जब तीन दशक पहले कैलाश-मानसरोवर में फोटोग्राफर बन गए थे मोदी

कम लोग जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद एक बहुत अच्छे फोटोग्राफर भी हैं. फोटोग्राफी का उनका ये शौक तीन दशक पुराना है. फोटोग्राफी की दुनिया में हुए तमाम बदलाव के साक्षी रहे हैं मोदी और खुद फोटोग्राफी की तमाम तकनीकी बारीकियों की खबर रखते हैं. जब मौका मिले, तो फोटोग्राफी का अपना शौक पूरा भी करते हैं मोदी.

वो 1988 का साल था, कैलाश मानसरोवर यात्रा का शुरुआती वर्ष था. लोगों में इस यात्रा के लिए खासा उत्साह था. इन उत्साही लोगों में से एक थे नरेंद्र मोदी, जो खुद भोलेनाथ के बड़े उपासक हैं. नरेंद्र मोदी को उन दिनों गुजरात के बाहर कम ही लोग जानते थे. साल भर पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बीजेपी में आए थे और आते ही अहमदाबाद नगर निगम चुनावों में बीजेपी को पहली बार सत्तारूढ़ कराया था.

मोदी की कैलाश-मानसरोवर यात्रा का उद्देश्य

निगम चुनाव में जीत के बाद गुजरात के सामान्य लोगों का भी ध्यान उनकी तरफ गया था. लेकिन, मोदी के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. भारत की पुरातन संस्कृति में कैलाश-मानसरोवर की यात्रा का महत्व तो था ही, 38 साल का ये युवा कैलाश-मानसरोवर की दिव्यता और नैसर्गिक सौंदर्य को आम लोगों तक पहुंचाने की जुगत में था. लोगों ने कैलाश-मानसरोवर के बारे में सुना तो था, लेकिन आखिर कैसा है रास्ता, खुद कैलाश पर्वत कैसा है या फिर कैसी है मानसरोवर झील, इसकी उत्कंठा ज्यादातर लोगों में थी.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

फोटोग्राफी की प्रतिभा के धनी हैं मोदी

गुजरात बीजेपी के संगठन महामंत्री की भूमिका में आ चुके नरेंद्र मोदी ने तब अपनी प्रतिभा का एक और नजारा पेश किया. पॉलिटिक्स के बाद फोटोग्राफी में अपनी मास्टरी दिखाने का मौका. आरएसएस का ये प्रचारक अच्छा फोटोग्राफर भी हो सकता था, किसी को उम्मीद नहीं थी.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

वो भी सामान्य फोटोग्राफी करने वाला नहीं, बल्कि सामान्य फोटो रील की जगह ट्रांसपैरेंसी शूट करने वाला फोटोग्राफर, ताकि उसे स्लाइड में कंवर्ट करके लोगों को कैलाश के बारे में समझाया जा सके. जो लोग कैलाश-मानसरोवर की यात्रा नहीं कर सकते थे या फिर नहीं कर पाये थे, उन्हें बताने के लिए.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

नरेंद्र मोदी की तस्वीरों की प्रदर्शनी का आयोजन

नरेंद्र मोदी जब कैलाश-मानसरोवर की यात्रा महीने दिन में पूरी करके वापस लौटे तो थोड़े समय बाद ही कैमरा क्लब ऑफ कर्णावती के बैनर तले उनकी फोटो प्रदर्शनी का आयोजन स्लाइड शो के तौर पर हुआ. फोटोग्राफी की दुनिया में उस वक्त भी सामान्य फोटो रील की जगह ट्रांसपैरेंसी क्लिक करना विशेषज्ञों का काम माना जाता था. सामान्य रील में निगेटिव बनती थी, जिसे एक्सपोज कर फोटो बनाई जाती थी, जबकि ट्रांसपैरेंसी सीधे पॉजिटिव के तौर पर ही क्लिक होती थी. जब उस समय नरेंद्र मोदी की तस्वीरों को लोगों ने देखा, तो आम आदमी तो ठीक, विशेषज्ञ फोटोग्राफर भी उनकी फोटोग्राफी का लोहा मान गए.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

जब फोटोग्राफर की किताब में मोदी को मिली जगह

दरअसल, नरेंद्र मोदी को शुरू से ही टेक्नोलॉजी से प्यार रहा है. यहां तक कि फोटोग्राफी की दुनिया में क्या नया हो रहा है, इसकी जानकारी वो रखते हैं. अहमदाबाद में रहने वाले वरिष्ठ फोटोग्राफर शैलेश रावल ने जब गुजरात के छायाकारों को लेकर एक किताब लिखी, तो उसमें एक अध्याय मोदी को लेकर भी रखा और मोदी की क्लिक की हुई कुछ तस्वीरों को पेश किया. हेडिंग लगाई सीएम टु पीएम, लेकिन किताब के उस अध्याय में सीएम से मतलब कॉमन मैन से था और पीएम से मतलब फोटो मास्टर से था.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

शैलेश का कहना है कि 1991 में जब लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर से पहली बार चुनाव लड़ रहे थे, उस वक्त मोदी गुजरात प्रदेश संगठन महामंत्री की भूमिका निभाते हुए भी उनसे लगातार फोटोग्राफी और इससे जुड़े विषयों पर बात करते थे. उस वक्त मोदी के पास याशिका का एसएलआर कैमरा हुआ करता था. ये ऑटोमेटिक कैमरा नहीं था, जिसमें क्लिक का बटन दबाओ और फोटो अपने आप खिंच जाए.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

एसएलआर कैमरे का इस्तेमाल कर फोटो खींचने के लिए जरूरी था कि आपको एपरचर, शटर, फ्लैश और लेंस सहित तमाम तकनीकी जानकारियां हो, ताकि किसी तस्वीर को खींचने के लिए इन तमाम मानकों को सेट कर सकें.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

फोटोग्राफी के तकनीकी विकास पर मोदी की रहती है नजर

यही नहीं, जब डिजिटल कैमरे बाजार में आए, तब भी मोदी उसे लेकर उतने ही उत्साहित रहे. पेंटेक्स के-1000 से लेकर कैनन मार्क 3 कैमरे, यानी तकनीक का विकास और इस विकास के हर कदम के साक्षी रहने वाले मोदी. वो घंटों फोटोग्राफी पर लगातार बात कर सकते थे.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

लाइटिंग से लेकर फ्रेम और कंपोजिशन, उन्हें सब पता होता था. कई महत्वपूर्ण अवसरों पर उन्होंने खुद फोटोग्राफी भी की. मसलन मुरली मनोहर जोशी की अगुआई में जब मोदी एकता यात्रा के तहत कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक गए, तब भी जगह-जगह खुद उन्होंने अपने कैमरे से फोटोग्राफी की.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

यहां तक कि मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए, तब भी फोटोग्राफी का उनका शौक खत्म नहीं हुआ. यदाकदा उसकी झलक दिख ही जाती थी. चाहे अहमदाबाद में मुरारी बापू की कर्णावती क्लब में हुई कथा का मौका हो या फिर मशहूर कांकरिया झील पर हॉट एयर बैलून की शुरुआत हो, मोदी अपने को रोक नहीं पाते थे और फोटो खींचना शुरू कर देते थे. जब कैमरा पकड़ा, तो कोई एक-दो नहीं, बल्कि तन्मयता के साथ चालीस-पचास फोटोग्राफ तक खींचते.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

मुख्यमंत्री रहते हुए भी मोदी ने की फोटोग्राफी

गुजरात में वो अक्टूबर 2001 से मई 2014 के बीच करीब तेरह साल तक मुख्यमंत्री रहे. उस दौरान भी हर साल एक मौका ऐसा जरूर आता था, जब फोटोग्राफर मोदी के दर्शन खुद तस्वीरकारों को होते थे. ये मौका होता था दीपावली के बाद मुख्यमंत्री आवास में आयोजित होने वाले स्नेह मिलन समारोह का, जिसमें मंत्रियों, बीजेपी नेताओं, अधिकारियों के साथ पत्रकार भी आमंत्रित होते थे. अमूमन मोदी उस दौरान किसी न किसी फोटोग्राफर का कैमरा लेकर तस्वीरें खींचने लगते थे. कई बार तो फोटोग्राफर्स की ये मांग होती थी कि मोदी उनका फोटो खींचें और मोदी उनकी इस मनुहार को हमेशा स्वीकार कर लेते थे.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

फोटोग्राफी के सितारों से रहा मोदी का करीबी रिश्ता

फोटोग्राफी जगत के बड़े सितारों के साथ भी मोदी का करीबी संबंध रहा है. गुजरात के झवेरीलाल मेहता जैसे फोटोग्राफर्स तो ठीक, रघु राय, भवान सिंह और बंदीप सिंह जैसे दिल्ली के बड़े फोटोग्राफर्स से भी उनका परिचय वर्षों पुराना रहा है.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी को अपना ये शौक पूरा करने का मौका तो अब कम ही मिलता है, लेकिन वो फोटोग्राफर्स को निराश नहीं करते. शायद वह मन में अब भी खुद को उस बिरादरी का सदस्य मानते हों.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

पिछले पांच साल से देश के प्रधानमंत्री के तौर पर वो तस्वीरकारों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र हैं. उन्हें पता रहता है कि फोटो लेते वक्त किस फोटोग्राफर के दिमाग में क्या चल रहा है और कई बार बिना कुछ कहे अपनी भंगिमाओं के जरिए उनकी बड़ी मदद कर देते हैं. इन भंगिमाओं को कैप्चर कर अपनी बड़ी कामयाबी मान लेता है कोई भी फोटोग्राफर.

साभार : नरेंद्र मोदी आर्काइव

मोदी को पता होता है फोटोग्राफर का ऑब्जेक्ट

चाहे अवसर संसद के केंद्रीय कक्ष में एनडीए का नेता चुने जाने का हो, संविधान की प्रति को नमन करने का हो या फिर अहमदाबाद में बीजेपी के खानपुर कार्यालय के बाहर हुई सभा का, बतौर सब्जेक्ट मोदी को पता होता है कि सामने वाले फोटोग्राफर का ऑब्जेक्ट क्या है. पीएम मोदी उन्हें निराश नहीं करते, क्योंकि कैमरे की बारीकियां और उसके पीछे रहने वाली आंखों के दर्द और बेचैनी का अहसास उन्हें लंबे समय से रहा है, निजी अनुभव के कारण. लेख में उपयोग की गईं सभी तस्वीरें नरेंद्र मोदी आर्काइव से साभार ली गई हैं.

Originally Published At: News18Hindi