निहित स्वार्थ को पूरा करता शाहीन बाग

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क्या भारत का मौलिक अधिकार दूसरे के मौलिक अधिकार का हनन करने का अधिकार देता है, नही तो फिर शाहीन बाग में पिछले एक महीने से बैठे प्रदर्शनकारी क्यो नही इस बात को समझ रहे है? क्यो हर दिन करीब 10 लाख लोगों को जाम के झाम में फंसाकर सिर्फ सियासत करने में लगे है?

बीते एक महीने से शाहीन बाग इलाके में CAA को लेकर धरना प्रदर्शन चल रहा है। लेकिन अगर इस धरने को देखे तो ये धरना आम लोगों के लिए आज मुसीबत का सबब बना हुआ है। वैसे भौगोलिक अधार पर देखे तो शाहीन बाग दिल्ली को दो राज्यों से जोड़ता है, एक उत्तर प्रदेश तो दूसरा हरियाणा लेकिन आज कल ये जोड़ने की जगह तोड़ने का स्थान बन गया है।

क्या कहता है कानून? –

भारत के संविधान में यू तो मौलिक अधिकार के लिए अनुच्छेद 19 में वर्णन किया गया है, जहां लिखा हुआ है, कि संविधान हमे शांतिपूर्ण अपनी बात रखने के लिये एक स्थान पर इकट्ठा होने का अधिकार देता है यानी की सरकार के विरोध में या अपनी किसी मांग को लेकर हम एक स्थान पर इकट्ठा होकर अपनी मांग के लिये आवाज बुलंद कर सकते है। लेकिन इसके साथ साथ इसमें ये भी लिखा है, कि अगर आपके प्रदर्शन से जनहित में कोई नुकसान हो रहा है, तो उसे हटाया जा सकता है। फिर से हम जोर देकर बोलेगे की अगर जनहित में कोई परेशानी खड़ी होती है तो धरने को हटाया जा सकता है, ऐसे में सवाल ये उठता है, कि आखिर क्यो पुलिस या उस इलाके के बुद्धिजीवी इस प्रदर्शन को खत्म करवा रहे है? तभी तो कोर्ट ने भी पुलिस और प्रशासन के विवेक पर ही फैसला छोड़ दिया है कि वो कैसे इस विवाद से निपटेंगे। बहरहाल वहा जो भीड़ हर रोज आ रही है उसे भी बड़ा दिल दिखाते हुए सड़क से प्रदर्शन खत्म कर देना चाहिये। यही सबके हित में है।

सियासत चमकाने का मंच-

शाहीन बाग के लोग तो दूसरे लोगों की परेशानी को समझ कर धरना खत्म करने की बात सोच भी सकते है, लेकिन जिस तरह से अपनी सियासत चमकाने के लिए कुछ नेता इस मंच का गलत इस्तेमाल कर रहे है, वो इसे जल्द खत्म नही करना चाहते है, क्योकि इस मंच के जरिये ही उन्हे मीडिया में जगह मिल रही है। तभी तो मंच से मीडिया को मुद्दा देने के लिये ये आग उगल रहे है और भड़काने वाले बयान दे रहे है। वही दूसरी तरफ गौर करे तो आज शाहीन बाग किसी पिकनिक वाली जगह से कम नही है। यहां कुछ बच्चे क्रिकेट खेलते आपको दिख जायेगे तो बिरियानी से लेकर तमाम तरह की दुकाने भी सज चुकी है। ऐसे में ये इलाका धऱना प्रदर्शन स्थल कम बल्कि किसी मेले से कम नही दिख रहा है।

इस बीच एक सवाल धरने पर बैठे उन लोगो से जरूर है, आखिर वो उन 10 लाख लोगों के बारे में क्यो नही सोच रहे है, जो हर दिन जाम से रूबरू हो रहे है और उन लोगों के बहकावे में क्यो आ रहे है, जो हर दिन सिर्फ अपनी सियासत जमकाने के लिये उनका इस्तेमाल कर रहे है। ऐसे में अब शाहीन बाग के लोगो को जरूर सोचना चाहिये, फिर उसके बाद कोई फैसला करना चाहिये, जिससे सबकुछ अमन के साथ साथ सुलझ जाये वरना कानून की लाठी में आवाज नही होती ये तो सब जानते है।


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