पद्म पुरस्कार: मोदी राज में गुमनाम नायकों को सम्मान

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एक समय था जब ज्यादातर नामचीन लोगों के हिस्से में ये पुरस्कार आते थे, लेकिन अब अपने काम से अलग पहचान बनाने वाले आम लोगों को पद्म पुरस्कार मिल रहे हैं। इस वर्ष के पद्म पुरस्कार, देश के उन अनजान विभूतियों को समर्पित हैं जिन्होंने समाज के उत्थान में अनुकरणीय योगदान दिया है।’ वे बड़े नाम नहीं हैं। उनके पास बड़ी जमा-पूंजी भी नहीं है। उनका हौसला और सोच वाकई बड़ी है। हम बात कर रहे हैं उन गुमनाम नायकों की, जो चकाचौंध से दूर रहकर चुपचाप दूसरी की जिंदगियां रोशन कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ लोगों की दास्तां आपके साथ साझा कर रहे हैं…

1. जगदीश लाल अहूजा (लंगर बाबा)

पीजीआइ चंडीगढ़ के सामने बीते 38 वर्षों से गरीब और भूखे लोगों के लिए रोटी का इंतजाम करने वाले जगदीश आहूजा को देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री अवॉर्ड के लिए चुना गया है। जिस समय अवॉर्ड की लिस्ट जारी हुई उस समय भी आहूजा लंगर लगाने में जुटे हुए थे। 85 साल के आहूजा लंगर बाबा के नाम से विख्यात हैं। जिंदगी की सारी कमाई इन्होंने गरीब लोगों को खाना खिलाने में लगा दी। हालात ऐसे भी आए कि उन्हें लंगर जारी रखने के लिए करोड़ों की संपत्ति, यहां तक कि पत्नी के नाम जमीन भी बेचनी पड़ी। पद्मश्री मिलने के बाद आश्चर्य से उनकी जुबां से एक ही वाक्य निकला …अरे एक रेहड़ी चलाने वाले को इतना बड़ा सम्मान दे दिया…।

2. अब्दुल जब्बार

देश की सबसे भयानक विभीषिकाओं में से एक थी 1984 की भोपाल गैस त्रासदी। इस दर्दनाक हादसे ने जहां कइयों की जान ले ली थी, वहीं कुछ ऐसे भी थे जो बाकी बची जिंदगियों से उस बुरी याद के निशान मिटाने की कोशिश कर रहे थे। उन्हीं में से एक थे सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल जब्बार जिन्हें मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से नावाजा गया। अब्दुल जब्बार ने भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई पूरे 35 साल तक लड़ी। इस दौरान उन्होंने ना सिर्फ अपनी जान गवाई बल्कि उनसे पहले उनके परिवार के कई सदस्य उस त्रासदी की भेंट चढ़ गए लेकिन कानूनी से लेकर सामाजिक – हर तौर पर भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई ने उन्होंने आखिरी दम तक जारी रखी। बीते साल 14 नवंबर को लंबी बीमारी के बाद उनकी मौत हो गई। दुनिया की सबसे भयानक औद्योगिक आपदा कही जाने वाली उस घटना में जब्बार की 50 प्रतिशत आंखों की रोशनी चली गई थी और उन्हें लंग फाइब्रोसिस हो गया था।

3. मोहम्मद शरीफ (शरीफ चाचा)

मोहम्मद शरीफ अयोध्या में अचानक चर्चा का केंद्र बन गए हैं। उन्हें हमेशा से प्यार और सम्मान मिलता रहा है और उन्हें प्यार से लोग ‘शरीफ चाचा’ के नाम से बुलाते हैं। लेकिन शनिवार को हुई पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा ने रातोंरात उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ा दी है। शरीफ चाचा कई वर्षो से अयोध्या में लावारिश लाशों को दफनाते या दाह-संस्कार करते रहे हैं। उन्होंने अब तक 25,000 से ज्यादा शवों को दफनाया/दाह संस्कार किया है।

पेशे से साइकिल मिस्त्री मोहम्मद शरीफ हर रोज लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए कब्रिस्तान और श्मशान का चक्कर लगाया करते हैं। शरीफ कहते हैं कि उन्हें कई बार आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा, लेकिन चंदा जुटाकर या दान में मिले पैसों से यह पुनीत काम करना जारी रखा।

4. भजन गायक रमजान खान (मुन्ना मास्टर)

पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुने गए भजन गायक रमजान खान ने इसका श्रेय ‘गौ-सेवा’ को दिया है। वह पिछले 15 साल से अपने गाँव में ‘गौ सेवा’ कर रहे हैं। क्षेत्र में रमजान खान को मुन्ना मास्टर के नाम से जाना जाता है। रमजान खान पिछले साल नवंबर में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत संकाय में अपने बेटे फिरोज खान की सहायक प्रोफेसर पद पर नियुक्ति से उपजे विवाद और कृष्ण-भक्ति तथा गौ सेवा के प्रति समर्पण के कारण सुर्खियों में आए थे।

रमजान खान ने पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद कहा, ‘‘मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना जाएगा। मैं पिछले 15-16 वर्ष से गौशाला में ‘गौ सेवा’ करने में अधिकांश समय बिताता हूं है और मेरा मानना है कि यह पुरस्कार ‘गौ-सेवा’ का ही परिणाम है।’’

संस्कृत भाषा में ‘शास्त्री’ की उपाधि पा चुके खान भजनों की रचना करते हैं और उन्हें गाते हैं। वह गौशाला में ‘गौ सेवा’ करते हैं और मस्जिदों में प्राय: नमाज अदा करते हैं।

बता दे की 71 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सरकार ने वर्ष 2020 के लिए पद्म पुरस्कारों का ऐलान कर दिया है। इस साल राष्ट्रपति ने 141 पद्म पुरस्कारों का अनुमोदन किया है। पुरस्कार पाने वालों में 34 महिलाएं और 18 विदेशी भी शामिल हैं। 12 लोगों को मरणोपरांत ये पुरस्कार दिये गये हैं। इनमें जाने-माने लोगों के अलावा ऐसे लोग भी शामिल हैं जो आम आदमी होते हुए भी अपने काम से खास हो गए हैं।

गौरतलब है की नरेंद्र मोदी सरकार शुरू से ही समाज के उन लोगों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करती रही है, जो आम होते हुए भी दूसरों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। वो आम लोगों की तरह ही रहते हैं और प्रचार से भी उनका कुछ लेना देना नहीं है। जबकि, कुछ समय पहले तक पद्म पुरस्कारों पर समाज के कुलीन लोगों का ही दबदबा रहता था।

पद्म पुरस्कारों के बारे में जान लें ये बातें :

– इस बार 141 लोगों को पद्म सम्मान दिए गए हैं।

– पीएम की अगुवाई में बनी एक कमिटी पुरस्कार पाने वालों के नामों को अंतिम रूप देती है। आखिर में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति लिस्ट को मंजूरी देते हैं

– सम्मान पाने वाले को एक प्रमाण पत्र दिया जाता है। साथ ही मेडल का रिप्लिका भी जिसे सम्मान पाने वाला पहन सकता है। लेकिन पद्म सम्मान को कोई अपने नाम के आगे-पीछे नहीं जोड़ सकता। न ही लेटर हेड या दूसरे कागजों में इसका इस्तेमाल कर सकता है। ऐसा करना गैरकानूनी है।

– सम्मान पाने वाले को किसी तरह की कोई सरकारी सुविधा या रकम नहीं मिलती।

-1954 से हर साल दिए जाते हैं ये पुरस्कार। बीच में 1977, 78 और 1993 से 97 के बीच नहीं दिए गए पुरस्कार।

– सामान्यता यह सम्मान मरणोपरांत नहीं दिया जाता। हालांकि विशेष परिस्थितियों में सरकार ऐसा कर सकती है।

 


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