कद छोटा लेकिन व्यक्तित्व बहुत बड़े

‘जय जवान जय किसान’ की अलख जगाने वाले पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री जी का आज जन्मदिन देश बना रहा है। छोटे कद के शास्त्री जी के किस्से बहुत बड़े बड़े चलिये उनसे जुडे पाक जंग और अनाज के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के दो किस्से आपको बताता हूं।

शास्त्री जी के पैरों पर ऐसे गिर गया था पाकिस्तान

आज से तकरीबन 55 साल पहले पाकिस्तान को जो मुगालता था शायद वही मुगालता अभी तक है। 55 साल पहले छोटी कद काठी वाले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को उदार छवि वाला नेता माना जाता था। इस उदार छवि वाले की इच्छा शक्ति इतनी मजबूत थी कि अमेरिका, चीन और यूरोपीय यूनियन के समर्थन वाले पाकिस्तानी राष्ट्रपति और सेना अध्यक्ष अय्यूब खां को भारत से युद्ध छेड़ कर मुंह की खानी पड़ी थी। 1962 के चीन से हुए युद्ध के बाद भारत अपने जख्म भरने पर लगा हुआ था। अय्यूब खां को यह उम्मीद नहीं थी कि लालबहादुर शास्त्री पाकिस्तानी हमले का जवाब भी दे पायेंगे। जनरल अय्यूब खां को लगा कि इसी वक्त कश्मीरियों को बरगला कर और कश्मीरियों के वेश में सैनिकों की घुसपैठ कराकर वो भारत से कश्मीर को छीन लेंगे। पाकिस्तान आज भी घुसपैठियों को भेजकर भारत के सैनिक ठिकानों पर हमला करवाता है,  ठीक वैसे जैसे  52-53 साल पहले अय्यूब खां करवाते थे। अय्यूब खां ने फौज के 30 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को कश्मीरियों की वेश-भूषा में कश्मीर में भेज दिया, लेकिन भारतीय जांबाजों ने उन सब को धकेलते, रौंदते हुए हाजी पीर दर्रा तक कब्जा कर लिया था। 1965 में पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तानी फौज भारी पड़ रही थी। खेमकरन तक उसका कब्जा हो चुका था। ऐसे वक्त पाकिस्तान को कमजोर करने के लिए पंजाब फ्रंट खोलना जरूरी था। तत्कालीन भारतीय सेना अध्यक्ष जेएन चौधरी पंजाब फ्रंट नहीं खोलना चाहते थे। लेकिन, लाल बहादुर शास्त्री की जिद आगे जनरल चौधरी ने फौज को हमले का आदेश दे ही दिया,  नतीजा भारत के पक्ष में था। भारतीय फौजें लाहौर तक पहुंच गईं, पाकिस्तान के सामने सरैंडर के सिवाए दूसरा रास्ता न था।

पहल अपने परिवार को रखवाया उपवास फिर जनता से की अपील

साल 1965 जब भारत पाक के बीच जंग हो रही थी उसी दौरान अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जॉन्सन ने शास्त्री को धमकी दी थी कि अगर आपने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई बंद नहीं की तो हम आपको पीएल 480 के तहत जो लाल गेहूँ भेजते हैं,  उसे बंद कर देंगे। उस समय भारत गेहूँ के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था। शास्त्री को ये बात बहुत चुभी क्योंकि वो स्वाभिमानी व्यक्ति थे। उन्होंने देशवासियों से कहा कि हम हफ़्ते में एक वक्त भोजन नहीं करेंगे। उसकी वजह से अमरीका से आने वाले गेहूँ की आपूर्ति हो जाएगी। लेकिन शास्त्री जी इस सोच में थे कि देश की जनता इसका पालन कर लेगी। इसी बात को जानने के लिये उन्होने सबसे पहले खुद अपनी पत्नी से एक वक्त खाना नही बनाने का आग्रह किया। जब उन्होने देख लिया कि उनका परिवार एक वक्त बिना खाना खाये रह सकता है। तब उन्होने देश की जनता से हफ्ते में एक दिन एक वक्त का उपवास रखने की अपील की जिसका उन्हे जनता की तरफ से भरपूर समर्थन मिल और देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बन सका।