25 साल से लटकी रेल परियोजनाओं को पूरा कर रहे हैं पीएम मोदी

पीएम मोदी ने दिलाई रफ्तार

सरकार की विभिन्न परियोजनाओं की समीक्षा के लिए मोदी सरकार ने हाल ही में विशेष बैठक बुलाई थी। इस समीक्षा बैठक का नाम ‘प्रगति’ था। प्रगति के पिछले 31 संवादों (बैठकों) के दौरान प्रधानमंत्री ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली परियोजनाओं की समीक्षा की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब हाल ही में प्रशासन और विभिन्न परियोजनाओं की समीक्षा के लिए ‘प्रगति’ बैठक की अध्यक्षता की तो एक प्रॉजेक्ट के स्टेटस रिपोर्ट से बेहद खुश दिखे। यह प्रॉजेक्ट है ओडिशा का चर्चित खुर्दा-बलांगीर रेलवे ट्रैक। 289 किलोमीटर की खुर्दा-बलांगीर रेलवे लाइन 1995 से ही लटका हुआ था। महज 289 किलोमीटर की दूरी जो पूर्वी भारत की तरक्की का गेटवे खोलने के लिए शुरू की गयी थी, केंद्र में पांच सरकारें बदलने के बावजूद धरातल पर आने की बाट जोह रहा था। रेलवे ने इस परियोजना की घोषणा 1995 में की थी। जिस पर पीएम मोदी की नजर साल 2015 में पड़ी, जिसके बाद इस प्रॉजेक्ट को एक नई रफ्तार दी गई। 

ओडिशा का यह इलाका सबसे पिछड़े और गरीब इलाकों में शुमार है। प्रशासनिक ढील की वजह से यह प्रॉजेक्ट बेहद सुस्त ढंग से चल रहा था। साल 2015 में पीएम मोदी की नजर इस रेलवे प्रॉजेक्ट पर पड़ी और इसकी स्टेटस रिपोर्ट से उस वक्त वह बेहद नाराज दिखे। अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए मोदी ने उस वक्त पीएमओ के अधिकारियों से कहा था, ‘यह इलाका सबसे गरीब और जरूरतमंदों का घर है, जो बाकी इलाकों से पिछड़े हैं और सरकारी मदद की उन्हें बेहद जरूरत है। हमलोग इस कोशिश में नाकाम साबित हुए हैं।’

प्रॉजेक्ट के स्टेटस रिपोर्ट से संतुष्ट दिखे पीएम

पीएम ने कहा था, ‘इस प्रॉजेक्ट को प्राथमिकता देने की जरूरत है। यदि साल 2000 तक काम खत्म हो गया होता प्रॉजेक्ट की कीमत भी कम होती और पूर्वोत्तर भारत के लोगों को इसका फायदा भी मिलता।’

बुधवार को जब रेलवे मिनिस्ट्री ने इस प्रॉजेक्ट का स्टेटस रिपोर्ट शेयर किया तो पीएम मोदी संतुष्ट दिखे। सूत्रों ने कहा कि स्टेटस रिपोर्ट में बताया गया कि रेलवे ट्रैक का काम सही रफ्तार से चल रहा है और तय वक्त में यह जरूर खत्म हो जाएगा।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार जबसे बनी है, कांग्रेस द्वारा अटकाई गईं परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस सरकारों में लटके पड़े प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहे हैं।

क्या है ‘प्रगति’ प्लैटफॉर्म

गौरतलब है की प्रधानमंत्री मोदी ने 25 मार्च, 2015 को बहुउद्देश्यीय और बहुविषयक शासन मंच ‘प्रगति’ की शुरूआत की थी। ‘प्रगति’ एकीकृत संवाद मंच है, जिसका उद्देश्य जन-साधारण की शिकायतों का समाधान करना है। ‘प्रगति’ के जरिए भारत सरकार के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और परियोजनाओं तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा शुरू की जाने वाली परियोजनाओं की निगरानी और समीक्षा में मदद मिलती है।

आइए एक नजर डालते हैं ऐसी परियोजनाओं पर, जो कांग्रेस राज में वर्षों से अटकी पड़ी थीं, और मोदी राज में उन पर तेजी से काम हो रहा है।

एनसीआर पूर्वी और पश्चिमी परिधीय एक्सप्रेस वे

135 किलोमीटर लंबे पूर्वी पेरिफेरल एक्सप्रेस वे या केजीपी एक्सप्रेस वे को दो साल की अवधि में पूरा किया गया है, जिसकी लागत 5,853 करोड़ रुपये है। इसी तरह, वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस वे को केएमपी एक्सप्रेस वे के रूप में भी जाना जाता है जिसका उद्घाटन 9 साल की देरी के बाद नवंबर 2018 में हुआ था।

बोगीबील ब्रिज

बोगीबील ब्रिज, भारत का सबसे लंबा रेलमार्ग है, जिसकी लगभग 120 वर्षों की सेवा अवधि 2018 में पूरी हुई थी। यह पुल 1997 में स्वीकृत हुआ था और 21 वर्ष से अधिक की देरी के बाद पूरा हुआ। यह पुल पीएम मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप है कि पूर्वोत्तर न्यू इंडिया का प्रवेश द्वार होगा।

बीदर कलबुर्गी रेलवे लाइन

110 किलोमीटर लंबी बीदर कलबुर्गी रेलवे लाइन का उद्घाटन अक्टूबर 2017 में पीएम मोदी ने किया था। इस परियोजना की आधारशिला वर्ष 2000 में रखी गई थी और लगभग 17 वर्षों की देरी के बाद इसे पूरा किया गया था। इस रेलवे लाइन के उद्घाटन के साथ, बेंगलुरु और नई दिल्ली के बीच यात्रा का समय लगभग 380 किलोमीटर और 6-8 घंटे कम हो गया है।

भूपेन हजारिका पुल

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने अगस्त, 2003 में ‘ढोला-सदिया पुल’ जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने भूपेन हजारिका पुल का नाम दिया है, के निर्माण के लिए फिजिबलिटी स्टडी करने का आदेश दिया था। उनकी सरकार 2004 में चली गई तो यह योजना भी लटक गई। छह साल बाद इसे मनमोहन सिंह कैबिनेट ने जनवरी, 2009 में सैद्धांतिक मंजूरी दी थी। ये पुल अरुणाचल प्रदेश सड़क-परिहवन पैकेज के तहत घोषित 4 बड़ी परियोजनाओं में एक था, लेकिन इसमें देरी होती चली गई। दो साल बाद 2011 में पुल बनाने का काम शुरू हुआ और इसे दिसंबर, 2015 में पूरा हो जाना था, लेकिन कांग्रेस की कार्यशैली के कारण ये पूरा नहीं हो सका। मंजूरी के वक्त 9.15 किलोमीटर लंबे इस पुल पर आने वाले कुल खर्च का अनुमान 876 करोड़ था जबकि पूरा होते-होते इस पर कुल 2056 करोड़ रुपए खर्च हो गए।