वो छात्र नेता, जिन्होंने केंद्रीय राजनीति में भी कमाई बड़ी नाम

भारत में छात्र राजनीति से उभरे नेताओ की कमी नहीं है| देश में ऐसे कई दिग्गज नाम अब भी मौजूद है जिन्होंने जब छात्र राजनीती के सफ़र को पार करते हुए राज्य व केंद्र की सियासत को गले लगाया तो सियासत ने भी उन्हें जी भर के शोहरत दिया|

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देश में छात्र राजनीति का इतिहास लगभग 170 साल पुराना है| वो आजादी से पहले का समय हो या बाद का, देश में छात्र राजनीती हमेशा से ही सक्रिय रही है| हाँ ये जरूर है की छात्र राजनीति की भूमिका समय-दर-समय बदलती गई| आजादी से पहले हुए जनआंदोलनों में भी छात्र राजनीती ने उतनी ही सक्रियता निभाई, जितनी बाद में| यही वजह है की छात्र राजनीती के प्रभाव को भांपते हुए सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरु जैसे लोगो ने भी छात्र राजनीति को तवज्जो तो दी ही साथ-साथ अपने जीवन के धुर में भी रखा|

यह छात्र राजनीति के असर का ही प्रभाव था कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने जब 1919 में सत्याग्रह, 1931 में सविनय अवज्ञा और 1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तो, युवाओं और खासकर छात्रों को इससे जोड़ना जरूरी समझा| गाँधी के इस पहल के बाद गुजरात विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, विश्वभारती, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वद्यिालय और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे शिक्षा केंद्र विद्यार्थी आंदोलनों का गढ़ बन गए थे। महात्मा गांधी के बताये रास्ते पर चलने वालो ने भी छात्र राजनीती पर भरोसा किया| जयप्रकाश नारायण का आंदोलन इसी बात की मिसाल है। इसके अलावा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने व इसके खिलाफ माहौल बनाने में भी छात्र आंदोलनों का हाथ था।

छात्र राजनीति को भविष्य की राजनीति की पौधशाला कहा जाता रहा है। छात्र राजनीति के क्षितिज से उभर कर देश के विस्तृत राजनीतिक फलक पर अपने आप को स्थापित करने वालों में आज देश के दिग्गज नेताओं के नाम शुमार हैं। यह छात्र राजनीती के शक्ति का ही परिचायक है कि छात्र राजनीति ने जब भी किसी बड़े आंदोलन को जन्म दिया है तो समाज में कोई न कोई सकारात्मक परिवर्तन हुए ही है। यह रिवायत देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में भी मौजूद रही। जब-जब किसी बड़े नेताओ के आह्वान पर छात्र शक्ति ने मुहीम शुरू की उसने देश की दशा-दिशा बदल कर रख दी| चाहे वो आजादी के पहले गाँधी, बोस के आह्वान पर छात्रों का एक जुट होना हो या फिर जेपी आन्दोलन में छात्र शक्ति का गोलबंद होकर आन्दोलन करना| यही वजह भी थी की छात्र शक्ति को सत्ता में भागीदारी भी मिली| आइये कुछ ऐसे चेहरे के बारे में जानते है, जिन्होंने छात्र राजनीति के सफ़र के सहारे प्रदेश व् देश की सियासत में कदम रखी, और बाद में सियासत में भी खूब नाम कमाई:

नीतीश कुमार

आज बिहार के सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार कभी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष रहे थे| तब उनकी पहचान एक उभरते छात्र नेता के तौर पर हुआ करती थी| बाद में नीतीश कुमार ने युवाओं की ‘छात्र संघर्ष समिति’ में भी अहम् भूमिका निभाई। 1975-77 के बीच आपातकाल के चलते जेल भी जाना पड़ा| लेकिन जयप्रकाश आन्दोलन से जुड़े नीतीश ने जब एक दफा बिहार की सियासत में कदम रख दिया, उसके बाद कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा| 1985 में लोक दल से विधायक चुने गए नीतीश ने 1989 के बाद छह बार लोकसभा सीट जीती| इसके बाद अटल बिहारी के सरकार में रेल मंत्रालय संभाला| नीतीश कुमार के लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की 2005 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार आज भी बिहार के मुख्यमंत्री है|

सुषमा स्वराज

पेशे से वकील और मौजूदा सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राजनीति का ककहरा छात्र राजनीति के दिनों से ही सीखना शुरू कर दिया था| सातवें दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ हरियाणा में सियासी करियर की शुरुआत करने वाली तब महज 25 वर्ष की उम्र में ही हरियाणा सरकार में मंत्री बन गयी थी| केंद्र की सियासत में जब सुषमा ने कदम रखा तो 1990 में वो पहली बार राज्यसभा सदस्य बनीं। इसके बाद 1996 में दक्षिण दिल्ली से लोक सभा सीट जीती। सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री, केंद्र में सूचना-प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता भी रह चुकी है|

प्रफुल्ल कुमार महंत

गैर असमिया लोगों के विरुद्ध आंदोलन में प्रभावी नेता के तौर पर उभरे प्रफुल्ल कुमार महंत गुवाहाटी में वकालत की पढ़ाई के दौरान प्रभावशाली छात्र संगठन ‘अखिल असम छात्र संघ’ से जुड़े और 1979 में उसके अध्यक्ष बनाए गए | आन्दोलन के दौरान 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ प्रफुल्ल कुमार ने ऐतिहासिक असम समझौते पर हस्ताक्षर किए| जिसके बाद 1985 में ही असम गण परिषद पार्टी बनी और उस साल पार्टी के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया| महंत जब मुख्यमंत्री बने तब वह देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे| बाद में प्रफुल्ल कुमार के सियासी जीवन में उतार चढाव भी आये लेकिन उनके क्षेत्र की जनता ने उन्हें सर आँखों पर बिठाये रखा| पिछले आम चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने के बाद महंत ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया जिदके बाद वर्तमान में वह असम विधानसभा में विधायक हैं|

प्रकाश करात

2005 से 2015 तक सीपीआइएम के महासचिव रहे प्रकाश करात जेएनयू छात्रसंघ के तीसरे अध्यक्ष (1973) चुने गए थे| बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माक्र्सवादी) के महासचिव भी रहे| करात पार्टी के छात्र संगठन एसएफआइ से चुने गए थे। करात केंद्र की राजनीति में भले बड़ा नाम हासिल न कर पाए हो लेकिन राजनीति उनके लिए संघर्ष का पर्याय था| वह 1974 से 1979 तक स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे।

चंद्रशेखर

छात्र राजनीति के दिनों में चंद्रशेखर की पहचान बतौर फायरब्रांड छात्र लीडर के तौर पर थी| बाद में राम मनोहर लोहिया के साथ अपनी राजनितिक सफ़र को आगाज देने वाले चंद्रशेखर 1962 से 1977 तक राज्यसभा के सदस्य थे| चंद्रशेखर 1977 में बलिया जिले से पहली बार लोकसभा के सदस्य बने थे। उनको जानने वाले लोग बताते है की चंद्रशेखर हर दिल अजीज नेता थे| उनके शख्सियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की बिना किसी बड़े राजनितिक प्रभाव के चंद्रशेखर उस ओहदे तक पहुंचे, जहाँ बड़े-बड़े सियासी हैसियत वाले लोग नहीं पहुँच पाते है, मतलब 1990 से 1991 तक बगैर किसी बड़े राजनितिक पृष्ठभूमि के चंद्रशेखर ने नौवें प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला|

सर्बानंद सोनोवाल

कभी छात्र राजनीति की सफ़र करते हुए आज असम के मुख्यमंत्री पद तक पहुचने की कड़ी में सर्बानंद सोनेवाल के जिन्दगी में कामयाबी के कई मुकाम जुड़ते चले गए| उनको जानने वाले लोग बताते है की एक बार जो उन्होंने सियासी रफ़्तार पकड़ी वो आज तक थमी नहीं| सोनोवाल ने असम गण परिषद से जुड़ अपने सियासी सफ़र की शुरुआत की| बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया| चुनावी राजनीति में उतरने के बाद 2001 में सोनोवाल असम गण परिषद से ही पहली बार विधायक चुने गए| इसके ठीक बाद 2004 में वह असम गण परिषद से ही सांसद भी चुने गए| इसके अलावा वें असम में गृह मंत्री और उद्योग-वाणिज्य मंत्री भी रह चुके हैं।