अमेरिका की धरती से मोदी घेरेंगे तालिबान के मुद्दे पर पाक और चीन को   

कोरोना महामारी के चलते दो साल बाद पीएम मोदी विदेश दौरे पर अमेरिका जा रहे हैं। पीएम का यह दौरा काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि 25 सितंबर को वह संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करेंगे। इससे एक दिन पहले वह क्वाड देशों के नेताओं के साथ शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। पड़ोसी देश अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं के पूरी तरह से निकलने और तालिबान की हुकूमत आने के बाद जिस तरह से पाकिस्तान और चीन की सक्रियता काबुल की ओर बढ़ी है, उसने दुनिया में एक नए गठजोड़ की तरफ इशारा किया है। आइए समझते हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान और पाक-चीन

पाकिस्तान पूरी तरह तालिबान के साथ मिलकर काम कर रहा है, यहां तक कि पाक खुफिया एजेंसी के प्रमुख काबुल जाते हैं और ‘शेरों का गढ़’ कहे जाने वाले पंजशीर पर पाक एयरफोर्स हवाई हमले करती है। इसके बाद ही तालिबान पंजशीर पर जीत हासिल कर पाता है। मतलब साफ है, तालिबान को पाकिस्तान का पूरी तरह से समर्थन प्राप्त है। उधर, चीन तालिबान से हमदर्दी दिखा रहा है। काबुल में तालिबान राज आए कुछ घंटे ही बीते थे, चीन उससे दोस्ती की बातें करने लगा। वैसे भी, चीन के वरिष्ठ मंत्रियों से तालिबान नेताओं की मुलाकातें होती रही हैं। अब चीन अमेरिका के जाने के बाद इस इलके में अपना दबदबा बनाने में लग गया है। हालाकि भारत ने बिक्स देशों की हुई बैठक में चीन को झटका देते हुए आंतकवाद पर दूसरे देशों को एक स्वर में लाने में कामयाब हुआ है। संयुक्त घोषणा पत्र में इस बात को शामिल किया गया कि अफगानिस्तान आतंक की एक और पनाहगाह न बने। ऐसे में अब पीएम मोदी अमेरिका में होने वाली बैठक में और यूएन की बैठक में यही कोशिश करेंगे की तालिबान के जरिये पाकिस्तान और चीन पर हमला बोला जा सके।

क्वाड के जरिये चीन पर दबाव बनाने की सियासत

दूसरी तरफ क्वाड के विस्तार की भी चर्चा चल रही है। इसमें दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम जैसे कुछ और देशों को जोड़ा जा सकता है। क्षेत्र में चीन का कई देशों से विवाद है और उनके साथ आने से चीन के खिलाफ समूह की ताकत बढ़ेगी। खास बात यह है कि इस ग्रुप में शामिल हर देश की चीन को खतरा समझने की अपनी-अपनी वजह है और वह अपने राष्ट्रीय हितों के लिए बीजिंग की क्षेत्रीय ताकत को सीमित करना चाहते हैं। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि पीएम मोदी अमेरिका से ऐसी कूटनीति दांव चलने की तैयारी करेंगे जिससे तालिबान पर तो नकेल कसी जाये। साथ में चीन और पाक पर भी ऐसा दबाव बने इसकी रणनीति तैयार की जा रही है जिसकी शुरूआत भी हो चुकी है। क्योंकि भारत के कूटनीति प्रयासो का ही असर ये हुआ है कि तालिबान को मान्यता देने के फैसले पर रूस पीछे हट गया है तो ईरान हो या सऊदी अरब  सभी मुस्लिम देश भी मान्यता देने से पीछे हो गये है।

ऐसे में भारत की कूटनीति धीरे धीरे असर दिखा रही है और ये मानकर चलिये कि तालिबान के मुद्दे पर कूद रहे पाक और चीन को जल्दी भारत विश्व पटल पर जोर का झटका लगने वाला है।

 

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