सरकार और किसान के बीच संवाद में कुछ लोग बन रहे बाधा

हाल में नए संसद भवन की आधारशिला रखने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कुछ कहना और कुछ सुनना हमारे लोकतंत्र का प्राण है। वास्तव में किसी भी परिस्थिति में दूसरे पक्ष से संवाद बनाए रखने की हमारी यह परंपरा हर समस्या के समाधान का अचूक हथियार रही है

संवाद में असफलता तभी हो सकती है जब एक पक्ष पूरी तरह पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो

महाभारत में श्रीकृष्ण का धृतराष्ट्र के पास पांडवों का दूत बनकर जाना और श्रीराम का अंगद को रावण के दरबार में भेजना शांति के लिए किए गए दो ऐसे प्रकरण हैं जो संवाद में गहरी निष्ठा रखने के कारण ही घटित हुए। ये दोनों असफल रहे, मगर यह संदेश दे गए कि दो विरोधी पक्षों के बीच शांति स्थापना के प्रयास करने चाहिए। इसका सबसे सशक्त मार्ग संवाद ही है। संवाद में असफलता तभी हो सकती है जब एक पक्ष पूरी तरह पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो और संवाद में भागीदारी मजबूरी या बिना इच्छा से कर रहा हो। साथ ही साथ संवाद में हठधर्मिता का भी कोई स्थान नही होना चाहिये ऐसा न होने से ही मसले का हल निकलता है हालांकि इस वक्त किसान और सरकार के बीच कुछ लोग हैं जो संवाद में हठ घारण किये हुए है और किसानों को सड़क पर बैठने के लिए मजबूर किये हुए हैं।

वादविवाद में उलझें 

वाद-विवाद में उलझने पर संभावनाएं, सहमति और समाधान पीछे छूट जाते हैं। मानव समाज में संवाद शांति स्थापना की पहली सीढ़ी है। इसे बढ़ाने के प्रयासों को अविश्वास, हिंसा और युद्ध से मुक्ति पाने की ओर पहला कदम माना जाना चाहिए। लेकिन आज किसान और सरकार के बीच जिस तरह से संवाद हो रहा है वैसे में आंदोलन को हाईजैक करने वाले लोग सरकार से मसले का हल नही चाहते बल्कि देश में सियासत गर्म करने और विकास के कामो से दिमाग हटाकर सिर्फ विवाद में उलझाये रखना चाहते हैं। ये लोग वही लोग है जो देश में बीते कई सालों से सिर्फ अपना फायदा करवा रहे थे और जनता के बारे में कुछ भी नही सोचते थे आज उनके मन में एक डर समाया है कि अगर मोदी सरकार गरीबों का उत्थान कर देती है तो फिर उनका भविष्य क्या होगा इसलिये सरकार के किसान आंदोलन को लेकर उदारता के बाद भी ये सिर्फ कानून वापस लेने की मांग करके विरोध का आक्रोश जारी रखना चाहते हैं।

वैसे कुछ लोगों के दिमाग में ये चल रहा है कि अन्ना आंदोलन की तरह किसान आंदोलन की धार से मोदी सरकार की धार को कम किया जा सकता है। लेकिन शायद वो ये भूल गये कि अन्ना आदोलन के दौड़ कुछ और था आज का दौड़ कुछ और है आज देश को अपने नेता मोदी जी पर विश्वास है कि वो देशहित में ही काम कर रहे हैं। जैसा कई बार देखा भी गया ह।  ऐसे में किसानों को फंसा कर ये लोग अपना उल्लू सीधा  नही कर सकते क्योंकि देश की जनता इनके आंदोलन की हकीकत जानने लगी है।