काशी के कॉरिडोर की ऐसी है कहानी, आधुनिक भव्यता के साथ 1000 साल पुरानी बनावट को दर्शाता मंदिर

साल भर पहले काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन करना एक बड़ी जद्दोजहद वाली बात थी। तंग गलियों से निकलकर मंदिर परिषद तक पहुंचना और फिर लंबी सांपनुमा लाइन का सामना करना उसके साथ-साथ ढेर सारे पुलिस वालों की मौजूदगी, मानो ये बताती हो कि वो बाबा के दर्शन करने नहीं बल्कि किसी मोर्चे पर जा रहे हो। लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं है क्योकि काशी कॉरिडोर इन सब चीजों से निजात दिलाता है। काशी कॉरिडोर के लिए सरकार ने 5.5 लाख स्क्वायर फीट जमीन अख्तियार की है। इस प्रोजेक्ट की लागत 1000 करोड़ है और इसका ध्येय विश्वनाथ मंदिर के अड़ोस-पड़ोस के इलाकों को दोबारा भव्य बनाना है। इसके लिए एस्केलेटर्स लग रहें हैं और पूरे हिस्से को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 13 दिसंबर की यात्रा के लिए तैयार किया जा रहा है। रास्ते चौड़े किए जा रहे हैं और कॉरिडोर के लिए साफ सफाई जोर-शोर से चल रही है।

अयोध्या की तर्ज पर हो रहा काम

काशी कॉरिडोर का काम एक तरह से अयोध्या की तर्ज पर हो रहा है। इस कॉरिडोर को एक टूरिस्ट सेंटर की तरह डेवलप किया जा रहा है। जानकारो की माने तो काशी कॉरिडोर से एक चीज साफ है और वो ये कि मंदिर के आस-पास अधिकतर इमारतें मंदिरों के ऊपर बनाई गई थीं। उनका ये भी कहना है कि लोगों को बड़ी तस्वीर देखनी चाहिए। जैसे की इमारतें दुरुस्त नहीं थीं। सीवर का पानी गंगा में बह रहा था और कई दिनों से काशी पहुंचने वाले लाखों श्रद्धालुओं को गंदगी के ऊपर से चलकर मंदिर जाना पड़ रहा था। लेकिन काशी कॉरिडोर, चार धाम कॉरिडोर की तरह प्राचीन मंदिरों के आस-पास के इलाकों को ठीक करने की कवायद है।

कॉरिडोर के लिए पीएम मोदी ने दिया था फॉर्मूला

काशी कॉरिडोर के लिए प्रधानमंत्री ने एक फार्मूला दिया था। कोर्डिनेशन, कोऑपरेशन और रिहैबिलिटेशन यानी जिनकी जमीन गई है या घर टूटे हैं, उनको नई जगह दी जाए। इतना ही नही इस प्रोजेक्ट से स्ट्रीट टूरिज्म को को बहुत फायदा होगा। इसके जरिये शहर का राजस्व बढ़ेगा और बुनियादी व्यवस्था के लिए शहर पैसा खर्च कर पाएगा। व्यवस्था को करीब से देखें तो इसमें मंदिर की इकोनॉमी बदल जाएगी। पहले हर कोई प्रसाद बना सकता था, पर अब उसका टेंडर उठेगा। कॉम्प्लेक्स के अंदर दुकानें होगा। उनपर सरकारी हस्तक्षेप होगा, चाहे वो क्वालिटी को लेकर ही हो। कॉरिडोर पुरानी अर्थव्यवस्था की सीमाओं को तोड़कर नई अर्थव्यवस्था स्थापित करेगा।

1000 साल पहले जैसी बनावट

मंदिर के पुनर्निर्माण में पत्थर वैसे ही लगाए जा रहे हैं जैसे 1000 साल पहले लगते थे। परिसर के चार द्वार होंगे। यानी आप मंदिर में घाट और शहर दोनों तरफ से आ सकते हैं. लेकिन परिसर में घुसते ही विश्वनाथ के दर्शन नहीं होंगे। गंगा घाट की तरफ से भी पहले पायदान पर दर्शन नहीं होगा। श्रद्धालु को मंदिर के भीतर आना होगा। परिसर में विश्वानाथ मंदिर के अड़ोस-पड़ोस में खुली जगह बनाई गई है। मुख्य परिसर के बाहर भी एक बड़ा परिसर है जहां शॉपिंग की व्यवस्था होगी। हिंदू समाज में ये भावना अरसे से है कि प्राचीन मंदिरों का ध्यान नहीं रखा गया और प्रधानमंत्री मोदी की काशी में ये काम करना पुराने वायदे को पूरा करने जैसा है। इसलिए काशी कॉरिडोर केवल विश्वनाथ मंदिर से जुड़ा प्रोजेक्ट नहीं है, ये शहर से जुड़ा प्रोजेक्ट है।

हिंदुस्तान में शहरी इलाकों में दोबारा से विकास करना छोटा-मोटा काम नहीं होता और वो भी जब शहर काशी हो। ये आरोप भी लगेंगे कि ये सब चुनाव के लिए है, लेकिन यूपीए के पास भी 10 साल थे और वो भी मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम शुरू कर सकती थी। अयोध्या का नवनिर्माण, चारधाम में शंकराचार्य की मूर्ति और काशी विश्वनाथ में काम एक वैचारिक धागे से जुड़े हैं और वो ये कि आधुनिक भारत अपनी धरोहर से कटकर आगे बिगड़ न जाए।