आजादी की लड़ाई में दुर्गा मां का अवतार थी मातंगिनी हाजरा

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी यूं तो आपने कई वीर और वीरांगनाओ के किस्से सुने होगे लेकिन आज जिसके बारे में हम आपको बताने जा रहे है उनके बारे में बहुत कम लोग ही जानते है। नवरात्र के पावन दिन चल रहे है ऐसे में एक महिला आजादी की दिवानी की गाथा लेकर हम आपके सामने आये है जिसे अंग्रेजों ने 72 साल की उम्र में गोलियों से छलनी कर दिया लेकिन उन्होंने मरते दम तक तिरंगे को नहीं गिरने दिया और मुंह से वंदे मातरम निकलता रहा। किसी भी दृष्टि से उनकी वीरता और साहस रानी लक्ष्मीबाई से कम नहीं है। जी हां, मातंगिनी हाजरा जिन्हे ‘बूढ़ी गांधी’ की उपाधि से भी जाना जाता है, आजकल के नौजवान उनकी आजादी के प्रति दिवानगी सुन ले तो वो हैरत में पड जाएंगे।

बचपन में हो गई थी मातंगिनी हाजरा की शादी

बंगाल की एक ऐसी महिला जिसे जिंदगी के 62 साल तक तो ये भी नहीं पता था कि स्वतंत्रता आंदोलन है क्या, उसकी अपने गांव और घर से बाहर की जिंदगी बड़ी सीमित थी, लेकिन आज उन्हें ‘बूढ़ी गांधी’ के नाम से जाना जाता है। मातंगिनी हाजरा बंगाल के एक गरीब किसान की बेटी थी। बचपन में पिता ने एक साठ साल के वृद्ध से शादी कर दी, जब मातंगिनी 18 साल की हुईं तो पति की मौत हो गई। सौतेले बच्चों ने घर से निकाल दिया। कोई चारा नहीं था तो वो पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के तामलुक में ही एक झोंपड़ी बनाकर रहने लगीं।

62 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी

अपनी सारी जवानी उन्होने दूसरों के घरो में मेहनत मजदूरी करके काट लिया था लेकिन इस बीच देश में अंग्रेजी हुकूमत का अत्याचार उन्हो कही न कही अंदर से झगझोरने लगा। धीरे धीरे वो लोगों से गांधीजी के बारे में भी जानने लगीं। एक दिन 1932 में उनकी झोंपड़ी के बाहर से सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक विरोध यात्रा निकली। 62साल की हाजरा को जाने क्या सूझा, वो भी उस यात्रा में शामिल हो गईं। उन्होंने नमक विरोधी कानून भी नमक बनाकर तोड़ा, गिरफ्तार हुई, सजा भी मिली। उनको कई किलोमीटर तक नंगे पैर चलने की सजा दी गई। उसके बाद उन्होंने ‘चौकीदारी कर रोको’ प्रदर्शन में हिस्सा लिया। काला झंडा लेकर सबसे आगे चलने लगीं, बदले में मिली 6 महीने की जेल। जेल से बाहर आकर उन्होंने एक चरखा ले लिया और खादी पहनने लगीं। लोग उन्हें ‘बूढ़ी गांधी’ के नाम से पुकारने लगे। 1942 में गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का ऐलान कर दिया और नारा दिया ‘करो या मरो’. मातंगिनी हाजरा ने मान लिया था कि अब आजादी का वक्त करीब आ गया है। उन्होंने तामलुक में भारत छोड़ो आंदोलन की कमान संभाल ली, जबकि उनकी उम्र 72 पार कर चुकी थी. तय किया गया कि मिदनापुर के सभी सरकारी ऑफिसों और थानों पर तिरंगा फहरा कर अंग्रेजी राज खत्म कर दिया जाए।

गोली लगती रही लेकिन तिरंगा न गिरने दिया

29 सितम्बर 1942 का दिन था, कुल 6000 लोगों का जुलूस था, इसमें ज्यादातर महिलाएं थीं। वो जुलूस तामलुक थाने की तरफ बढ़ने लगा, पुलिस ने चेतावनी दी, लोग पीछे हटने लगे। मातंगिनी बीच से निकलीं और सबके आगे आ गईं। उनके दाएं हाथ में तिरंगा था और कहा ‘मैं फहराऊंगी तिरंगा, आज कोई मुझे कोई नहीं रोक सकता’वंदमातरम के उदघोष के साथ वो आगे बढ़ीं। पुलिस की चेतावनी पर भी वो नहीं रुकीं तो एक गोली उनके दाएं हाथ पर मारी गई, वो घायल तो हुईं, लेकिन तिरंगे को नहीं गिरने दिया। तिरंगे की आन बान शान के लिए जितने लोगों ने भी अपना बलिदान दिया है, उनमें इस बूढ़ी गांधी का नाम सबसे ऊपर रहता है। तभी तो अगर आप गूगल में उनकी तस्वीर ढूंढेंगे तो आपको उनकी अधिकतर तस्वीर में उनके हाथ में तिरंगा दिखेगा।

आज हमने बूढ़ी गांधी का किस्सा इसलिये आपको बताया है कि आप समझ सके कि आजादी हमे इस तरह से मिली है और आज इसी आजादी का हमारे देश में कुछ लोग मजाक उड़ा रहे है। इतना ही नही खुलकर दुश्मन मुल्क की तारीफ और मदद करने को भी बोल रहे है। ऐसे लोगो को देश की जनता को याद दिलाना चाहिये कि ये आजादी ऐसे परवानों के कारण मिली है और हम इसी ऐसे ही नही खत्म होने देगे। बल्कि जो देश की एकता को तोड़ने की कोशिश करेगा उसको ही हमेशा के लिये खत्म करके नवभारत का निर्माण करेगे।