हौसले की उड़ान: हादसे में गंवा दिए दोनों हाथ, पैर से लिखकर 77 परसेंट नंबर से हुआ पास हुआ 10 वीं की परीक्षा

हौसला अगर लक्ष्य भेदने का हो और जज्बा आसमान पे, फिर स्थिति और परिस्थिति सब मिल के भी आपका रास्ता नहीं रोक पातें|

इस बात की मिसाल हरियाणा के मेवात जिले के एक छात्र ने पेश किया है| देश के पिछड़े जिलों में शुमार मेवात के नाहर खान के आगे शारीरिक परेशानियां बौनी हो गईं| गुरबत में जीने वाले इस लड़के की चर्चा पूरे मेवात में है| विपरीत हालात में बोर्ड परीक्षा दी और अच्छा प्रदर्शन करके नाम रोशन किया|

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नाहर खान के दोनों हाथ नहीं हैं| बाएं पैर की चार उंगलियां भी काटनी पड़ी हैं| एक कान नहीं है…लेकिन हौसला इतना है कि दाएं पैर से लिखकर उसने हरियाणा बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में 77 फीसदी अंक हासिल किए हैं| दिव्यांग होने के वावजूद नाहर की इस उपलब्धि की चर्चा आस-पास के इलाको में खूब हो रही है|

आपको बता दे की नाहर बचपन से ऐसा नहीं था, दरअसल 2004 में उसे खेतों पे जाते समय करंट लग गया था| इस हादसे में उसे अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े, शरीर का ज्यादातर हिस्सा जल गया, एक कान खराब हो गया, बाएं पैर की चार उंगलियां काट दी गईं| इस हादसे के बाद उसे ठीक होने में करीब तीन साल लगे| ऐसा लगा कि सब कुछ खत्म हो गया| लेकिन अपने हौसले से वो उठ खड़ा हुआ| उसकी मेहनत का ही परिणाम है कि उसे 10वीं में अच्छे नंबर मिले| अब उसे जिंदगी में जो कुछ भी हासिल करना है, उसके लिए दायां पैर ही उसका सहारा है|

नाहर ने गाँव के स्कूल से आठवीं तक पढाई पूरा करने के बाद वहां से ३-४ किलोमीटर दूर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय मांडीखेड़ा के स्कूल जाना शुरू किया| इसमें उसके दोस्तों का भी सहयोग मिला, स्कूल जाते समय उसका बस्ता उसके दोस्त उठाते थे|

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बोर्ड की परीक्षा कठिन थी, लेकिन माता-पिता की हिम्मत और सहयोग की बदौलत वह दसवीं में ३८५ अंक लाने में सफल हुआ| स्कूल में उसकी 100 परसेंट हाजिरी बताती है कि उसमें पढ़ने की कितनी ललक है| उसका सपना उच्च शिक्षा हासिल करने का है|

राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय मांडीखेड़ा के प्राचार्य करण सिंह ने बताया कि उनके स्कूल में 245 बच्चों ने दसवीं की परीक्षा दी थी| जिनमें से 148 पास हुए हैं| ऐसे हालात में नाहर ने 77 फीसदी लेकर मेवात-हरियाणा में स्कूल का नाम रोशन किया|

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नाहर के पिता बशीर अहमद ने बताया कि परिवार के पालन-पोषण करने लिए उनके पास मजदूरी के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है| जो मजदूरी से मिलता है उससे परिवार चलता है| उसे रोज हम अपने हाथ से खाना खिलाते हैं| मुझे खुशी है कि मेरे बेटे ने मेवात का नाम रोशन किया|

सरकारी सेवाओं का अभी तक इस परिवार को कोई लाभ नहीं मिला है| आर्थिक तंगी के वावजूद भी होनहार नाहर की स्कूल फीस माफ़ नहीं हुई थी| ६० साल की उम्र पार कर चुके नाहर के पिता बशीर अहमद की कोशिश है कि उन्हें बुढ़ापा पेंशन मिले| घर में बहुत तंगी है इसलिए कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ मिल जाए तो गुजर-बसर करने में आसानी हो जाएगी|

वहीँ आपको बता दे की राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय मांडीखेड़ा के अध्यापक नाहर की इस उपलब्धी से खुश है| उन्होंने बताया की नाहर ने साबित कर दिया की अगर हौसलों में उड़ान हो तो कोई भी परिस्थिति आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती है|