प्रणव दा: देश की सियासत के भीष्म पितामह

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प्रणव दा को आपने कभी एक पिता के रूप में तो कभी कांग्रेस पार्टी के संकटमोचक के रूप में, तो कभी माँ काली के भक्त के रूप में तो कभी भारत माता के एक ऐसे लाल के रूप में देखा होगा। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने केंद्रीय मंत्री और विपक्षी नेता के साथ-साथ राष्ट्रपति के रूप में जिस लगन और निष्ठा से कार्य किया, वह नई पीढ़ी के नेताओं के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है।

संकटमोचक प्रणब दा

प्रणब दा वो नाम है जो भारतीय राजनीति में एक ऐसा सितारा था, जो हमेशा झिलमिलाता रहेगा। राजनीतिक अनुभव और कौशल का ही परिणाम था कि उन्हें एक से अधिक बार प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त माना गया। यह अलग बात है, कि वह कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सके, लेकिन जब वह राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए तो उन्होंने न केवल अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी, बल्कि इस पद की गरिमा भी बढ़ाई। दादा केवल राष्ट्रपति ही नही बने बल्कि उन्हे देश के सबसे बड़े खिताब ‘भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। वह राजनीतिक मूल्यों-मान्यताओं के हिसाब से काम करने वाले राजनेता के साथ एक ऐसी शख्सियत के तौर पर भी जाने जाते रहे, जो संसदीय ज्ञान से भरे हुए थे। वह त्वरित और साहसिक फैसले लेने के लिए भी जाने जाते थे और विषम परिस्थितियों का साहस के साथ सामना करने के लिए भी। प्रणब दा की एक और खासियत उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति थी। वह राजनीति और शासन के परंपरागत तौर-तरीकों के पालन के प्रति जितने प्रतिबद्ध थे, सहमति की राजनीति को संबल देने के प्रति उतने ही उदार भी थे। इस उदारभाव के बावजूद उनकी छवि एक सख्त प्रशासक की थी।

कई ऐतिहासिक फैसलों के बने गवाह

बहुत कम ऐसे नेता होते है जो इतिहास बनाते है या फिर बनते हुए देखते है प्रणब दा कुछ ऐसे ही नेता थे जो इतिहास लिख भी रहे थे और उसके गवाह भी बन रहे थे फिर वो आपातकाल का वक्त हो या फिर बंगलादेश का जन्म हो, आर्थिक उदारीकरण का दौर हो या फिर नये भारत की कल्पना का मूर्तिरूप लेता भारत क्यो न हो। GST से लेकर धारा 370 हटने तक के फैसले को उन्होने जिया है। 84 साल की उम्र में भी वो देश की प्रगति के लिए हमेशा कुछ न कुछ राय देते रहते थे और वो एक पार्टी के न होकर समूचे देश के विकास के लिए विचार रखते थे। खुद पीएम मोदी जी उनके बारे में कहते है कि जब वो दिल्ली आये तो वो इस शहर में बिलकुल नये थे उस वक्त प्रणब दा एक पिता की तरह उनका साथ दिया। इसके साथ साथ दशकों से उनका राजनीतिक जीवन दिल्ली में केंद्रित होकर रह गया था, लेकिन उनके दिल में बंगाल बसता था और इसी कारण वह दुर्गा पूजा के अवसर पर बंगाल स्थित अपने गांव अवश्य जाते थे और पांच दिन न किसी राजनेता के रूप में दिखते थे केवल अपने गांव के एक नागरिक की तरह माँ दुर्गा की आराधना करते थे। उनका ये रूप भी देखने वाला होता था।

 

प्रणब दा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी, कि उनकी राजनीतिक विरासत का स्मरण करते हुए उन राजनीतिक तौर-तरीकों को बल देने पर विचार हो, जिससे हमारे देश की राजनीति और अधिक मजबूत हो सके और जिस मजबूत भारत का सपना वो देखते थे वो पूरा हो


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