चीन जंग में उजड़े गांव बसाने के लिए पीएमओ ने कसी कमर: उत्तराखंड के दो गांवों शुरू होगा काम

एक तरफ भारत जहां दुनिया में खोई अपनी विरासत को वापस देश ला रही है तो अब 1962 भारत चीन जंग के वक्त उजड़े गांव फिर से बसाने जा रही है। इसकी शुरूआत उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की गंगा घाटी के दो गांव नेलांग और जादूंग से होने जा रही है। ये दोनो गांव करीब 60 साल से वीरान पड़े थे। यहां के लोग निचले इलाके में शरणार्थी का जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं। ये दो गांवों फिर से आबाद हो सकेंगे। प्रधानमंत्री दफ्तर की ओर से हस्तक्षेप करने के बाद इसकी पहल हुई है। शनिवार को राज्य के मुख्य सचिव ने उत्तरकाशी के सीमांत इलाके का दौरा कर स्थानीय अधिकारियों के साथ इन गांवों से पलायन कर चुके लोगों को फिर से बसाने की योजना की समीक्षा की और जल्द से जल्द लोगों को उनके गांव में बसाने के लिए कार्यक्रम बनाने के निर्देश दिए हैं।

1962 की जंग में उजड़ा गांव फिर होगा आपाद

उत्तराखंड के उत्तरकाशी के गांव नेलांग और जादूंग जो 1962 की जंग के पूरी तरह से तबाह हो गये थे वो फिर से बसने जा रहे है। इन गांवों के निवासियों की ओर से पीएम नरेंद्र मोदी को इसी साल जनवरी माह में फिर से गांव में बसाने की मांग को लेकर पत्र लिखा गया था। पीएम दफ्तर ने राज्य के मुख्य सचिव को इस पर कार्यवाही करने के निर्देश दिए थे। जिसके बाद उत्तरकाशी के जिला प्रशासन की ओर से पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सेना, भारत तिब्बत सीमा पुलिस और वन अधिकारियों के साथ मिलकर इन गांवों के लोगों को फिर से बसाने की मांग को लेकर कार्ययोजना तैयार की गई है और जल्द ही इसे बसाने का काम शुरू कर दिया जायेगा। राज्य सरकार की माने तो नेलांग गांव को बसाने की रूपरेखा तैयार कर ली गई है तो जादूंग गांव के लिए अप्रैल में काम शुरू कर दिया जायेगा।

युद्ध से पहले समृद्ध गांवों में सुमार था यह इलाका

1962 से पहले नेलांग में लगभग चालीस परिवार रहा करते थे और जादूंग में भी लगभग 30 परिवार रहते थे। जिनका मुख्य व्यवसाय भेड़पालन और खेती था। चीन के साथ हुए युद्व के बाद सुरक्षा की दृष्टि से भारतीय सेना ने यहां से लोगों को हटा दिया था। नेलांग और जादूंग गांव दोनों को खाली करा दिया गया था। यहां से पलायन कर चुके लोगों ने तब बगोरी और डुंडा गांव में शरण ली थी। लगभग साठ साल से इन दोनों गांवों के लोग अपने गांव में लौटने से वंचित हो गए थे। नेलांग और जादूंग दोनों गांवों में लोगों की पैतृक संपति है। मकान तो अब देखरेख के अभाव में खण्डहर हो चुके हैं लेकिन खेती की जमीन दोनों गांवों में है।

एक जमाना था जब कुछ लोग देश की जमीन को बंजर बोलकर छोड़ दिया करते थे और एक आज का वक्त है जो देश की इंच इंच जमीन को अपना मानकर उसका0 विकास करने के लिये लगे रहते है।