तीन तलाक के बाद मस्जिदों में महिलाओं की नमाज़ पर विचार

साल 2014 से 2019 तक केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने बहुत से अहम फैसले किए है, चाहे वो तीन तलाक का मुद्दा हो या फिर लैंगिक समानता का| उच्चतम न्यायलय मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं को नमाज़ की इजाज़त देने की मांग करने वाली एक मुस्लिम दंपति की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की|

सर्वोच्च न्यायालय ने मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश और वहां नमाज पढ़ने की अनुमति देने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को नोटिस भी जारी किया है| इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग, सेंट्रल वक्फ काउंसिल और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को नोटिस जारी किया है| न्यायालय ने कहा कि देश की मस्जिदों में महिलाओं को प्रवेश देना गैर कानूनी और असंवैधानिक है| यह महिलाओं के अधिकारों का हनन है|

सोमवार को पुणे के मुस्लिम दंपति ने मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश इजाजत के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी| शीर्ष अदालत ने इस मामले पर मंगलवार यानी आज सुनवाई किए जाने की बात कही थी| अपनी दलील में दंपति ने कहा था कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का हनन है, साथ ही उन्होंने कहा कि “भारत के मूल विचार में मौलिक एकता” सहिष्णुता और यहां तक कि धर्म की समन्वयता भी है|

वर्तमान में महिलाओं को केवल जमात-ए-इस्लामी और मुजाहिद संप्रदायों के तहत प्रार्थना करने की अनुमति है| हालांकि, उन्हें मस्जिदों में प्रवेश करने से रोक दिया गया है जो मुख्य रूप से सुन्नी गुट से आते हैं|

वकील आशुतोष दूबे के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि विधायिका मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है| याचिका में यह दलील दी गई कि विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देना चाहिए| यह राज्य के लिए एक संवैधानिक जनादेश है, जो धार्मिक भाईचारे पर अंकुश लगाते हैं उनसे मुकाबला करे|

याचिका में यह दलील दी गई है कि ‘पिछले कुछ दशकों में माननीय न्यायालय की टिप्पणियों के बावजूद, यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड महज संवैधानिक लक्ष्य बना हुआ है, जिसे न्यायालयों ने निर्देशों के माध्यम से लागू करने से काफी हद तक रोक दिया है और विधानमंडल ने केवल इसका जिक्र कर इस मामले कि उपेक्षा की है|’ याचिका में पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव के लिए इस्लाम को दोषी ठहराया जाता है| ‘कुरान आदमी और औरत के बीच अंतर नहीं करता है| यह केवल विश्वसनीयता के बारे में बताता है लेकिन इस्लाम एक ऐसा धर्म बन गया है, जिसमें महिलाओं पर अत्याचार किया जा रहा है|

वहीं महिलाओं के लिए आवाज उठाने वालीं भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की कार्यकर्ता जकिया सोमन का कहना है कि “हम कुरान को मानते हैं और कुरान का कहना है कि समय के साथ चलो| विकास के लिए समय के हिसाब से बदलाव लाओ. कुरान महिला और पुरुष दोनों को ही संबोधित करता है| हमारे एक इंटरनेशनल ग्रुप की एक सदस्य अमीना वुदुद अमेरिका में कई साल पहले इमामत कर चुकी हैं|”

वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम वीमेंस पर्सनल लॉ बोर्ड की राष्ट्रीय अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर का कहना है कि “महिलाएं मस्जिद में नमाज पढ़ सकती हैं| महिलाएं इमामत करते हुए दूसरी महिलाओं को नमाज पढ़ा भी सकती हैं| लेकिन एक महिला पुरुषों की इमामत कर सकती है या नहीं, पुरुष महिला के पीछे नमाज पढ़ सकते हैं या नहीं इस मामले में हमे शरियत का पालन करना चाहिए. कुरान की रोशनी में मुफ्ती हजरात क्या कहते हैं उसी को मानना चाहिए|”

Quran

क्या कुरान महिला और पुरुष में भेदभाव करता है?

कुछ लोगो का कहना है कि महिलाएं और पुरुषों के लिए कुरान में अलग-अलग नियम बनाये गये हैं जिसमे महिला को मस्जिद में नमाज़ पढने की अनुमति नहीं देती है| इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ‘कुरान और हदीस में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया है, जिसके आधार पर लिंगभेद किया जाता रहा है| हालांकि, पुणे स्थित दंपति ने स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है| पैगंबर मोहम्मद ने भी मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था|

याचिका में वे आगे कहते हैं कि पवित्र कुरान या पैगंबर मोहम्मद द्वारा दिया गया कोई भी उपदेश नहीं है जो महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश करने और नमाज अदा करने से रोकता है| पुरुषों की तरह महिलाओं को भी संविधान में अधिकारों का संरक्षण प्राप्त है जो उन्हें उनकी मान्यता के अनुसार नमाज अदा करने की अनुमति देता है|

दंपति याचिका में आगे कहती है कि मस्जिदों जिन महिलाओं को पूजा की अनुमति है उसके लिए अलग प्रवेश द्वार और अहाता होता है|’ महिलाओं को उन मस्जिदों में प्रवेश करने की अनुमति है जिनके लिए एक अलग स्थान है, लेकिन भारत में अधिकांश मस्जिदें ऐसी नहीं हैं| सामाजिक रूप से भारत में महिलाओं को मस्जिदों में नियमित रूप से प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, भले ही उनके पास अलग अहाते हों| उदाहरण के लिए- दिल्ली में जामा मस्जिद में आने वाली अधिकांश महिलाएं राजधानी की होने के बजाय मुस्लिम पर्यटक भर होती हैं|

याचिका में यह भी कहा गया, ‘किसी से भी लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और मुस्लिम महिलाओं को सभी मस्जिदों में नमाज अदा करने की अनुमति देनी चाहिए| पवित्र शहर मक्का में पूजा करने के लिए लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है|मक्का में पुरुष और स्त्री दोनों एक साथ काबा का चक्कर लगाते हैं|

वहीं इस बारे में मुफ्ती इमरान का कहना है, “ये कहना गलत है कि महिलाओं के पीछे पुरुषों की नमाज नहीं हो सकती है| या महिलाएं मस्जिद में नमाज़ नहीं पढ़ सकती हैं| महिलाएं तरावीह (रमजान के दौरान पढ़ी जाने वाली एक खास नमाज) पुरुषों को पढ़ा सकती हैं| लेकिन उसके साथ कुछ शर्तें हैं| जैसे उस नमाज के दौरान पुरुष और महिलाएं दोनो ही लोग शामिल रहें| सही बात तो ये है कि ये कोई मद्दे नहीं हैं| लेकिन लोकसभा चुनावों को देखते हुए इन्हें मुद्दा बनाया जा रहा है|”

उल्लेखनीय है कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 28 सितंबर, 2018 को 4:1 के बहुमत वालें फैसले से केरल स्थित सबरीमाला मंदिर में सभी आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त कर दिया था| पीठ ने कहा था कि मंदिर में प्रवेश पर किसी प्रकार की पाबंदी लैंगिक भेदभाव के समान है|