Public Safety Act: दादा के बनाए कानून के शिकंजे में फंसे उमर अब्दुल्ला, जानें क्या है मामला

 Public Safety Act: Omar Abdullah caught in the grip of grandfather's law

जन सुरक्षा अधिनियम या पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) इन दिनों चर्चा में है। दरअसल, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला तथा पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा मुफ्ती को पब्लिक सेफ्टी एक्ट (Public Safety Act) यानी सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम(PSA) के तहत हिरासत में रखा गया है। ये दोनों नेता जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद पिछले छह महीने से नजरबंद थे। नजरबंदी के आखिरी दिन सरकार ने उनपर पब्लिक सेफ्टी एक्ट लगाकर उन्हें हिरासत में ले लिया है।

उमर अब्दुल्ला के दादा लेकर आए थे कानून

बता दें कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट (Public Safety Act) के तहत बिना मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को दो साल तक की गिरफ्तारी या नज़रबंदी का प्रावधान है। विडंबना यह है कि उमर अब्दुल्ला उसी कानून के तहत हिरासत में हैं जिसे 1970 के दशक में उनके दादा और पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला (Sheikh Abdullah) ने मंजूरी दी थी। उस वक्त इस कानून को बेहद अलग वजह से बनाया गया था। बता दें कि सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) को लकड़ी की तस्करी को रोकने के लिए एक सख्त कानून के रूप में लाया गया था। दरअसल उस वक्त जेल में रहकर भी अपराधी लकड़कियों की तस्करी में लगे थे। इसलिए शेख अब्दुल्ला की सरकार ने इसे रोकने के लिए पीएसए जैसा सख्त कानून बनाया था। बाद में इसे उन लोगों पर भी लागू किया जाने लगा था, जिन्हें कानून व्यवस्था के लिए संकट माना जाता है। यह सरकार को 16 साल से ऊपर के किसी भी व्यक्ति को दो साल तक बिना मुकदमा चलाए रखने की अनुमति देता था। 2011 में, न्यूनतम आयु 16 से बढ़ाकर 18 कर दी गई थी।

दशकों से इसका इस्तेमाल आतंकवादियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों के खिलाफ किया जाता था। अनुच्छेद 370 के फैसले के बाद जारी सुरक्षा बंदिशों के बीच पहली बार मुख्यधारा के राजनीतिज्ञ, सांसद और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके किसी व्यक्ति को PSA के तहत नजरबंद किया गया है।

विपक्ष ने उठाये सवाल

अब्दुल्ला को हिरासत में लिए जाने के बाद विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठने भी शुरू हो गए हैं। सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि ‘उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और अन्य के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के गलत तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर बुरी तरह से आहत हूं। ये लोकतंत्र में सबसे घटिया और गंदा कदम है।’ बता दें कि अब्दुल्ला उस समय से नजरबंद थे, जब 05 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर उसे दो केंद्रशासित प्रदेश में बांट दिया था। फारुक अब्दुल्ला, बेटे उमर अब्दुल्ला और पीडीपी मुखिया महबूबा मुफ्ती समेत कई दूसरे बड़े नेता भी हिरासत में रखे गए हैं।

बिना सुनवाई के दो साल तक रह सकती है कैद

शुरुआत में इस कानून के मुताबिक, दो साल तक किसी तरह की सुनवाई नहीं हो सकती थी,लेकिन वर्ष 2010 में इसमें कुछ बदलाव किए गए। पहली बार के उल्लंघनकर्त्ताओं के लिए पीएसए के तहत हिरासत अथवा कैद की अवधि छह माह रखी गई और अगर उक्त व्यक्ति के व्यवहार में किसी तरह का सुधार नहीं होता है तो यह दो साल तक बढ़ाई जा सकती है। यही नहीं यदि राज्य सरकार को यह आभास हो कि किसी व्यक्ति के कृत्य से राज्य की सुरक्षा को खतरा है, तो उसे 2 वर्षों तक प्रशासनिक हिरासत में रखा जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति के कृत्य से सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने में कोई बाधा उत्पन्न होती है तो उसे एक वर्ष की प्रशासनिक हिरासत में लिया जा सकता है। इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार हिरासत में लिये गए किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई मुकदमा, अभियोजन या कोई अन्य कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती है।