चलिए आज गलवान घाटी से होते है रूबरू

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आजकल देश सहित पूरी दुनिया में गलवान घाटी सुर्खियं में बनी हुई है। क्योकि इस जगह पर चीन एक बार फिर से जमीन हडपने की साजिश रच रहा है। आखिर गलवान घाटी है है क्या और क्यो चीन इसको हडपना चाहता है, चलिए आपको बताते है।

जानें गलवान घाटी का इतिहास

गलवान घाटी तिब्बत के पूर्व दिशा में पड़ती है। इस घाटी को सबसे पहले खोजने वाले भारतीय रसूल गलवान थे।  इनके वंशज आज भी लद्दाख इलाके में रहते है। इनके परिवार की माने तो  उनके परदादा रसूल गलवान ने साल 1890 में इस घाटी की खोज की थी। उस समय रसूल लगवान 12-13 साल के रहे होंगे। सन् 1892-93 में सर यंग हसबैंड ने व्यापार वास्ते सिल्क रूप के नए-नए रास्ते खोजने की कोशिश के तहत एक अभियान चलाया था। रसूल गलवान भी उसी अभियान का हिस्सा थे। जब सर यंग हसबैंड की टीम गलवान घाटी में भटक गई तो रसूल गलवान ने उन्हें रास्ता दिखाया था और टीम को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में मदद की थी। दरअसल, रसूल गलवान कई बार उस सुनसान घाटी का दौरा कर चुके थे और उन्हें गलवान नाला के बारे में भी पता था। ब्रिटिश सरकार ने रसूल गलवान से खुश होकर उनके नाम पर इस घाटी का नामकरण किया था। तब से यह इलाका गलवान घाटी के नाम से जाना जाता है। इसक साथ साथ गलवान घाटी के बीच में एक नाला निकलता है जो अक्साई चीन से निकलकर श्लोक नही में मिलती है। श्लोक नही वो नदी है जो आगे चलकर सिंधु नदी से मिल जाती है। वैसे ये पूरा इलाका पथरीला है और ज्यादा महीने यहां बर्फ देखी जा सकती है। लेकिन सामरिक नजरो से देखा जाये तो इस इलाके का बहुत महत्व है क्योकि इसके जरिये एक नही तीन देशो की निगरानी हो सकती है। इसीलिये चीन इस इलाके को घेरना चाहता है जिससे चीन चारो तरफ नजर रख सके।

गलवान घाटी पर सिर्फ भारत का अधिकार’

इतिहास के दस्तावेज के पन्ने अगर खंगाले जाये तो साफ होता है कि इस इलाके पर भारत का हक है और चीन नाजायज तौर पर इसपर कब्जा करना चाहता है। रसूल गलवान के परिवार की माने तो चीन द्वारा इस इलाके को अपना बताए जाने के दावे को पूरी तरह झुठलाते हुए कहा कि गलवान घाटी हमेशा से भारत की रही है और चीन किसी भी कीमत पर इसे अपना नहीं बता सकता। उन्होंने कहा कि चीन के पास कोई साक्ष्य नहीं है कि गलवान घाटी उसके प्रभाव क्षेत्र में आता है। हालांकि चीन चालबाजी करके इसे अपना इलाका बताता है। इसमें एक पेच उस वक्त और फंस गया जब तिब्बत में रहने वाले कुछ लोग ये कह रहे है कि भारत की सीमा तिब्बत से मिलती है न की चीन से। ऐसे में चीन के लिए एक मुसीबत और खड़ी हो गई है। लेकिन इसके साथ 1962 की लड़ाई में भी चीन ये मानता था कि ये इलाका भारत का है। ऐसे और भी कई साक्ष्य है कि ये इलाका भारत का है और तभी अपनी संप्रभुता की रक्षा के चीन के जवानो हमारी सेना के जवानो के करारा जवाब देते हुए पीछे खदेड़ दिया है।

बरहाल चीन के झूठ का नकाब अब उतर गया है और साफ हो चुका है कि चीन अपनी विस्तारवादी सोच के चलते इस तरह का काम करता है। लेकिन शायद वो ये भूल गया कि इसबार उसने पंगा भारत से लिया है वो भी तब जब भारत की कमान मोदी जी जैसे शेर के हाथ में है। ऐसे में चीन को पीछे ही नही हटना पड़ेगा बल्कि ये कबूल भी करना होगा कि भारत ने इसबार उसे करारी चोट पहुंचाई है।


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