दीया जलाने के पीछे का मनोविज्ञान

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जनता से दीया जलाने की अपील पर अलग अलग लोगों की अलग अलग राय है, पर ज्यादातर लोग प्रधानमंत्री के साथ खड़े हुए और पुरे हिंदुस्तान को जगमग कर दिया | सब ने दीये जलाकर ये दिखाया कि हम सब एक साथ हैं |

दरअसल, 21 दिन का लॉकडाउन जो सरकार को अचानक से लगाना पड़ा, उससे हमारे समाज में एक तरह की निराशा घर करने लगी थी। लोग ऐसी किसी स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। इसलिए सबका मनोबल बनाए रखने के लिए थाली बजाना-ताली बजाना और दीया जलाने जैसी ऐक्टिविटीज जरूरी हैं… यह कहना है मैक्स हॉस्पिटल के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार का…

क्यों जरूरी है सबके साथ होने का अहसास?
सायकाइट्रिस्ट का कहना है कि जब भी देश और दुनिया पर इस तरह की कोई आपदा आती है तो इकॉनमी लॉस, ह्यूमन लॉस जैसी चीजों पर तो सभी का ध्यान जाता है लेकिन इमोशनल लॉस को कोई नहीं देखता। ऐसे में जो लोग परेशानियों को झेल रहे हैं, वे अकेलेपन में ही रह जाते हैं…। लंबे समय तक अगर यही स्थिति रहे तो ये लोग मानसिक रूप से बीमार बन सकते हैं।

ये ऐक्टिविटीज इस तरह हैं मददगार

लॉकडाउन के दौरान भी लोग घरों में बंद हैं और टीवी के साथ ही अलग-अलग माध्यमों से उन तक लगातार कोरोना महामारी, डेथ रेट और संक्रमण की खबरें पहुंच रही हैं। साथ ही लोग अपने व्यक्तिगत कामों के अटकने और आर्थिक स्थिति को लेकर भी असमंजस में हैं कि पता नहीं कल भी हालात कैसे होंगे… इस तरह के मनोभावों को सकारात्मकता देने में मास ऐक्टिविटीज काफी अच्छा काम करती हैं।

आप किन बदलावों की अपेक्षा करते हैं?

देखिए, जब ताली और थाली बजाने की ऐक्टिविटी कराई गई थी तो अचानक से अकल्पनीय स्थितियों में फंसे लोगों में एक अलग उत्साह का संचार हुआ। ज्यादातर लोगों ने घर की बालकनी में खड़े होकर लंबे वक्त बाद अपने आस-पड़ोस को देखा। इससे नकारात्मक विचारों से घिरते हुए समाज को एक मानसिक सहयोग मिला कि इन परिस्थियों में हम सभी एक-दूसरे के साथ हैं। तो अकेलेपन का भाव दूर हुआ।

भावनात्मक मजबूती का प्रयास

हमें इस बात को समझने का प्रयास करना होगा कि हमारी लीडरशिप ने हमारे समाज की ऐसी कौन-सी दिक्कत को भांप लिया है कि वे हमें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने की कोशिश में जुटे हैं। दरअसल, सोशल डिस्टेंसिंग के चलते कहीं इमोशनल डिस्टेंसिंग ना हो जाए। लोग एंग्जाइटी, लोनलीनेस और आर्थिक नुकसान के चलते डिप्रेशन में ना आ जाएं, इसलिए यह लोगों को भावनात्मक मजबूती देने के प्रयास हैं।

सिक्यॉरिटी की फीलिंग को बढ़ाना

इस बात को भांपते कि लोगों के अंदर निराशा, बोरडम, चिंता, साथ ही एक-दूसरे के साथ ना मिलना पाना, पास ना होना जैसी गतिविधियों से लोगों में सिक्यॉरिटी की भावना कम होती जा रही है। जबकि हमारा भारतीय समाज एक-दूसरे की परेशानी में साथ खड़े होनेवाला और मदद करनेवाली मानसिकता रखता है। जबकि आज की स्थितियों में लोग एक अलग-सी लाचारी महसूस कर रहे हैं। इस लाचारी को हावी ना होने देना बहुत जरूरी है।

एक नए जोश का संचार

अब लोगों के अंदर इस तरह के विचार आने लगे हैं कि पता नहीं कल क्या होगा, जिंदा रहेंगे भी या नहीं रहेंगे। लगातार नकारात्मक खबरें आ रही हैं। लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि अगर राजपरिवारों (लंदन के प्रिंस) के लोग भी इस बीमारी के संक्रमण से नहीं बच पा रहे हैं तो हम सामान्य लोग कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? अगर इस तरह का डर किसी समाज के मन पर हावी हो जाए तो यह बहुत अधिक घातक हो सकता है। इससे बचाने की दिशा में ये कोशिश है।