OPINION: कुंभ- एक आसान निशाना?

मेला अवधि के दौरान साइंटिफिक या डेटा आधारित दृष्टिकोण से अगर हम कोविड मामलों का आकलन करें तो यह साफ पता चलता है कि कुंभ ने दूसरी लहर को बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभाई है.

(स्वामी अवधेशानंद गिरि)

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर काफी दुखद रही. पूरा राष्ट्र इस घातक वायरस के खिलाफ एक वीरतापूर्ण लड़ाई लड़ रहा है. यह भी सच है कि बड़ी संख्या में परिवारों को निजी नुकसान और भावनात्मक संकट का सामना करना पड़ा है. अब दुखों के कारणों का पता लगाना स्वभाविक है. ऐसे में हाल ही में हरिद्वार में संपन्न हुआ महाकुंभ मेला पूरे आरोप लगाने के लिए एक आसान लक्ष्य बन गया है, लेकिन क्या ऐसा करना सही है? आइए कुछ तथ्यों को जान लेते हैं.

महा कुंभ मेला करोड़ों भक्तों के लिए हजारों साल पुराना एक धार्मिक और सांस्कृतिक समारोह है. यूं तो आमतौर पर मेला 12 साल के अंतराल में आयोजित होता है. फिर भी तिथि और समय पर अंतिम निर्णय ज्योतिष विज्ञान के आधार पर संत लेते हैं. इसी तरह यह तय किया गया कि हरिद्वार का महाकुंभ मेला 2021 में आयोजित होगा.

लाखों लोगों की भक्ति का आह्वान करने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक समारोहों का समाज में एक विशेष स्थान है. उदारण के तौर पर, जर्मनी में चांसलर एंजेला मार्केल ने ईस्टर के समारोह के लिए अपने लॉकडाउन के फैसले को वापस लिया था. वहीं, भारत में संतों ने अलग दृष्टिकोण रखा. पारंपरिक रूप से हरिद्वार कुंभ की अवधि चार महीने की होती है, जो जनवरी से अप्रैल तक चलती है. ऐसा ही पिछले महा कुंभ में भी रहा है. हालांकि, इस साल महामारी को देखते हुए खुद संतों ने अवधि को कम कर एक महीना करने का निर्णय लिया. इसके बाद मेला 1 से 30 अप्रैल तक चला. यह ऐसे समय में किया गया, जब पहली लहर लगभग कम हो चुकी थी. कुल मामले 10 हजार की रेंज में थे और जानकार अनुमान लगा रहे थे कि दूसरी लहर नहीं आएगी. इसके अलावा, जब अप्रैल में स्थिति इतनी जरूरी हो गई, तो माननीय प्रधानमंत्री की अपील पर मेले की अवधि को और कम कर दिया गया.
मेले की अवधि के दौरान सरकार ने वायरस के प्रसार को रोकने और निगरानी के लिए कड़े नियम तय किए थे. सभी तीर्थयात्रियों का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया था. पिछले 72 घंटों में लिया गया एक नेगेटिव आरटी-पीसीआर टेस्ट भी प्रवेश के लिए अनिवार्य कर दिया गया था. 150 से ज्यादा स्थायी और मोबाइल सैनिटाइजेशन पॉइंट स्थापित किए गए. कोविड संबंधी व्यवहार के पालन को सुनिश्चित करने के लिए करीब 2 हजार वॉलिंटियर्स को तैनात किया गया. कुंभ में लगे सभी फ्रंटलाइन कर्मियों को टीका लगाया गया था और इसमें 2.18 लाख डोज का इस्तेमाल हुआ था. भीड़ ना हो, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कड़े यात्रा दिशानिर्देश जारी किए गए. मेला वाले क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर रेंडम टेस्ट किए गए. इस दौरान करीब 10 लाख जांचें की गईं और पॉजिटिविटी रेशो केवल 1.49 फीसदी के आसपास था.

सख्त दिशानिर्देशों और नियमों को लागू कराने के सरकार और संतों के प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि मेले में सामान्य उपस्थिति का अंश ही पहुंचा. एक उदाहरण के तौर पर इस साल 14 अप्रैल को महा संक्रांति पर हुए शाही स्नान में केवल 13.5 लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र डुबकी लगाई. जबकि, 2010 में हुए शाही स्नान में यह संख्या 1.8 करोड़ थी. यह आंकड़ा 13 गुना से भी ज्यादा है.

2010 में हरिद्वार में हुए पिछले महाकुंभ में कुल उपस्थिति 4 करोड़ से ज्यादा की थी. 2019 में प्रयाग में हुए अर्ध कुंभ में 24 करोड़ श्रद्धालु पहुंचे थे. इसके विपरीत 2021 के हरिद्वार कुंभ में केवल 35 लाख लोग शामिल हुए. यह हिंदू समाज के इस पवित्र, समय प्राचीन अनुष्ठान को चुनौती के दौर में सीमित करने की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है.
 
मेला अवधि के दौरान साइंटिफिक या डेटा आधारित दृष्टिकोण से अगर हम कोविड मामलों का आकलन करें, तो यह साफ पता चलता है कि कुंभ ने दूसरी लहर को बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभाई है. नीचे दिए गए नक्शे में उन जिलों का पता चलता है, जहां बीते 4 महीनों में रोज 100 से ज्यादा मामले सामने आ रहे थे. फरवरी और मार्च के नक्शे यह साफ तौर पर दिखाते हैं कि कैसे दूसरी लहर पश्चिमी भारत से उठी, जिसने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया.

कुंभ मेला अवधि के दौरान ही विशेष रूप से COVID सकारात्मकता का विश्लेषण करते हैं. भारत के सभी क्षेत्रों के टियर-2 शहरों के साथ समान जिलों की हरिद्वार और देहरादून से तुलना की जाए, तो इससे यह पता चलता है कि कैसे दूसरी लहर कुंभ की शुरुआत से पहले ही देश के दूसरे हिस्सों में तबाही मचा रही थी. उदाहरण के तौर पर पश्चिम में नागपुर (चित्र 02) और नासिक (चित्र 03), पूर्व में रायपुर (चित्र 04) और दक्षिण में विशाखापत्तनम (चित्र 05) को देखें.

ठीक इसी समय दूरी पर मौजूद दक्षिण के जिलों में भी हरिद्वार और देहरादून की तरह ही पॉजिटिविटी ट्रेंड देखने को मिला. इसके लिए मैसूर (चित्र 06), कोझीकोड (चित्र 07) और कोयंबटूर (चित्र 08) के उदाहरण लें.

संत के तौर पर आमतौर पर हम नीति और वर्तमान की बातों पर सार्वजनिक तौर पर लिखने से बचते हैं, लेकिन बीते हफ्ते में हुई बातों ने मुझे यह लिखने के लिए मजबूर किया है. जिस तरह से कुंभ मेले को बदनाम किया गया है, उससे न सिर्फ मुझे बल्कि करोड़ों आम हिंदुओं को गहरा दुख पहुंचा है. हमारी सबसे प्रतिष्ठित परंपराएं राजनीतिक रस्साकशी का हिस्सा बन गई हैं, और वह भी कुछ पूर्व नियोजित टूल-किट के हिस्से के रूप में? संतों और करोड़ों आम हिंदुओं ने ऐसा कौन सा अपराध किया है कि उन्हें अपने ही देश में इतना शर्मिंदा और अपमानित होना पड़ा है?

भगवद् गीता प्रभु श्रीकृष्ण ने कहा है- तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।​​ क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।

हम सामान्य नश्वर लोगों के रूप में ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि वह उन लोगों को क्षमा करें जो इस क्रूर कृत्य में शामिल थे. उनके पास आत्मनिरीक्षण करने और अपने आचरण पर चिंतन करने की बुद्धि भी हो.

स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर हैं, जो भारत में साधुओं का सबसे पुराना और सबसे बड़ा अखाड़ा है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

 
Published On: News18