पीएम मोदी के कूटनीति के आगे फेल हुआ चीन, मालदीव ने कहा- ‘सबसे पहले’ भारत

मालदीव के नए राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह तीन दिन की राजकीय यात्रा पर रविवार को भारत पहुंचे. केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी ने भारत आने पर सोलिह का स्वागत किया. सोलिह की राष्ट्रपति के रूप में किसी भी देश की पहली विदेश यात्रा है. सोलिह के साथ उनकी पत्नी फाजना अहमद और सरकार का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी उनकी यात्रा पर है. अपने भारत यात्रा पर सोलिह ने कहा कि मालदीव और भारत के बीच हमेशा से अच्छे संबंध रहे हैं. मालदीव के पास हमेशा ‘भारत की पहली’ नीति रही है.

मालदीव के विकास के लिए भारत ने निरंतर समर्थन और सहयोग किया है. सोलिह का यह बयान भारत और मालदीव के बीच संबंधों में एक नए उर्जा की तरह है. इससे पहले भारत और मालदीव के संबंध में जटिलता बनी हुई थी. पिछले सरकार में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन ने ‘भारत की पहली’ नीति को उलटते हुए चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किया था.

लेकिन इस बार मालदीव में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद सोलिह की जीत के बाद भारत और मालदीव के संबंध एक बार फिर पटरी पर आते दिख रहे हैं. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 नवंबर को मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे. प्रधानमंत्री मोदी इकलौते राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्हें इस शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए बुलाया गया था.

आम चुनाव में सोलिह ने हासिल की थी जीत
पीएम नरेंद्र मोदी इससे पहले 2015 में मालदीव की यात्रा पर जाने वाले थे, लेकिन वहां पर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशिद की गिरफ्तारी के बाद बढ़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों के कारण उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी. मालदीव में सितंबर 2018 में हुए आम चुनाव में मालदिवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने जीत हासिल की थी. उन्होंने उस समय के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को हरा दिया था.

पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन माने जाते थे चीन के करीबी
भारत और मालदीव के संबंधों में पूर्ववर्ती यामीन के शासन के दौरान तनाव देखने को मिला था क्योंकि, उन्हें चीन का करीबी माना जाता है. भारतीयों के लिये कार्यवीजा पर पाबंदी लगाने और चीन के साथ नये मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर को लेकर भी भारत खुश नहीं था.

यामीन द्वारा इस साल पांच फरवरी को देश में आपातकाल की घोषणा किये जाने के बाद भारत और मालदीव के रिश्तों में और कड़वाहट आ गई थी. भारत ने इस फैसले की आलोचना करते हुए उनकी सरकार से लोकतंत्र और सियासी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को फिर से बहाल करने और राजनीतिक बंदियों को रिहा करने की मांग की थी. मालदीव में 45 दिन तक आपातकाल रहा था.