चीन, रूस के बीच बन रही दूरी भारत के लिए फायदे का सौदा

चीन औऱ रूस की दोस्ती युगो पुरानी है, लेकिन अब इस दोस्ती में गाठ पड़ने लगी है। कारण ड्रैगन की दादागिरी और उसका विस्‍तारवादी रवैया जिसके चलते चीन और रूस दोनो में दूरियां बढ़ती जा रही है। आखिर ये दूरी क्यो बन रही है, इसके पीछे की विषय पर आज हम आपको बताते है। साथ ही इसका फायदा भारत को कैसे होगा इस बारे में हम आपको जानकारी देगे।

व्‍लादिवोस्‍तोक पर चीन और रूस में बढ़ा टकराव

चीन की विस्तारवादी सोच, दोनो देशों के बीच में दूरियां बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। चीन ने अब रूस के शहर व्लादिवोस्तोक पर अपना दावा किया है। ड्रैगन का दावा है कि व्लादिवोस्तोक शहर 1860 से पहले चीन का हिस्सा था। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि इस शहर को पहले हैशेनवाई के नाम से जाना जाता था जिसे रूस से एकतरफा संधि के तहत चीन से छीन लिया था। व्लादिवोस्तोक शहर पर चीन के दावे के बाद रूस के साथ उसके संबंधों में खटास आई है। रूस ने इस मुद्दे पर चीन को साफ साफ चेतावनी दी है कि अगर चीन ने इस तरह की बात की तो उसे अंजाम के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

यूक्रेन के साथ चीन की दोस्‍ती रूस को पसंद नहीं

उधर दूसरी तरफ चीन इस वक्त यूक्रेन के साथ खूब दोस्ती बढ़ा रहा है जो रूस को फूटी आंख नही भा रहा है और रूस और चीन के बीच संबंधों में रक्षा से जुड़ा मुद्दा विवाद का विषय बन गया है। चीन यूक्रेन के साथ सैन्‍य और बिजनस मामलों को लेकर सहयोग कर रहा है। इसके अलावा चीन रूस के हथियारों का डिजाइन चुराकर अपने यहां प्रॉडक्शन कर रहा है और उसे वैश्विक हथियारों के बाजार में बेच रहा है। नकल वाले चीनी हथियार रूस के मूल हथियारों से प्रतिस्‍पर्द्धा कर रहे हैं। जिसके चलते रूस चीन से खटपट चलने लगी है।

भारत को इस खटपट से होगा फायदा

वैसे समूचा जग जानता है कि रूस और भारत दोनो ही सदियों पुराने दोस्त रहे है। रूस पर कोई विपदा आई हो या फिर भारत पर दोनो ने मिलकर इसका निदान किया है। ऐसे में चीन से रूस की दूरी भारत के लिए रक्षा क्षेत्र में अच्छा होगा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण रूस द्वारा भारत को जल्द से जल्द S-400 मिसाइल देना है। जबकि रूस से इस मिसाइल की मांग चीन ने भी की थी लेकिन रूस ने उसे ये मिसाइल देने से मना कर दिया है। गौरतलब है कि गलवान घाटी में खूनी संघर्ष के बाद भारत के रक्षा मंत्री ने रूस की यात्रा की थी और फाइटर जेट तथा अन्‍य घातक हथियारों की आपूर्ति के लिए समझौता किया था। वही भारत इंडो-पैसफिक में रूस और अमेरिका को पार्टनर बनाने की कोशिश में जुटा है। अगर ऐसा हो जाता है तो ये समझ लीजिये कि चीन का हिंद महासागर में दबदबा बिलकुल खत्म हो जायेगा जो चीन को बिलकुल सुहा नही रहा है और इसीलिये दोनो देशों के बीच दूरियां बढ़ रही है।

कुल मिलाकर रूस अगर चीन के विरोध में खुलकर खड़ा हो गया तो दुनिया में भी चीन का कोई साथी नही होगा जो उसके लिए एक बड़ी चोट होगी। खासकर तब जब भारत से उसकी तानातनी चरम पर है। लेकिन कही न कही भारत की नजर से देखे तो ये भारत के लिए एक फायदे का ही सौदा रहेगा।