विपक्ष का तो बस यही कहना, मौका मिले तो नहीं चूकना

मौके पर चौका मारना ही सियासत का आज असूल बन गया है आलम ये है कि बस जरा सी भी सत्ता पक्ष से चूक हुई बस सियासी रोटी सेकने के लिये विपक्ष निकल पड़ता है ऐसा ही आज लखीमपुर मामले में देखने को मिला है। कोई सड़क पर तमाशा कर रहा है तो कोई किसान हितैशी का सबसे बड़ा चेहरा बनने के लिये पुलिस से उलझ कर चमकना चाहता है। एक तरफ ये आंदोलन में जुटे है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया में इनको चमकाने का काम भी निकल पड़ा है और मजे की बात ये है कि लोकतंत्र में आंदोलन की दुहाई देकर ये सब कानून को तोड़ने में जुटे हुए देखे जा सकते है।

किसानों के नाम पर चुनावी सियासत
यूपी में महज कुछ महीने में ही चुनाव होने वाले है ऐसे में सत्ता पक्ष पर विपक्ष का हमला और तीखा होगा ये तो सब जानते है लेकिन लाशों पर सियासत की बाजार गर्म होगी ये तो लोकतंत्र के लिये शर्मसार करने वाली बात है। लेकिन क्या करे सत्ता से काफी दिनो से दूर विपक्ष जो लोगों के दिलों में जगह नहीं बना पा रहा है वो ऐसे मौको को भुनाकर सत्ता विरोधी लहर बनाना चाहता है। लखीमपुर में किसानो के साथ जो हुआ वो किसी भी तरह से ठीक नही है लेकिन उसपर लोकतंत्र के नाम जिस तरह से विपक्ष का नया रूप देखने को मिला है वो भी ठीक नही है। संवेदनशील मुद्दो को हवा देना विपक्ष का काम नही होना चाहिये। कुछ दिन पहले ऐसा ही कानपुर के मनीष गुप्ता हत्याकांड में भी देखा गया हालांकि विपक्ष की पोल खुद परिवार ने ही खोल दी। ऐसे में लखनऊ से लेकर जिस तरह की सियासत रातभर या सुबह या आने वाले कुछ दिन देखी जायेगी वो निंदा के काबिल होगी। क्योंकि विपक्ष के राज में भी किसानों के साथ कुछ ज्यादा अच्छा व्यवहार नहीं हुआ है और ऐसे में सब को मिलकर ये सोचना चाहिये कि कुछ ऐसा करे कि किसानों की समस्या दूर हो सके और देश आगे बढ़ सके।

सरकार ने तुरंत उठाये तुरंत सख्त कदम
वैसे अगर देखा जाये तो सरकार ने कानपुर का मसला हो या फिर लखीमपुर का हर मसले को तुरंत ही हल कर दिया है। विपक्ष के नेताओं की मांग के साथ परिवार की मांग को भी मान लिया गया है। इसी क्रम में सरकार ने लखिमपुर कांड में मरने वालो को 40 लाख रुपये तो घायल को 10 लाख रूपये देने की बात कही है। इतना ही नही मरने वाले हर किसान के परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की भी बात कही गई है तो आदालत से इसकी जांच के आदेश को भी मान लिया गया है। इससे ये साफ होता है कि सरकार हर मसले के जड़ तक जाना चाहता है और दूध का दूध पानी का पानी करना चाहता है।

ऐसे में शांति बने रहे इसके बारे में भी विपक्ष को सोचना चाहिये जिससे हालात और खराब ना हो और दूसरे मासूमो की जान ना जाये तभी लोकतंत्र की सच्ची जीत होगी।