शिक्षक दिवस विशेष – डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन की झलकियाँ

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

हमारे जीवन में गुरु (अर्थात) शिक्षकों के महत्व का बखान करता हुआ संस्कृत का ये श्लोक कहता है कि गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही शिव हैं; गुरु साक्षात् परम ब्रह्म हैं, ऐसे गुरु को प्रणाम|

Teachers Day Special

शिक्षक दिवस – भारत के दुसरे राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिवस

आज शिक्षक दिवस है, यानि साल का वो दिन जो शिक्षकों को समर्पित है| हमारे देश के दुसरे राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है| डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का कारण ये है, कि डॉक्टर राधाकृष्णन कोई राजनेता नहीं थे| वो ऐसे व्यक्तित्व के मालिक थे जिन्होंने अपना सर्वस्व शिक्षा और शिक्षण को ही न्योछावर कर दिया था|

संक्षिप्त परिचय

तमिलनाडु के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, उसके बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति और अंत में भारत के राष्ट्रपति बनने तक के सफ़र में डॉक्टर राधाकृष्णन ने जीवन के हर रूप का साक्षात्कार किया|

डॉक्टर राधाकृष्णन के जीवन के अनछुए पहलु

डॉक्टर राधाकृष्णन का व्यक्तित्व दुनिया के विरले महापुरुषों के व्यक्तित्व के जैसा था, वो सर्वप्रिय और सर्वसम्मानित जगतगुरु थे| आइये जानते हैं उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलू:

प्रभाव ऐसा की माओ के गाल थपथपा दिए

डॉक्टर राधाकृष्णन का प्रभाव ऐसा था कि एक बार चीन के दौरे पर जब वो चीन के मशहूर कम्युनिस्ट नेता, माओ से-तुंग, जिन्हें पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के संस्थापक के रूप में भी जाना जाता है के गाल थपथपा दिए थे| इस से हक्के बक्के माओ को फिर उन्होंने कहा की वो ऐसा पहले पोप और स्टालिन के साथ भी कर चुके हैं|

गरीबी में केले के पत्ते पर किया भोजन

डॉक्टर राधाकृष्णन के परिवार ने गरीबी में अपना जीवन-यापन किया| पूरा परिवार केले के पत्ते पर भोजन करता था| ऐसा कहा जाता है कि एक बार जब परिवार के पास केले के पत्ते खरीदने के पैसे भी नहीं थे, तो डॉक्टर राधाकृष्णन ने जमीन को साफ़ कर के जमीन पर ही भोजन ग्रहण किया|

कर्ज में मैडल तक बेचना पड़ा था

डॉक्टर राधाकृष्णन का प्रारंभिक जीवन विद्वता होते हुए भी दरिद्रता में ही गुजरा| अपने बड़े परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ता था, और समय पर कर्ज नहीं चुका सकने की स्थिति में उन्हें अपने मैडल तक बेचने पड़े थे|

अपने छात्रों की जान थे डॉक्टर राधाकृष्णन

डॉक्टर राधाकृष्णन अपने छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय थे| जब मैसूर यूनिवर्सिटी से उनका तबादला कलकत्ता यूनिवर्सिटी में हुआ तो उनकी विदाई के लिए मैसूर यूनिवर्सिटी के छात्रों ने फूलों से सजी बग्धी का इंतजाम किया और उसे खुद ही खींचकर रेलवे स्टेशन तक ले गए| ऐसा था छात्रों का डॉक्टर राधाकृष्णन के प्रति स्नेह और समर्पण|

राष्ट्रपति के पद को जनता से जोड़ा

सप्ताह के दो दिन डॉक्टर राधाकृष्णन बिना किसी पूर्व अनुमति के आम लोगों से मिलते थे| उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए थे| उन्होंने देश के सबसे बड़े पद को सुशोभित करते हुए भी जनता के साथ सीधा संवाद करना नहीं छोड़ा|

वाइट हाउस में हेलिकॉप्टर से पहुँचने वाले पहले अतिथि

डॉक्टर राधाकृष्णन अमरीकी राष्ट्रपति के निवास स्थान वाइट हाउस में हेलिकॉप्टर से पहुँचने वाले पहले अतिथि थे| उनसे पहले ये सम्मान किसी को हासिल नहीं था|

विश्वविख्यात दार्शनिक होते हुए भी मजाकिया लहज़ा

दर्शनशास्त्र के विश्वविख्यात गुरु होते हुए भी डॉक्टर राधाकृष्णन अपने मजाकिए लहजे के लिए जाने जाते थे| कहा जाता है कि 1962 में जब ग्रीस के तत्कालीन राजा भारत के अपने राजनयिक दौरे पर आये डॉक्टर राधाकृष्णन ने उनका स्वागत करते हुए कहा था, “महाराज, आप ग्रीस के पहले राजा हैं, जो भारत में अतिथि की तरह आए हैं। आपके पूर्वज सिकंदर महान तो यहां बिना निमंत्रण ही मेहमान बनकर आए थे।

त्याग और सादगी भरा जीवन

डॉक्टर राधाकृष्णन ने अपना सम्पूर्ण जीवन सादगी में जिया और त्याग की प्रतिमूर्ति बने रहे| अपने राष्ट्रपति काल में भी वो अपने वेतन का बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में दान कर दिया करते थे| उनके राष्ट्रपति बनने के बाद जब उनके कुछ छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जाहिर की, तो डॉक्टर राधाकृष्णन ने शालीनता से कहा कि, “मेरा जन्मदिन मनाने की बजाए अगर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाए तो यह मेरे लिए गर्व की बात है।“ तभी से उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाये जाने की परंपरा शुरू हुई|

उल्लेखनीय है कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने साल 1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया था| उन्हें ब्रिटिश राज में ‘सर’ की पदवी भी दी गई थी| ब्रिटिश सरकार द्वारा उनगे ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ सम्मान से भी नवाजा गया था| साल 1962 में उन्हें 10 साल तक उपराष्ट्रपति का पदभार सँभालने के बाद, देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया था|