इतिहास गवाह है जिसने लिया पंगा, वो हुआ सियासत में खत्म

इतिहास में जाएँ तो कई बार ऐसा हुआ है जब किसी बड़े नेता ने मोदी जी के साथ पंगा लिया है लेकिन इतिहास ये भी है कि जिस नेता ने पीएम मोदी से पंगा लिया तो नुकसान मोदी को नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक खामियाजा उस मुख्यमंत्री या नेता को उठाना पड़ा, जिसने जानते-बूझते मोदी को मुसीबत में डालने की कोशिश की अपने लापरवाह रवैये के साथ। आज हम कुछ ऐसी ही कई उदाहरण आपके सामने रखते है।

पंजाब सरकार की लापरवाही के चलते फंसा पीएम का काफिला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पंजाब की कांग्रेस सरकार और स्थानीय पुलिस की लापरवाही के कारण अपना फिरोजपुर दौरा पूरा किये बिना कल दिल्ली लौट आना पड़ा। सड़क जाम कर किसी प्रधानमंत्री का रास्ता रोका गया हो, सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया गया हो और स्थानीय प्रशासन मूक दर्शक बना रहा हो, ये शायद पहली बार ही हुआ। पंजाब के फिरोजपुर जिले से बुधवार की शाम पीएम नरेंद्र मोदी के रुके हुए काफिले की जो तस्वीरें आईं, वो देश के लोगों को अवाक कर देने वाली थीं। हाल के दशकों में कभी याद नहीं आता कि किसी प्रधानमंत्री का काफिला सड़क जाम कर दिये जाने की वजह से रुका हो और करीब बीस मिनट तक इंतजार करने के बाद पीएम को वापस लौट जाना पड़ा हो।

अजीत सिंह को भी महंगी पड़ी मोदी से रार

चौधरी चरण सिंह के बेटे और यूपीए सरकार में नागरिक उड्ड्यन मंत्री रहे अजीत सिंह को भी मोदी के साथ अपनी रार काफी महंगी पड़ी। ये किस्सा भी 2014 लोकसभा चुनावों से जुड़ा हुआ है। बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर मोदी लोकसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा होने के साथ ही फरवरी- मार्च के महीने में रोजाना आधी दर्जन रैलियां देश के अलग-अलग हिस्सों में कर रहे थे। हर सुबह अहमदाबाद से उड़ान भरते और देर शाम वापस गांधीनगर के अपने आधिकारिक सीएम आवास पहुंचते थे। उनका एक-एक मिनट महत्वपूर्ण था, आखिर न सिर्फ मोदी प्रधानमंत्री पद के औपचारिक उम्मीदवार थे, बल्कि बीजेपी और एनडीए के लिए सबसे बड़े कैंपेनर भी थे। इस दौरान आजीत सिंह यूपीए-2 में नागरिक उड्डयन मंत्री और वो कांग्रेस के इशारे पर पीएम मोदी की उड़ानो को रास्ता नही दिलवा रहे थे। उनका सूपड़ा भी 2014 के चुनाव में साफ हो गया था।

चंद्रबाबू नायडू के साथ भी हुआ हुआ कुछ ऐसा

एक समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर कॉरपोरेट इंडिया के डार्लिंग रहे और निवेश और विकास के मामले में अपनी मजबूत छाप जमा लेने वाले चंद्रबाबू नायडू एनडीए के महत्वपूर्ण नेताओं में से थे। खुद एक समय देश का पीएम बनने का भी सपना देखते थे। 2018 आते-आते वो भी एनडीए छोड़कर मोदी के कट्टर सियासी दुश्मन बन गये। देश भर में घूम घूम कर मोदी के खिलाफ गोलबंदी करते रहे। वहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन मोदी के साथ अपनी रार को वो निजी दुश्मनी तक ले गये। मोदी की जनवरी 2019 की छह तारीख को गुंटूर में रैली होने वाली थी, उससे पहले चंद्रबाबू नायडू और उनकी पार्टी टीडीपी ने मोदी के खिलाफ सियासत की सारी हदें पार कर दीं। ‘मोदी गो बैक’ के नारे के साथ पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर आ गये और माहौल ऐसा बनाया गया कि अगर मोदी सभा के लिए आ गये तो उनके खिलाफ हिंसक प्रदर्शन होगा। टकराव को टालने के लिए मोदी को अपना गुंटूर दौरा स्थगित करना पड़ा। आखिरकार फरवरी की दस तारीख को मोदी गुंटूर में रैली कर पाए लेकिन नायडू का मोदी पर निजी हमला और विष वमन जारी रहा। आज चंद्रबाबू नायडू कभी कभी पत्रकार सभा में रोते हुए नजर आते हैं।

पी चिदंबरम को भी उठाना पड़ा नुकसान

वैसे उदाहरण कई हैं। जिसने भी निजी दुश्मनी पालकर मोदी का नुकसान करने की कोशिश की, उसे घाटा ही हुआ, खास तौर पर जिसने भी मोदी की सुरक्षा या फिर जीवन के साथ खिलवाड़ किया। एक समय देश के गृह मंत्री रहे पी चिदंबरम को भी इसका अहसास होगा, जो मोदी को अदालती पचड़ों में फंसाने में लगे रहे थे या फिर सुरक्षा घेरा कम करने की कोशिश की। लेकिन चिदंबरम के लिए भी ये नुकसान का सौदा ही रहा। 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ पाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाए वो, बेटे को अपनी सीट शिवगंगा से आगे किया, पूरी ताकत से वहां प्रचार किया, फिर भी बेटे कार्ति को हार का सामना करना पड़ा, चौथे नंबर से संतोष करना पड़ा, जिस शिवगंगा सीट से खुद चिदंबरम 1984 से सात बार लोकसभा चुनाव जीते थे।

तो आप समझे जिसने भी पीएम मोदी से पंगा लिया समझो उसकी सियासत खत्म हो गई और वो राजनीति के शुन्य में पहुंच गया। शायद ये बात पंजाब के सीएम चन्नी को भी भविष्य में समझ आ जाएगा।

 

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