वक्त की मांग है नया कृषि कानून

कृषि सेक्टर में सुधार के लिए मोदी सरकार के नए कानूनों का किसानों के एक वर्ग द्वारा तीखा विरोध जारी है। इन किसानों के मन में शंका है कि नए कृषि कानूनों से उनकी आमदनी खतरे में पड़ सकती है। यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भरोसा दिला चुके हैं कि न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी व्यवस्था समाप्त होने जा रही है और न ही मंडी व्यवस्था।

पल भर में किसानों की उपज का मनमाने दामों पर हो जाता है सौदा

कृषि उत्पादन एवं विपणन समिति यानी एपीएमसी से जुड़े कानून में संशोधन भी समय की मांग है। आप देश की किसी भी मंडी में जाकर देख सकते हैं कि कैसे पल भर में किसानों की उपज का मनमाने दामों पर सौदा हो जाता है। इससे कमीशन एजेंटों को तो बढ़िया फायदा मिल जाता है, लेकिन किसान अपेक्षित लाभ से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में एपीएमसी कानून में सुधार से किसानों के लिए आवश्यक विकल्पों का बढ़ना तय है और इससे खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। इसी तरह अनुबंध खेती से जुड़े कानून भी किसानों को राहत पहुंचाएंगे। अमूमन किसान पिछली फसल के दाम देखकर ही अगली फसल की तैयारी करते हैं, लेकिन अनुबंध कृषि के जरिये वे भविष्य की फसल की कम से कम जोखिम के साथ बेहतर योजना बना सकते हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि किसानों को फसल उगाने से अधिक उसे बेचने में कहीं ज्यादा मुश्किल होती है। ये कानून काफी हद तक इस समस्या का समाधान करने में सक्षम हैं। इसी तरह आपूर्ति शृंखला बेहतर होने से उपभोक्ताओं का भी भला होगा। ये तीनों कानून यदि उचित रूप से लागू हुए तो इनमें भारतीय कृषि और किसानों की कायापलट करने की पूरी क्षमता है।

 

सुधारों के लिए निजी निवेश होगा जरूरी

प्रदर्शनकारी किसान जिस एमएसपी को लेकर अड़े हैं, वह व्यवस्था भी 1965 के दौर में तब की गई थी, जब देश खाद्यान्न के मोर्चे पर खस्ताहाल था। आज स्थिति ऐसी है कि उत्पादित खाद्यान्न के भंडारण के लिए पर्याप्त स्थान का अभाव है। स्पष्ट है कि हम अतीत की नीतियों के जरिये नहीं चल सकते। ये कृषि सुधार इन्ही गड़बड़ियों को सुधारने के लिए गए हैं। इन सुधारों को मूर्त रूप देने के लिए निजी निवेश आवश्यक होगा। बाजार की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। कृषि सुधारों का विरोध करने वालों को यह भी समझना होगा कि मौजूदा व्यवस्था को रातोंरात नहीं बदला जा सकता। इस संक्रमण अवधि में वे निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों से मुकाबला करने के लिए अपनी क्षमताएं बेहतर कर सकते हैं। इससे होने वाली प्रतिस्पर्धा का लाभ उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को मिलेगा।

ऐसे में अब तो बस यही किसानों से बोलेंगे कि वो किसी के भ्रम में न आये और इस बिल के पायदे को ध्यान में रखकर अपना फैसला ले जिससे उनकी आमदनी भी बढ़े और देश भी तेजी के साथ आगे की ओर बढ़ सके।