पीएम मोदी के जन्मदिन पर: उनकी दिल को छू लेने वाली कविताएं

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को हमेशा हम एक सख्त प्रशासक के तौर पर देखते है। लेकिन लेकिन पीएम मोदी की इस छवी के पीछे छुपे कवि को बहुत कम लोग ही जानते है चलिये उनके जन्मदिन के मौके मे हम आपको उनकी इसी छवी से आपको रूबरू करवाते है। वैसे तो पीएम द्वारा लिखी गई अनगिनत कविताएं है जो उनके कोमल हद्य को बतलाती है लेकिन उनमे से कुछ खास कविताएं हम आपको बताते है।

 

कहते है कि कविताएं दिल की संवेदनाओं से निकलती है और मन की गहराइयों को प्रगट भी करती है। ऐसे में हमारे दौर के सर्वाधिक लोकप्रिय और चर्चित व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझने के लिए उनकी लिखी कविताओं से बेहतर और क्या हो सकता है. और इन कविताओं को पढ़ने के लिए उनके जन्मदिन से बेहतर दिन और कौन सा हो सकता हैवैसे ये कविताएं मूल रूप से गुजराती में लिखी गईं हैं। लेकिन उनका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत हैं।

अगर पीएम मोदी की कविताओं को पढ़े तो उनकी कविताएं रहस्यवादी ज्यादा होती है साथ ही साथ उसमें वैराग्य की झलक भी देखने को मिलती है। इन कविताओं को पढ़कर एक पल ऐसा लगता है कि वो सारे संसार को मुट्ठी में कर लेने का साहस और इरादा रखते हैं और कविता की अगली ही पंक्ति परम वीतरागी सन्यासी की होती है। उनको सबकुछ चाहिए, लेकिन किसी भी चीज से उन्हें मोह नहीं। यही उनकी कविता की खूबसूरती है।आइए उनकी कुछ चुनिंदा कविताओं के मर्म को समझे

  1. जलते गए, जलाते गए’

यह कविता पीएम मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार के लिए लिखी थी और मूल रूप से उनकी पुस्तक ज्योतिपुंज में प्रकाशित हुई थी.।

आंधियों के बीच

जल चुके

कभी

बुझ चुके कुछ दीप थे.

 

और भी कुछ दीप थे

तिमिर से लोहा लिए थे

बहाते-बहाते

प्रकाश

यों तो अंधकार में समा गए थे,

पर एक दीप

जो आप थे

जलते गए,

जलाते-जलाते.

 

आंधी आए

तिमिर छाए

फिर भी जले,

जलाते-जलाते.

अंधकार से जूझता था

संकल्प जो उर में भरा था

सूरज आने तक जलना था

बस, जलते गए,

जलाते-जलाते.

जो जले थे

जो जले हैं

जो जल रहे हैं

बन किरण फहरा रहे हैं

रोशनी बरसा रहे हैं

तभी तो

सिद्धियों का सूरज निकल पड़ा है

चहुंओर रोशनी-ही-रोशनी

समाया वह दीप जो.

02वसंत का आगमन

पीएम मोदी की एक अन्य कविता है वसंत का आगमन. इसमें उन्होंने जीवन को बदलते मौसम-चक्र के रूप को बताया है।

अंत में आरंभ है, आरंभ में है अंत,
हिय में पतझर के कूजता वसंत.
सोलह बरस की वय, कहीं कोयल की लय, 
किस पर है उछल रहा पलाश का प्रणय?
लगता हो रंक भले, भीतर श्रीमंत
हिय में पतझर के कूजता वसंत.

किसकी शादी है, आज यहाँ बन में? 
खिल रहे, रस-रंग वृक्षों के तन में
देने को आशीष आते हैं संत,
हिय में पतझर के कूजता वसंत

03 पतंग

प्रधानमंत्री मोदी को यह कविता बेहद पसंद है वो इसे एक बार मकर संक्रांति के अवसर पर ट्वीट करके शेयर भी कर चुके हैं।

पतंग…

मेरे लिए उर्ध्यगति का उत्सव,

मेरा सूर्य की ओर प्रयाण.

पतंग…

मेरे जन्म-जन्मांतर का वैभव,

मेरी डोर मेरे हाथ में

पदचिन्ह पृथ्वी पर,

आकाश में,

विहंगम दृश्य ऐसा.

मेरी पतंग…

अनेक पतंगों के बीच,

मेरी पतंग उलझती नहीं,

वृक्षों की डालियों में फंसती नहीं.

पतंग…

मानो मेरा गायत्री मंत्र,

धनवान हो या रंक,

सभी को,

कटी पतंग एकत्र करने का आनंद होता है,

बहुत ही अनोखा आनंद.

कटी पतंग के पास,

आकाश का अनुभव है,

हवा की गति और दिशा का ज्ञान है.

स्वयं एक बार ऊंचाई तक गई है,

वहां कुछ क्षण रुकी है,

इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है.

पतंग…

मेरा सूर्य की ओर प्रयाण,

पतंग का जीवन उसकी डोर में है.

पतंग का आराध्य (शिव) व्योम (आकाश) में है,

पतंग की डोर मेरे हाथ में है,

मेरी डोर शिव जी के हाथ में है.

जीवन रूपी पतंग के लिए

शिव जी हिमालय में बैठे हैं.

पतंग (जीवन) के सपने

मानव से ऊंचे.

पतंग उड़ती है, शिव जी के आसपास,

मनुष्य जीवन में बैठा-बैठा,

उसको (डोर) सुलझाने में लगा रहता है.

04सनातन मौसम

ये कविता पीएम मोदी के कविता संग्रह ‘आंख आ धन्य छे’ से ली गई है. इस कविता संग्रह में उन्होंने अपने जीवन-दर्शन और जयवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

अभी तो मुझे आश्चर्य होता है

कि कहाँ से फूटता है यह शब्दों का झरना

कभी अन्याय के सामने

मेरी आवाज की आँख ऊँची होती है

तो कभी शब्दों की शांत नदी

शांति से बहती है।

इतने सारे शब्दों के बीच

मैं बचाता हूँ अपना एकांत

तथा मौन के गर्भ में प्रवेश कर

लेता हूँ आनंद किसी सनातन मौसम का

 

Originally published at ZEE news