कोरोना के टीका पर इतनी टीका-टिप्पणी सिर्फ भारत में ही हो सकती है

हमारे वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई है जिसके बाद सफल परीक्षण के उपरांत कोरोना का टीका आ ही गया औऱ टीकाकरण की तारीख भी आ गई है। अब जब टीका आ ही गया है तो पीछे-पीछे टिप्पणी को भी आना ही था। टीका और टिप्पणी का चोली-दामन का साथ जो ठहरा। जितने मुंह, उतनी टिप्पणियां, विपक्ष कुछ ज्यादा ही मुखर है। विपक्ष का धर्म ही यही होता है तुम दिन को अगर दिन कहोगे, वह रात कहेंगे।

हमारे देश में विज्ञान बड़ा या राजनीति, कोरोना का वायरस भी कन्फ्यूज

अब बहस इस बात को लेकर होनी चाहिए कि हमारे देश में विज्ञान बड़ा है या राजनीति! कोरोना का वायरस भी कन्फ्यूज हो गया है कि हाय, किस बुरी घड़ी में मैं इस देश में आया? एक तरफ ‘टीका’ उसके प्रयोग और प्रसार के स्वाद को ‘फीका’ बना रहा है, दूसरी तरफ यहां के राजनीतिक दल उस टीके की ही नाक में दम किए पड़े हैं। वहीं यह कोरोना का वायरस कितने भी रूप बदल ले। इसका नया स्ट्रेन आ धमके, लेकिन इसको हमारे देश की प्रतिक्षण रंग बदलने वाली राजनीति के सम्मुख मुस्कुराते हुए नतमस्तक होना ही पड़ेगा। इस नए ईजाद हुए टीके को भी एक अलग प्रकार के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। वह मानव शरीर की इम्युनिटी को भले ही न भेद पाए, किंतु उसको हमारे कुछ राजनेताओं की प्रतिरोधक क्षमताओं से दो-दो हाथ जरूर करने पड़ रहे हैं।

कोरोना टीका को राजनीति के अधकचरे ‘ज्ञान’ की प्रयोगशाला गुजरना पड़ रहा

भले ही कोरोना का यह टीका ‘विज्ञान’ की प्रयोगशाला में सफल हो गया है, किंतु इसको अब राजनीति के अधकचरे ‘ज्ञान’ की प्रयोगशाला से होकर गुजरना पड़ रहा है। ज्ञानी जन बिना मास्क लगाए और बिना हाथ धोए इस टीके के पीछे पड़ गए हैं। इधर कोरोना के टीके की आमद हुई है, इधर इन लोगों को कोरोना से अधिक उसके इस टीके से खतरे की बू आने लगी है। यह कोरोना का वायरस तो लॉकडाउन की सख्ती और ताली-थाली की आवाज से भी उतना भयभीत नहीं हुआ था, जितना यह सोचकर डरा हुआ है कि एक बार राजनीति के हत्थे चढ़ गया है तो फिर उसका वह हश्र होगा कि वह किसी भी व्यक्ति से खुद ही दो गज की दूरी बना लेने में ही अपनी खैर समझेगा।

 सियासत तो कुछ इस तर की हो रही है कि कुछ लोग कोरोना टीका को माथे का टीका समझ कर पूज रहे है तो कुछ टीका राम समझ कर दुतकारने में लगे है। लेकिन इन सब के बीच सवाल यही बना हुआ है कि इस बिन बुलाये मेहमान से आखिर कम छुटकारा मिलेगा और इस सवाल को लेकर जनता परेशान है तो नेता सियासी गणित लगाने में जुटे है कि अगर कोरोना को जाते जाते वअपनी पार्टी का हथियार नही बनया तो फिर इस महामारी का क्या फायदा बस इसी लिये तो कुछ पार्टिया अब कोरोना और कोरोना के टीके के पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ गये है और भइया ये तो सब जानते है कि अगर नेता किसी पीछे पड़ जाये तो फिर उसका तो भगवान ही मालिक है।