बनारस के रस में अब मोदी रस भी घुला

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बनारस वो शहर जिसमे हर रस घुला हुआ है। यहां सुबह उठो तो मंदिर में डबरू की डम डम तो मजिस्द की अजान, गुरूद्वारा की अरदास और चर्ज की दुआं का रस सुर्य की हर किरण के साथ महसूस किया जा सकता है, जो भक्ति रस का परिचायक है| दिन चढ़ते ही गली मौहल्लों में ज्ञान का रस मिलने लगता है जिसमे हास्य रस का स्वाद जलेबी और दही के साथ होता है जो सोने पर सुहागा होता है। शाम होते होते बनारस मे दुकानों में हाथो से सजी साड़ियाँ श्रृंगार रस का भाव प्रगट करती है तो शाम के वक्त बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई की धुन अपने आप संगीत रस में मंत्रमुग्द कर देती है।

लेकिन इतने रंगों से सजे बाबा विश्वनाथ की नगरी मे अब दिख रहा है और वो रंग है मोदी नाम का| जी हाँ, जिस तरह से बनारिसयों ने मोदी को अपना माना है और उनके सम्मान में और उनके साथ खड़े होने की होड़ में जन सैलाब बनारस की करीब 7 किलो मीटर लबे रोड शो में देखा गया है वो सियासत के जानकारों के लिये भी परे है।

बनारसियों ने मोदी का किया भव्य स्वागत

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क्या बच्चा,क्या युवा, क्या बुजुर्ग, या फिर हो महिलएं सभी अपने सांसद मोदी को निहारने के लिये सड़को पर उतर आये, ये सच में शोध का विषय है| यूँ तो मोदी के चाहने वाले देश विदेश मे बहुत है लेकिन जिस तरह की चाह बनारसियों मे देखी गई उसे देख कर रामायण का वो वक्त याद आने लगा जब राम जी सीता जी के साथ 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या पहुंचे थे, ठीक उसे तर्ज पर मोदी का स्वागत किया गया हो।

घरो की छत से फूल की बारिश हो रही थी तो सड़को पर मै भी चौकीदार की टी शर्ट पहने लोग ये बताने मे लगे थे कि मोदी ही नही समूची काशी चौकीदार है जो देश की सुरक्षा के लिये मोदी जी का हाथ मजबूत करेगे। माँ गंगा के लाल मोदी का स्वागत शहर के हर धर्म जाति के लोग बढ़चढ़ के कर रहे थे और उन लोगों को नसीहत दे रहे थे जो देश मे जाति धर्म की सियासत करते है।

धर्म जाति को मुंह चिड़ाती बनारसियों की भीड़

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चलते चलते इस मोदी मय बनारस या काशी के बारे मे क्या लिखूँ खुद समझ मे नही आ रहा है। बस इस चौपाई के साथ मै इस मोदी रस का समापन करना चाहूगा और ये कहूगा कि इस तरह का स्वागत शायद ही भविष्य किसी नेता का देखा जा सके|

कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥

बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई॥

नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥

जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥

कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना॥

करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥

पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥


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