इतिहास की अनदेखी पर सवाल तो बनता है?

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अपने बंगाल दौर पर एक फिर से पीएम मोदी ने देश के इतिहास को लिखने वाले लोगों पर सवाल खड़े किये।  पीएम मोदी ने अपने बयान में कहा कि देश का जो इतिहास बताया जाता है वो सही नही है। देश के सही इतिहास को लेकर अनदेखी करने का आरोप भी पीएम मोदी ने लगाया। चलिये जानते है, कि सही में जो इतिहास हमें बताया जा रहा है या फिर दिखाया जा रहा है, क्या वही इतिहास है या फिर सच में कुछ लोगों को खुश करने के लिए देश के इतिहास के साथ साथ छेड़छाड़ की गई है।

आजादी से पहले

चलिए सबसे पहले बात करते है 1947 के पहले की, जब देश गुलामी की जंजीरों जकड़ा हुआ था। ब्रिटिश हुकूमत चल रही थी। उस वक्त देखा जाये तो देश में मुगलकाल से जुड़ी जानकारियों को ज्यादा साझा किया जाता था। लेकिन हम ऐसा बिलकुल नही कह रहे है कि उस वक्त अशोक या हिन्दू शासन का इतिहास लोगों को बताया नही जाता था, लेकिन इसमें एक खामी ये जरूर देखने को मिली की ज्यादातर इतिहासकार मुगल काल के आसपास के राजाओं का इतिहास ही लिखते औऱ बताते रहे।

जिसका असर ये हुआ कि मुगल बादशाहों को किसी हीरो की तरह पेश किया गया, जबकि राजपूत शासकों को आपसी गद्दारी या फिर शाही शान शौकत के चलते पतन का दौर ही दिखाया गया। हमें ये जरूर समझाया गया कि औरंगजेब ने कैसे पिता को कैद करके सत्ता हासिल की। लेकिन हमें ये नही बताया गया कि भगवान राम ने कैसे पिता के आदेश के लिए राजपाठ त्याग कर वन की तरफ चले गये। जबकि हमारा सही इतिहास यही है, जहां पिता के आदेश को पूरा करने के लिये एक बेटा वन की ओर जाता है, त्याग हमारे देश का इतिहास है, जबकि छीनना उन लोगों का इतिहास है जो हमारे देश के थे ही नही। लेकिन अंग्रेजों ने देश में राज करने के लिये लोगों का दमन तो किया साथ ही साथ देश की गौरवशाली इतिहास को भी बदलकर पेश किया जिसका हजाना आज भी हम उठा रहे है।

आजादी के बाद

आजादी के बाद लगा कि देश का नया इतिहास गढ़ा जायेगा। जिसमें भारत की युगों पुरानी संस्कृति की झलक होगी। लेकिन कुछ मतलब परस्त इतिहासकारों ने अपने फायदे के लिये इतिहास को दर किनारे किये बस एक परिवार को ही देश का इतिहास बना दिया। आलम ये हुआ कि देश के गांव से लेकर बड़े बड़े शहरों के चौराहों तक सिर्फ एक ही परिवार का नाम अंकित होने लगा। बड़े कॉलेज हो, या नामी संस्थान या फिर अस्पताल हर तरफ सिर्फ एक ही परिवार की झलक दिखने लगी। यानी की इतिहास में सिर्फ एक ही परिवार का नाम गूंज रहा था और असल इतिहास देश की मिट्टी में दब रहा था।  मजे की बात ये हुई कि एकतरफ परिवार का इतिहास लिखा जा रहा था तो दूसरी तरफ परिवार जिसका नाम इतिहास में दर्ज करवाने को कहता था उसी को इतिहास में जगह मिलती थी। हालाकि इसका विरोध करने वाले इतिहासकार या तो खुद गुमनामी में को गये थे या कर दिये गये थे।   

लेकिन ऐसा क्यों?

आखिर क्यो हम नेता जी सुभाष बाबू को भूल गये, क्यो हम रामकृष्ण मिशन के ज्ञान को भूल गये? देश के युवाओं के बीच में हम स्वामी विवेकानंद जी की बातों को क्यो नही फैला पाये? राजाराममोहन राय हो या ईश्वर चंद्र विधासागर को क्यों वो स्थान नहीं दिला पाये जो उनको मिलना चाहिये? कुँवर सिंह हो या तानाजी, आला ऊदल ऐसे तमाम नाम क्यो इतिहास में आ नही पाये? । इसके साथ साथ अकबर, हो या मुमताज या फिर खिलजी वंश सबके पिता कौन थे, या कहा से आये थे सब जानते है। लेकिन महाराणा प्रताप हो या फिर शिवाजी, या फिर पृथ्वीराज चौहान के इतिहास को क्यों नही लिखा गया।

ये सवाल जो वाजिब है लेकिन इसका जवाब सिर्फ यही इशारा करता है कि देश में सिर्फ एक परिवार की बजाने के चलते ऐसा हुआ जो भी लिखा गया वो या तो उनके लिये लिखा गया या फिर उनसे पूछकर लिखा गया। तभी तो आज हम विलियम शेक्सपीयर को आदर के साथ देखते है जबकि देश के शेक्सपीयर कालीदास को पहचानते भी नही। ऐसे में पीएम का सवाल कई मायने में सही लगता है। वो आज देश के सही इतिहास को देश के सामने ला रहे है, इसके लिये वो देश के ब्रांड को रेनोवेट करने में लगे है। ऐसे में कुछ लोग उसका विरोध भी कर रहे है, लेकिन हकीकत यही है कि जो लोग देश बदलने की क्षमता रखते है, वो ऐसे विरोध से नही रुकते। हम तो यही कहेंगे, कि जो इतिहास बताने का बीड़ा पीएम मोदी ने उठाया है, उसको देखकर भारत के संस्कार की सही छवि उभर के विश्व के सामने आयेगी। 


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