन से युवा नरेन्द्र अपने जीवन के उद्देश्य के और करीब आ जाते हैं ।  एक युवा जो भगवान से मिलने की खोज में था उसे महसूस हो गया  कि ईश्वर प्रत्येक जीव, मानव,पशु और पौधे में विद्धमान हैं। “जीबे जीबे शिव: स्वरूपं” यानि कि ईश्वर हर एक जीवात्मा में विराजमान है। यह सोच और विचार उनके गुरू के मार्गदर्शन में एक शिष्य का परिवर्तन था। युवा नरेन्द्र अपने गुरू ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में असाधारण व्यक्ति  हो गये और भारत वर्ष का पुनरुत्थान ही अपने जीवन का उद्देश्य है यह भी समझ गये। नरेन्द्र अपने बाल्यकाल में गायन में बहुत ही अच्छे थे। कुछ लोग कहते हैं कि अगर नरेन्द्र अपने गुरू ठाकुर रामकृष्ण परमहंस से नहीं मिलते तो एक महान गायक होते। एक शिष्य के जीबन में गुरु का क्या महत्व है ए एक उत्कृष्ट दृष्टान्त है। 

अगस्त 1886 में अपने गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस की महासमाधि के बाद, नरेंद्र ने संन्यास का संकल्प लिया। जिसके बाद उन्होंने भारत के बारे में अधिक से अधिक जानने का फैसला किया। एक परिब्राजक सन्यासी के रूप में नरेंद्र ने पूरे देश का विस्तृत रूप से दौरा करना शुरू किया। इस यात्रा के दौरान वे उस स्थिति से गुज़रे जिस दयनीय स्थिति में देशवासी रह रहे हैं। लोगों के लिए उनके दिल में गहरा प्यार होने पर उन्हें अपने अंदर परिवर्तन महसूस हुआ। नरेन्द्र ने सोचा कि जिस देश का अतीत इतना गौरवशाली रहा हो उस देश के लोगों का वर्तमान के स्थिति इतना दयनीय होने का क्या कारण हो सकता है और  इन्हें दूर करने का क्या तरीका हो सकता है। नरेन्द्र अपनी यात्रा के दौरान देश की कई प्रमुख हस्तियों से मिले।  इनमें से जब वे राजस्थान के खेतरी के महाराजअजीत सिंह से मिले, जिन्होंने उनसे प्रभावित होकर बाद में नरेन्द्र का नाम “विवेकानन्द” रखने का सुझाव दिया।   

 

 अंत में उन्होंने देश के सबसे दक्षिणी छोर कन्याकुमारी में उनकी लंबी यात्रा को समाप्त किया। यहाँ पर उन्होंने लोगों की पीड़ा को दूर करने की इच्छा के साथ, कन्याकुमारी मंदिर में माता कन्याकुमारी के समक्ष प्रार्थना की। इसके बाद वे बीच समुद्र में स्थित एक चट्टान पर तैर कर पहुँचे और वहां ध्यान लगाकर बैठ गये। दिसंबर 25, 26 और 27 1892 ही वह तारीख थीं जब स्वामी विवेकानंद देश के लिए ध्यान पर बैठे थे। भारत वर्ष के लिए इस ध्यान साधना ने नरेंद्रनाथ दत्त को “स्वामी विवेकानंद” में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने हमारे देश के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर चिंतन किया। आखिर इस   गौरवशाली अतीत वाला  देश में वर्तमान में लोगों को ऐसी कठिन स्थिति से  कैसे गुजरना पड़ रहा है। अगर ऐसी स्थिति रही तो इस महान देश का आने वाला भविष्य कैसे होगा। उन्होंने इस देश के पुनरुत्थान के तरीकों के लिए आध्यात्म को चुना। उन्होंने दुनिया भर में हमारे देश की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा को फैलाने के लिए पश्चिम देशों में जाने की योजना पर निश्चय किया। जहाँ  जाकर वो हमारे देश के लोगों के उत्थान के लिए समर्थन भी ले सकेंगे।

 

अमेरिका के शिकागो में सितंबर 1893 में विश्व धर्म संसद (World’s Parliament of Religions) का आयोजन होने वाला था। इस अवसर पर स्वामी विवेकानन्द नें वहाँ जाकर “सनातन धर्म” का प्रतिनिधित्व करने का निर्णय लिया। उनकी पश्चिम देशों की यात्रा के लिए खेतड़ी और मैसूर के महाराजा ने उन्हें आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई।

जिसके बाद स्वामी विवेकानंद ने 31 मई 1893 को बंबई (अब मुंबई) से जहाज द्वारा अमेरिका की यात्रा शुरू की। उनका जहाज चीन, जापान और कनाडा से होता हुआ अमेरिका के लिए पहुँचा। जापान की औद्योगिक विकास की प्रशंसा करते हुए, स्वामी जी ने महसूस किया कि यदि जापान ऐसी उपलब्धि हांसिल कर सकता है, तो भारत क्यों नहीं कर सकता। इस यात्रा के दौरान स्वामी जी 1893 की मध्य जुलाई में शिकागो पहुँचे। लेकिन यहाँ पर होने वाली विश्व धर्म संसद का आयोजन तो सितंम्बर में होना था जिसमें लगभग 2 महीने बाकी थे। अमेरिका में शिकागो जैसे महंगे शहर में सितम्बर तक के लिये रहना महंगा हो सकता था। जिसके बाद उन्होंने बॉस्टन में रहने का फैंसला किया। लेकिन वहाँ भी देशवासियों की भलाई और मदद के लिए उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के अलावा उनका कोई और साथ में नहीं था। आखिर उनकी विद्वता ने उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट् (Prof. John Henry Wright) से मिलवाया। अपरिचित सहर में एक सन्यासी के पास अपने विद्वता के अलावा और क्या हो सकता था। इसलिए कहा गया है; 

 

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। 

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते। ।    

 

प्रोफेसर उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए। जिसके बाद स्वामी जी नें प्रोफेसर राइट को शिकागो में होने वाली विश्व धर्म संसद के बारे में बताया। साथ में यह भी कहा कि वे बिना किसी प्रमाण, परिचय के वहाँ हिस्सा नहीं ले पाएंगे। स्वामी जी के बारे में सुनकर, प्रो राइट ने कहा कि “स्वामी जी आपसे आपके परिचय और प्रमाण के बारे में पूछना बिल्कुल वैसे ही है जैसे सूरज को चमकने के अधिकार के बारे में पूछना। जिसके बाद प्रोफेसर राइट नें विश्व धर्म संसद के संयोजकों को एक पत्र लिखा कि “यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जो हमारे सभी प्रोफेसरों से भी अधिक ज्ञानी है। (“Here is a man who is more learned than all our learned professors put together.”)

 

प्रोफेसर राइट के लिखे शिफारिश पत्र के बाद, स्वामी जी 9 सितंबर 1893 को शिकागो पहुँचे। लेकिन वहाँ पहुँचकर वे विश्व धर्म संसद के लिए आये हुए प्रतिनिधियों के रुकने का पता भूल गये। शहर में कोई परिचय नहीं होने के कारण स्वामी जी के पास रात गुजारने के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने मदद के लिए उस शाम कई घरों के दरवाजे खटखटाए लेकिन किसी नें उस रात रुकने के लिए उनकी मदद नहीं की। अपमानित मध्य हुए। जिसके बाद अंत में उन्होंने रेलवे यार्ड में शिकागो शहर की बेहद ही ठण्डी में रात गुजारी।

 

11 सितंबर 1893 में शिकागो के आर्ट इंस्टीट्यूट सभागार में विश्व धर्म संसद की शुरूआत हुई। उस समय वह हॉल पूरी तरह से लगभग 7000 दर्शकों से भरा हुआ था। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को देखकर वे थोड़ा संकुचित हुए क्योंकि इतनी संख्या में लोगों को उन्होंने पहले कभी संबोधित नहीं किया था। लेकिन अपनी मातृभूमि और देशवासियों के लिए अथाह प्यार के साथ, देश के वंचितों के लिए कुछ करने की दृढ़ इच्छा शक्ति मन में थी। उन्होंने देवी सरस्वती को याद किया। स्वामी विवेकानंद नें अपने भाषण की शुरूआत “Sisters and Brothers of America” (अमेरिका के बहनों और भाईयों) सम्बोधित करते हुए कहा कि “आपने जो गर्मजोशी और सौहार्दपूर्ण स्वागत मेरा किया उससे मेरा दिल भर गया है और मेरे पास इस खुशी के लिए शब्द नहीं हैं। मैं दुनिया के सबसे प्राचीन संतों की तरफ से आप सभी को धन्यवाद देता हूँ, मैं आपको धर्मों की माँ के नाम की ओर से धन्यवाद देता हूँ… (It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. I thank you in the name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the mother of religions……….”)

 

बहनों और भाइयों के रूप में उनके संबोधन को सुनकर, वहाँ मौजूद सभी दर्शकों में एक चमत्कारिक प्रभाव पड़ा। हालाँकि स्वामी विवेकानंद से पहले तीन और वक्ताओं नें सभा को “बहनों और भाइयों” के रूप में संबोधित किया था। लेकिन सभी जीब को ईश्वर का अंश मानने वाले  स्वामी विवेकानंद के संबोधन में आंतरिकता एवं एकत्व  का अभिव्यक्ति थी। स्वामीजी के इस हृदयस्पर्शी वक्तव्य विश्व धर्म संसद  को एकता की अवधारणा और सम्पूर्ण विश्व एक परिवार के सिद्धांत से अबगत कराया । उस दिन “विश्व बंधुत्व” की अवधारणा को पूरी दुनिया ने महसूस किया; 

 

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् | 

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ||

 

(यह मेरा है, यह उनका है, संकुचित मानस इस तरह सोचते हैं लेकिन उदार वे हैं जो पूरी दुनिया को एक परिवार मानते हैं)।

 

स्वामी विवेकानंद ने कहा “मुझे एक ऐसे धर्म से सम्बद्ध होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति को सिखाया है।” “मुझे उस देश के होने पर गर्व है,जिसने दुनिआ  के सभी धर्मों और राष्ट्र के सभी शरणार्थियों को और सताये गये लोगों को शरण दी है।” (“I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance.” “I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth.”) यह निश्चित रूप से उन लोगों के शिक्षणीय था ,जिन्होंने पहले तक इस सिद्धांत में विश्वास रखते थे कि “मेरा धर्म एकमात्र धर्म है एवं श्रेष्ठ धर्म है।”

 

अगले दिन सभी अखबारों ने स्वामी विवेकानंद को  विश्व धर्म संसद की सबसे महान हस्ती के रूप में वर्णन किया। सुदूर भारत से गया  एक सन्यासी शहर के दिलों पर छा गया और सबसे महत्वपूर्ण और प्रशंशा का पात्र बन गया। जिससन्यासी को एक दिन पहले तक किसी नें ठहरने के लिए कोना तक नहीं दीया था। इस सभा के बाद उसके लिए पूरा शहर बाहें फैलाये स्वागत के लिए खड़ा था। जिसके बाद स्वामी विवेकानन्द का शाही स्वागत किया गया और हर कोई उन्हें सुनना चाहने लगा। इसके बाद 19 सितंबर को और अंत में 27 सितंबर 1893 को उन्होंने विश्व धर्म संसद को संबोधित किया। विश्व संसद में उनकी बात सुनकर अमेरिकी लोगों ने कहा कि “मिशनरियों को इस सीखे हुए देश में भेजना कितना मूर्खतापूर्ण है! उन्हें हमारे देश में मिशनरियों को भेजना चाहिए।” पार्लियामेंट के साइंटिफिक सेक्शन की प्रेसीडेंट श्री मर्विन-मेरी स्नेल (Mr. Merwin-Marie Snell) ने लिखा “स्वामी विवेकानन्द अब तक के हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट प्रतिनिथिओं में से थे। जो सवालों से परेय थे और धर्म संसद के सबसे प्रसिद्ध और प्रभावी व्यक्ति थे… अमेरिका उन्हें भेजने के लिए भारत का शुक्रिया करता है और उनके जैसे कई और लोगों को भेजने का आग्रह करता है। (“By far, the most important and typical representative of Hinduism was Swami Vivekananda, who, in fact, was beyond question, the most popular and influential man in the parliament….. America thanks India for sending him, and begs her to send many more like him.”)

 

स्वामी विवेकानन्द के द्वारा 1893 में विश्व धर्म संसद में  सनातन संस्कृति के वैशिष्ट्य के ऊपर हृदयस्पर्शी वक्तव्य 127 साल बाद आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी संपूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी एवं उपयोगी रहेंगे।

 

(Written by Dr. Nityanand Agasti. The author is a professor of chemistry at University of Delhi)

 


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