पुलिस के जवान को दिल से सलाम

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कोरोना काल के एक पखवारे में यूं तो जिंदगी जीने का तरीका ही बदलकर रख दिया है। बल्कि कुछ लोगों को लेकर धारणा भी बदल गई। जी हां अब देश की पुलिस को ही ले लिया जाये, कोरोना संकट से पहले पुलिस को लेकर हर आम आदमी में नकरात्मक सोच ज्यादा थी, लेकिन कोरोना संकट में पुलिस का नया रूप देखकर सबकी सोच सकरात्मक हो गई है।

कभी कठोर तो कभी कोमल

लॉकडाउन के नियमों को पालन करवाने को लेकर देश की पुलिस के दो रूप सामने आये। एक रूप ऐसा जिसमें कठोरता थी, तो एक रूप ऐसा जिसमें कोमल दिल की करुणा दिख रही थी, कभी लोगों से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते पुलिस वाले दिखे, तो कभी लोगों को नाफ़रमानी करने पर सजा देते हुए दिखे। कुछ पुलिस वाले तो इस दौरान सजा भी अजब तरह से दे रहे थे, जिससे लोगों को सबक मिल सके कि उन लोगों ने गलत काम किया है। लेकिन इस कठोरता और कोमलता के पीछे मकसद सिर्फ एक था और वो था हम सब की जान बचाना। कोरोना से लोहा ले रहे,  कुछ पुलिस के जवान तो अपनी सुध तक खो बैठे न उन्हे खाने की फ्रिक थी और न ही सोने की बस लगे हैं तो हमारे और कोरोना के बीच एक ऐसी दीवार बनकर की वो हमे अपने शिकंजे में न कस सके। सच में ये जज्बा देखकर बस सलाम करने का ही मन होता है।

मदद करते हाथ

कोरोना काल में एक तस्वीर ऐसी भी देखने को मिली जिसमें पुलिस के जवान समूचे देश में मदद करते हुए दिखे कहीं पुलिस बजुर्गोंको दवा देती हुई दिखाई दी तो कहीं बच्चों को जन्मदिन के मौके पर सरप्राइज किया। तो किसी को अपनों से मिलाया इतना ही नही सड़को में घूम रहे अवारा जानवरों को निवाला भी खिलाया और ये क्रम किसी एक राज्य का नहीं बल्कि समूचे देश में देखने को मिल रहा है।  कई राज्यों की पुलिस ने हर दिन जाने कितने बेसहारा लोगों को खाना खिलाकर ये बता दिया, कि मानवता धर्म सबसे बड़ा धर्म होता है। जो खाकी वर्दी वालों में कूट-कूट कर भरा हुआ है। जो इन जवानो को आसमान की बुलंदी तक ले जाता है।

 

लेकिन दिल उस वक्त कौंध उठता है, जब इसी दौरान ये देखने को मिला की पुलिस के जवान हमारी जान बचाने में लगे हैं। कुछ जाहिल उनपर ही हमला कर रहे हैं। जो हमें स्वस्थ करने के लिये हर तरह की मदद पहुंचा रहे हैं हम उनपर ही ईंट और पत्थर बरसा रहे हैं। आखिर ऐसे जाहिलों की सोच क्या है ये समझ पाना मुश्किल है, लेकिन कुछ भी हो जब जब जवानों पर हमला होते हुए तस्वीर सामने आई तब तब दिल में दर्द जरूर हुआ । ऐसा लगा जैसे पत्थर उनपर लग रहे हो लेकिन चोट सारी मानवता के शरीर पर लग रही हो। इतिहास इन घटनाओ को क्या नाम देगा ये तो उसपर ही छोड़ते है। लेकिन इतना तय है कि इतिहास इन जाहिलों को कभी माफ तो नही कर पायेगा।

फिलहाल देश के इन असल सपूतों को अंत में नमन करते हुए यही कहना चाहूंगा कि जो काम आज वो कर रहे हैं उसका अहसान देश कभी नही भुला पायेगा। बस ये जरूर ध्यान रखेगा कि मुसीबत के वक्त पुलिस ही थी जिसने समाज को कोरोना से बचाया।


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